नीम लफ़्ज़ों में

by RAHULCHARAN0190 on May 04, 2016, 12:15:40 PM
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RAHULCHARAN0190
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नीम लफ़्ज़ों में ये हक़ीक़त पेश आई है,
तुम आये हो पेश या मेरी नीयत पेश आई है,

अब तो खुद से भी राब्ता नहीं चाहता ज़हन,
ये किस तरह की बेहूदा कैफियत पेश आई है,

सही कहते हो तुम कि मैं ही बदल गया हूँ शायद,
तुम शुक्र करो क्या खूब ये तबियत पेश आई है.

मेरे खित्ते में तुम अब तक सलामत हो साकी,
यकीं मानो कि मेरी इंसानियत पेश आई है.

हाँ, यकीनन मैं नहीं हूँ काबिल-ए-यकीं,
आज तुम्हे मेरी काबिलियत पेश आई है.

और आखिर तुम भी उन्ही सब में से हो बामाजरत,
तुम्हारे लफ़्ज़ों में उन सब की सूरत पेश आई है.







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kalam k chalne ko zamaana paagalpan samajhta hai.

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«Reply #1 on: May 04, 2016, 07:34:09 PM »
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surindarn
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«Reply #2 on: May 04, 2016, 07:49:47 PM »
नीम लफ़्ज़ों में ये हक़ीक़त पेश आई है,
तुम आये हो पेश या मेरी नीयत पेश आई है,

अब तो खुद से भी राब्ता नहीं चाहता ज़हन,
ये किस तरह की बेहूदा कैफियत पेश आई है,

सही कहते हो तुम कि मैं ही बदल गया हूँ शायद,
तुम शुक्र करो क्या खूब ये तबियत पेश आई है.

मेरे खित्ते में तुम अब तक सलामत हो साकी,
यकीं मानो कि मेरी इंसानियत पेश आई है.

हाँ, यकीनन मैं नहीं हूँ काबिल-ए-यकीं,
आज तुम्हे मेरी काबिलियत पेश आई है.

और आखिर तुम भी उन्ही सब में से हो बामाजरत,
तुम्हारे लफ़्ज़ों में उन सब की सूरत पेश आई है.  shakhsiyat/ khasiyat rymes better.

Bahut bahut umdah peshkash hai waah waah.
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RAHULCHARAN0190
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«Reply #3 on: May 05, 2016, 01:57:50 AM »
Behad Shukriya............//
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«Reply #4 on: May 05, 2016, 04:58:42 AM »
Bahot khub...........wah
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«Reply #5 on: May 05, 2016, 11:09:03 AM »
नीम लफ़्ज़ों में ये हक़ीक़त पेश आई है,
तुम आये हो पेश या मेरी नीयत पेश आई है,

अब तो खुद से भी राब्ता नहीं चाहता ज़हन,
ये किस तरह की बेहूदा कैफियत पेश आई है,

सही कहते हो तुम कि मैं ही बदल गया हूँ शायद,
तुम शुक्र करो क्या खूब ये तबियत पेश आई है.

मेरे खित्ते में तुम अब तक सलामत हो साकी,
यकीं मानो कि मेरी इंसानियत पेश आई है.

हाँ, यकीनन मैं नहीं हूँ काबिल-ए-यकीं,
आज तुम्हे मेरी काबिलियत पेश आई है.

और आखिर तुम भी उन्ही सब में से हो बामाजरत,
तुम्हारे लफ़्ज़ों में उन सब की सूरत पेश आई है.
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