चाह है तेरे दरबार में आने की --आर के रस्तोगी

by Ram Krishan Rastogi on May 10, 2019, 11:14:51 AM
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चाह नहीं अब कुछ खाने की |
चाह नहीं अब और कमाने की ||
चाह बस केवल प्रभु जी मेरी |
तेरे ही दरबार में बस आने की ||

चाह नहीं अब किसी खजाने की |
चाह नहीं अब मकान बनाने की ||
करो प्रभुजी आदेश तुम यम को
मुझको अपने दरबार बुलाने की ||

हर चाह को मैंने त्याग दिया |
रिश्ते नातो को  त्याग दिया ||
क्यों कर रहे हो प्रभुजी देरी ?
क्या मेर समय नहीं हुआ ||

कब होगा मिलन तुमसे मेरा ?
दिखता है चारो तरफ अँधेरा ||
क्यों नहीं तुम पास बुलाते ?
क्या कसूर है प्रभु अब मेरा ||

सुबह शाम तुझको याद करता |
फिर भी मेरा मन नहीं भरता ||
कैसे बिसराऊ मै अब तुझको |
क्यों नहीं बुलाने का आदेश करते ?

किसी चाह की कोई चाह नहीं |
अपनों से मिलने का मोह नहीं ||
चाह मोह को मैंने त्याग दिया |
फिर भी तुम मुझको बुलाते नहीं ||

गीत गाता हूँ तेरे सदा मै |
भजनों को भज लेता हूँ मै ||
मै से मै को निकाला मैंने |
आने को अब लालायित मै ||

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«Reply #1 on: May 11, 2019, 09:09:49 AM »
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चाह नहीं अब कुछ खाने की |
चाह नहीं अब और कमाने की ||
चाह बस केवल प्रभु जी मेरी |
तेरे ही दरबार में बस आने की ||

चाह नहीं अब किसी खजाने की |
चाह नहीं अब मकान बनाने की ||
करो प्रभुजी आदेश तुम यम को
मुझको अपने दरबार बुलाने की ||

हर चाह को मैंने त्याग दिया |
रिश्ते नातो को  त्याग दिया ||
क्यों कर रहे हो प्रभुजी देरी ?
क्या मेर समय नहीं हुआ ||

कब होगा मिलन तुमसे मेरा ?
दिखता है चारो तरफ अँधेरा ||
क्यों नहीं तुम पास बुलाते ?
क्या कसूर है प्रभु अब मेरा ||

सुबह शाम तुझको याद करता |
फिर भी मेरा मन नहीं भरता ||
कैसे बिसराऊ मै अब तुझको |
क्यों नहीं बुलाने का आदेश करते ?

किसी चाह की कोई चाह नहीं |
अपनों से मिलने का मोह नहीं ||
चाह मोह को मैंने त्याग दिया |
फिर भी तुम मुझको बुलाते नहीं ||

गीत गाता हूँ तेरे सदा मै |
भजनों को भज लेता हूँ मै ||
मै से मै को निकाला मैंने |
आने को अब लालायित मै ||

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«Reply #2 on: May 11, 2019, 01:22:36 PM »
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मनोज जी धन्यवाद
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With a Quick-Reply you can use bulletin board code and smileys as you would in a normal post, but much more conveniently.


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