आज फ़िर से वही सवाल सदियों पुराना है.......By Kavi Deepak Sharma

by kavyadharateam on October 08, 2008, 07:23:06 AM
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kavyadharateam
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बात घर की मिटाने की करते हैं

तो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैं

बेहिसाब तरकीबें रह - रहकर आती हैं

अनगिनत तरीके बार - बार सिर उठाते हैं ।



घर जिस चिराग से जलना हो तो

लौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती है

ना तो तेल ही दीपक का कम होता है

ना ही तेज़ी से छोटी होती बाती है ।


अगर बात जब एक घर बसाने की हो तो

बमुश्किल एक - आध ख्याल उभर के आता है

तमाम रात सोचकर बहुत मशक्कत के बाद

एक कच्चा सा तरीका कोई निकल के आता है ।


वो चिराग जिससे रोशन घरोंदा होना है

शुष्क हवाओं में भी लगे की लौ अब बुझा

बाती भी तेज़ बले , तेल भी खूब पिए दीया
रौशनी भी मद्धम -मद्धम और कम रौनक सुआ ।


आज फ़िर से वही सवाल सदियों पुराना है

हालत क्यों बदल जाते है मकसद बदलते ही

फितरतें क्यों बदल जाती है चिरागों की अक्सर

घर की देहरी पर और घर के भीतर जलते ही ।

Kavyadhara Team
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