रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्रम् का भावानुवाद............-अरुण मिश्र.

by arunmishra on March 05, 2019, 03:34:05 PM
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रावणकृत शिवताण्डवस्तोत्रम् का भावानुवाद...


        रावणकृत  यह  शिवताण्डव स्तोत्र  न केवल  भक्ति  एवं  भाव के  दृष्टि से अनुपम है

अपितु, काव्य की दृष्टि से भी अद्भुत है। इसकी लयात्मकता, छन्द- प्रवाह,  ध्वनि-सौष्ठव,

अलंकार-छटा,  रस-सृष्टि  एवं  चित्रात्मक संप्रेषणीयता  सब कुछ अत्यन्त आकर्षक एवं

मनोहारी  है।  यह  अप्रतिम  रचना  महामना  रावण  के   विनयशीलता,   पाण्डित्य  एवं

काव्य-लाघव का उत्कृष्ट उदाहरण है।

       अनन्य  भक्ति  की  गंगा,  प्रवहमान  स्वर-ध्वनि  की  यमुना  एवं  उत्कृष्ट काव्य की

सरस्वती की इस त्रिवेणी में अवगाहन के पुण्यलाभ के कृतज्ञतास्वरूप इसके भावानुवाद

का अकिंचन प्रयास किया है। आप भी पुण्यलाभ लें।

      भगवान शिव मेरा एवं समस्त लोक का कल्याण करें।

-अरुण मिश्र.


‘‘अथ शिवताण्डवस्तोत्रम्’’


जटा - वन - निःसृत,   गंगजल    के   प्रवाह   से-

पावन     गले,    विशाल     लम्बी     भुजंगमाल।

डम्-डम्-डम्, डम्-डम्-डम्, डमरू-स्वर पर प्रचंड,

करते   जो   तांडव,  वे   शिव  जी,  कल्याण  करें।।


जटा     के     कटाह    में,    वेगमयी    गंग    के,

चंचल   तरंग - लता   से   शोभित   है    मस्तक।

धग् - धग् - धग्  प्रज्ज्वलित पावक  ललाट पर;

बाल - चन्द्र - शेखर  में   प्रतिक्षण  रति  हो मेरी।।


गिरिजा के  विलास हेतु  धारित  शिरोभूषण  से,

भासित  दिशायें देख, प्रमुदित है   मन  जिनका।

जिनकी  सहज  कृपादृष्टि,  काटे  विपत्ति  कठिन,

ऐसे     दिगम्बर    में,    मन    मेरा    रमा    रहे।।


जटा   के   भुजंगो   के   फणों  के   मणियों   की-

पिंगल  प्रभा, दिग्वधुओं  के  मुख   कुंकुम  मले।

स्निग्ध,   मत्त - गज - चर्म - उत्तरीय  धारण  से,

भूतनाथ   शरण,    मन   अद्भुत     विनोद   लहे।।


इन्द्र   आदि   देवों   के   शीश   के   प्रसूनों   की-

धूलि   से   विधूसर   है,  पाद-पीठिका   जिनकी।

शेष  नाग    की   माला   से     बाँधे  जटा - जूट,

चन्द्रमौलि,  चिरकालिक श्री  का  विस्तार  करें।।


ललाटाग्नि  ज्वाला  के   स्फुलिंग  से   जिसके-

दहे   कामदेव,   और   इन्द्र    नमन   करते   हैं।

चन्द्र की कलाओं से शोभित मस्तिष्क जटिल,

ऐसे  उन्नत  ललाट  शिव  को   मैं   भजता  हूँ ।।



भाल-पट्ट पर कराल,धग-धग-धग जले ज्वाल,

जिसकी    प्रचंडता    में    पंचशर    होम    हुये।

गौरी  के   कुचाग्रों  पर   पत्र - भंग - रचना   के-

एकमेव   शिल्पी,  हो  त्रिलोचन  में   रति  मेरी।।


रात्रि   अमावस्या   की,  घिरे   हों   नवीन  मेघ,

ऐसा   तम,  जिनके   है   कंठ  में   विराजमान।

चन्द्र  और   गंग  की   कलाओं को   शीश  धरे-

जगत्पिता  शिव,  मेरे   श्री  का   विस्तार  करें।।


खिले नील कमलों की,  श्याम वर्ण  हरिणों की,

श्यामलता से  चिह्नित, जिनकी  ग्रीवा  ललाम।

स्मर,पुर,भव, मख, गज, तम औरअन्धक का,

उच्छेदन  करते  हुये  शिव  को,  मैं   भजता हूँ।।


मंगलमयी   गौरी    के    कलामंजरी  का   जो-

चखते    रस - माधुर्य,   लोलुप    मधुप     बने।

स्मर,पुर,भव, मख, गज, तम और अन्धक के,

हैं जो  विनाशक, उन  शिव को  मैं   भजता  हूँ।।


भ्रमित    भुजंगों    के    तीव्र    निःश्वासों    से-

और भी  धधकती  है, भाल  की  कराल अग्नि।

धिमि-धिमि-धिमि मंगल मृदंगों की तुंग ध्वनि-

पर,  प्रचंड  ताण्डवरत्,  शिव जी की  जय होवे।।


पत्तों   की   शैय्या   और    सुन्दर  बिछौनों  में;

सर्प - मणिमाल,   और    पत्थर   में,  रत्नों  में।

तृण  हो  या  कमलनयन  तरुणी; राजा - प्रजा;

सब  में  सम  भाव, सदा  ऐसे  शिव  को  भजूँ।।


गंगा   तट  के   निकुंज - कोटर  में  रहते  हुये,

दुर्मति  से  मुक्त  और   शिर  पर अंजलि  बॉधे।

विह्वल  नेत्रों  में  भर  छवि  ललाम - भाल की,

जपता    शिवमंत्र,   कब    होऊँगा   सुखी   मैं।।


उत्तमोत्तम   इस   स्तुति  को   जो  नर  नित्य,

पढ़ता,   कहता   अथवा    करता   है   स्मरण।

पाता  शिव - भक्ति;  नहीं पाता  गति अन्यथा;

प्राणी   हो  मोहमुक्त,  शंकर   के   चिन्तन  से।।


शिव का कर  पूजन, जो पूजा की  समाप्ति पर,

पढ़ता   प्रदोष    में,   गीत   ये   दशानन   का।

रथ,    गज,    अश्व   से   युक्त,  उसे  अनुकूल,

स्थिर     श्री - सम्पदा,   शंभु    सदा   देते  हैं।।


 “इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्।”

                             *



( पूर्व प्रकाशित।)  


मूल संस्कृत पाठ  :  

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

 

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

 

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

 

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

 

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

 

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

 

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

 

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

 

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

 

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

 

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

 

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

 

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

 

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

 

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

 

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

 

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

 
॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥  

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«Reply #1 on: March 05, 2019, 11:23:53 PM »
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