मीरा का प्यार -आर के रस्तोगी

by Ram Krishan Rastogi on May 19, 2018, 07:02:08 PM
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Ram Krishan Rastogi
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तुम मेरे आँख के काजल हो,सुन्दरता के लिए काजल नहीं लगाती हूँ
मेरी आँखों में सदा बसे रहे मनमोहन,इसलिए काजल मै लगाती हूँ

तुम मेरे मन का सांवरे हो,सावरियां बना कर तुम्हे रिझाती हूँ
इसलिए तानपुरा लेकर हाथ में,अपने मन को तुमसे मिलाती हूँ

छोड़ दिया घर-बार मैंने,तुमको ही अपना घर-बार समझती हूँ
मै तुम्हारी हूँ,तुम मेरे हो,इसलिए मै तुम्हे भजन सुनाती हूँ

राज-पाठ से मुझे क्या लेना,मै अपने सावरियां को सजाती हूँ
अपने कमरे को सेज बनाकर, उसे फूलो से रोज  सजाती हूँ

खान-पान की कोई कमी नहीं,उनके लिए छप्पन भोग बनाती हूँ
पहले उनको स्वम भोग लगाकर,बाद में उस को खुद खाती हूँ

यही मेरी दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया है,इसमें सदा मग्न रहती हूँ
ये दुनिया क्या कहती है मुझको,इसकी परवाह मै नहीं करती हूँ

आर के रस्तोगी
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«Reply #1 on: May 20, 2018, 02:39:25 AM »
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तुम मेरे आँख के काजल हो,सुन्दरता के लिए काजल नहीं लगाती हूँ
मेरी आँखों में सदा बसे रहे मनमोहन,इसलिए काजल मै लगाती हूँ

तुम मेरे मन का सांवरे हो,सावरियां बना कर तुम्हे रिझाती हूँ
इसलिए तानपुरा लेकर हाथ में,अपने मन को तुमसे मिलाती हूँ

छोड़ दिया घर-बार मैंने,तुमको ही अपना घर-बार समझती हूँ
मै तुम्हारी हूँ,तुम मेरे हो,इसलिए मै तुम्हे भजन सुनाती हूँ

राज-पाठ से मुझे क्या लेना,मै अपने सावरियां को सजाती हूँ
अपने कमरे को सेज बनाकर, उसे फूलो से रोज  सजाती हूँ

खान-पान की कोई कमी नहीं,उनके लिए छप्पन भोग बनाती हूँ
पहले उनको स्वम भोग लगाकर,बाद में उस को खुद खाती हूँ

यही मेरी दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया है,इसमें सदा मग्न रहती हूँ
ये दुनिया क्या कहती है मुझको,इसकी परवाह मै नहीं करती हूँ

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bahut bharia kyaa kehne.
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«Reply #2 on: May 20, 2018, 01:52:21 PM »
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shri surindran ji shukriya
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«Reply #3 on: May 28, 2018, 01:48:56 AM »
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तुम मेरे आँख के काजल हो,सुन्दरता के लिए काजल नहीं लगाती हूँ
मेरी आँखों में सदा बसे रहे मनमोहन,इसलिए काजल मै लगाती हूँ

तुम मेरे मन का सांवरे हो,सावरियां बना कर तुम्हे रिझाती हूँ
इसलिए तानपुरा लेकर हाथ में,अपने मन को तुमसे मिलाती हूँ

छोड़ दिया घर-बार मैंने,तुमको ही अपना घर-बार समझती हूँ
मै तुम्हारी हूँ,तुम मेरे हो,इसलिए मै तुम्हे भजन सुनाती हूँ

राज-पाठ से मुझे क्या लेना,मै अपने सावरियां को सजाती हूँ
अपने कमरे को सेज बनाकर, उसे फूलो से रोज  सजाती हूँ

खान-पान की कोई कमी नहीं,उनके लिए छप्पन भोग बनाती हूँ
पहले उनको स्वम भोग लगाकर,बाद में उस को खुद खाती हूँ

यही मेरी दिन प्रतिदिन की प्रक्रिया है,इसमें सदा मग्न रहती हूँ
ये दुनिया क्या कहती है मुझको,इसकी परवाह मै नहीं करती हूँ

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sundar rachna rastogi sahab ...bahaut khoob
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«Reply #4 on: May 28, 2018, 10:29:47 AM »
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Shri Jarra sahib shukriya
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