अरे! तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब। और उस पर मुसलमान बनते हो साहिब।।

by kavyadharateam on November 18, 2019, 07:27:55 AM
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kavyadharateam
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अरे! तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब।
और उस पर मुसलमान बनते हो साहिब।।

क़ाफ़िरों को मार कर हूर,ज़न्नत मिलेगी।
ऐसी कुरान कहाँ से तुम पढ़ते हो साहिब।।

हाथों में थमा के बंदूकें असलहा बम हथगोले।
मासूम दिलों में ज़हर क्यों भरते हो साहिब।।

क्या नस्ल आपकी इस हिन्दुतान की नहीं ।
क्यूँ मुल्क से फिर ग़द्दारी करते हो साहिब।।

दिल मे ज़रूर आपके कोई चोर छुपा है।
अपने घरवालों से तभी लड़ते  हो साहिब।।

क्यूँ देते हो बोलो मज़्ज़िदों से बग़ावती फ़तवे।
जुम्मे की कैसी तुम नमाज़ें पढ़ते हो साहिब।।

मज़हब के नाम पे तो हो मरने को अमादा।
क्यों हिन्दुस्तान के लिऐ नहीं मरते हो साहिब।।

ये ज़ेहाद नहीं बस तख़्तों ताज की जंग है ।
क्यों झूठे फ़रेबी जेहादी बनते हो साहिब।।

तुम तोड़ दो हिंदुस्तान नहीं औकात तुम्हारी।
क्यों ज़ाया अपनी ज़िन्दगी करते हो साहिब।।

"दीपक" करे रोशन चाहें मंदिर हो या मस्ज़िद।
जल जाओगे क्यों आग से खेलते हो साहिब।।

@ दीपक शर्मा
http://www.Thank you!
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surindarn
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«Reply #1 on: November 18, 2019, 04:51:12 PM »
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अरे! तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब।
और उस पर मुसलमान बनते हो साहिब।।

क़ाफ़िरों को मार कर हूर,ज़न्नत मिलेगी।
ऐसी कुरान कहाँ से तुम पढ़ते हो साहिब।।

हाथों में थमा के बंदूकें असलहा बम हथगोले।
मासूम दिलों में ज़हर क्यों भरते हो साहिब।।

क्या नस्ल आपकी इस हिन्दुतान की नहीं ।
क्यूँ मुल्क से फिर ग़द्दारी करते हो साहिब।।

दिल मे ज़रूर आपके कोई चोर छुपा है।
अपने घरवालों से तभी लड़ते  हो साहिब।।

क्यूँ देते हो बोलो मज़्ज़िदों से बग़ावती फ़तवे।
जुम्मे की कैसी तुम नमाज़ें पढ़ते हो साहिब।।

मज़हब के नाम पे तो हो मरने को अमादा।
क्यों हिन्दुस्तान के लिऐ नहीं मरते हो साहिब।।

ये ज़ेहाद नहीं बस तख़्तों ताज की जंग है ।
क्यों झूठे फ़रेबी जेहादी बनते हो साहिब।।

तुम तोड़ दो हिंदुस्तान नहीं औकात तुम्हारी।
क्यों ज़ाया अपनी ज़िन्दगी करते हो साहिब।।

"दीपक" करे रोशन चाहें मंदिर हो या मस्ज़िद।
जल जाओगे क्यों आग से खेलते हो साहिब।।

@ दीपक शर्मा
http://www.Thank you!
Waah waah ati sundar, dheron daad.
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