मेरे वो घर का पता ढूंढते है !

by Sshiv007 on February 14, 2010, 06:04:26 PM
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Sshiv007
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दिलकश मगर कमसिन अदाएँ तो देखो ,अदाओं में अपनी वफा ढूंढते है
वफ़ा की अदाओं में बेवफाई है मिलती ,मगर फिर भी खुद में वफा ढूंढते है

करते है खुद वो खता जब तलक,वफाओं में मेरी खता ढूंढते है
खता जो ना मिलती वफाओं में मेरी ,वफा करने की फिर वो सज़ा ढूंढते है

क़त्ल ए आम जो होते है अदाओं से खुद की,फिर मुस्तफा वो हम सा ढूंढते है
जो कोई ना मिलता यू तन्हा सहारा ,फिर मेरे वोफ घर का पता ढूंढते है

                                       
................मै इस शायरी को दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ ,
आप सभी से माफ़ी चाहूँगा , मुझे ऐसा लगा यह शेर शायद किसी कोने में छिप गया.
जब मै इंटर में था ,तब यह शायरी मैंने लिखी थी,मेरे सभी दोस्तों ने इसे खूब
सराहा था.....चाहूँगा कि आप आप भी  इस शायरी को अपनी खूबसूरत सोच
से सजाये . मै वाकई बहुत प्रोत्साहित होऊंगा ...और आपके सामने अपनी सारी
सोच को खूबसरती से निभाने की पूरी कोशिश करूँगा ..
शुक्रिया , धन्यवाद्
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madhuwesh
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«Reply #1 on: February 14, 2010, 11:29:21 PM »
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Ye kaun si language hai Shiv ji,mujhe nahi padna aataa hai.
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Sshiv007
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«Reply #2 on: February 15, 2010, 07:37:08 AM »
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Ye kaun si language hai Shiv ji,mujhe nahi padna aataa hai.
maine simple hindi hi use kiya hai.....kahi koi galati ho gayi hai..to mafi chahunga...

plz help me out..

regards ,
  Shiv S
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Rajesh Harish
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«Reply #3 on: February 15, 2010, 10:23:41 AM »
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Good one Shiv Ji
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Rishi Agarwal
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«Reply #4 on: February 15, 2010, 11:50:42 AM »
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Bahut Khub Shiv JI Bahut Hi Sunder Likha Hai Aapne ApplauseApplauseApplause
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MANOJ6568
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«Reply #5 on: November 03, 2012, 03:11:22 AM »
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दिलकश मगर कमसिन अदाएँ तो देखो ,अदाओं में अपनी वफा ढूंढते है
वफ़ा की अदाओं में बेवफाई है मिलती ,मगर फिर भी खुद में वफा ढूंढते है

करते है खुद वो खता जब तलक,वफाओं में मेरी खता ढूंढते है
खता जो ना मिलती वफाओं में मेरी ,वफा करने की फिर वो सज़ा ढूंढते है

क़त्ल ए आम जो होते है अदाओं से खुद की,फिर मुस्तफा वो हम सा ढूंढते है
जो कोई ना मिलता यू तन्हा सहारा ,फिर मेरे वोफ घर का पता ढूंढते है

                                       
................मै इस शायरी को दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ ,
आप सभी से माफ़ी चाहूँगा , मुझे ऐसा लगा यह शेर शायद किसी कोने में छिप गया.
जब मै इंटर में था ,तब यह शायरी मैंने लिखी थी,मेरे सभी दोस्तों ने इसे खूब
सराहा था.....चाहूँगा कि आप आप भी  इस शायरी को अपनी खूबसूरत सोच
से सजाये . मै वाकई बहुत प्रोत्साहित होऊंगा ...और आपके सामने अपनी सारी
सोच को खूबसरती से निभाने की पूरी कोशिश करूँगा ..
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