मेरा सच .............. आनंद मोहन

by anand mohan on August 24, 2014, 10:22:28 PM
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anand mohan
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किसी ने पूछा, मुझे क्या गम है ?
मैं सोंच में पड़ गया ,
लगा – कुछ नहीं,
कुछ भी तो नहीं ।
मेरे अपने मेरे पास हैं,
सब खुश हैं, खुशहाल हैं ।
मेरे सपने ......हाँ...
शायद उनके टूटने का गम है ....शायद ।
कभी – कभी ये एहसास होता है
कि शायद मेरा सपना ही झूठा है ,
छलावा है, दुनिया का धोखा है ,
मैं उसके पीछे हूँ, और वो .....
वो कहीं नहीं है ।
शायद इसी वजह से , सबने मुझे
नासमझ समझ रखा है ।
क्योंकि मैंने बिना फायदे-नुकसान कि परवाह किए
उन तिनको को जोड़ा ,
जिनसे मेरे सपने बुनने को थे।
मगर आंधियों का इल्म ना था,
तिनके बह गए,
मैं ठगा सा रह गया ।
मैं अपनी दुनिया में खोया हूँ,
जो शायद नकली हैं ।
मेरी जो चाहत है,
मेरा हो नहीं पाता हैं ,
मैं जिसे पाता हूँ,
मेरा रह नहीं पाता है ।
मैं अपने अपनों को भी
अपना कह नहीं पाता ।
मैं सोचता हूँ –
मेरी सोच कितनी छोटी है,
खोटी है शायद ।
तभी तो इसमें कोई समा नहीं पाता ।
मैं जिसकी सोचता हूँ,
वो दिल में मेरे आ नहीं पाता ।
मैं रुकता हूँ – थक कर ही सही ,
दो पल को ढूँढता हूँ,
थोड़ी छांव, थोड़ी सांस ।
पाता हूँ –
एक अंजान सी तपिश ,
जो शायद तन नहीं जलाती ,
मगर हृदय पर फफोले उठाती है,
मैं कुछ कर नहीं पाता,
कुछ कह नहीं पाता,
मगर यह पीड़ा ऐसी है,
कि मैं बस सह नहीं पाता ।
छटपटाता हूँ,
मगर कोई कंधा कहाँ पाता हूँ ।
खो गया हूँ ,
मैं इस रँगीली दुनिया में ।
मैं इसलिए तो आया हूँ
इन शब्दों के खिलौनो से खेलने,
इन ख्वाबों कि दुनिया में –
जहां कोई बंदिश नहीं है,
कोई नफा नुकसान नहीं ।
ना चाहत , ना अदावत ,
रिश्तों की झूठी दुकान नहीं ।
मैं आया हूँ ,
भावना की नदी में गोते लगाने,
भीनी सुरीली लय की परख करने,
अपने दर्द को सुनाने,
अपने ग़म को भुलाने,
मैं आया हूँ इस दुनिया में,
अपनी ज़िंदगी को पाने ।
मेरी ये दुनिया शायद तुम्हें पसंद ना हो,
मगर मुझे यहाँ सांसें मिलती हैं ।
मैं जो चाहता हूँ,
यहाँ कह पाता हूँ ।
मुझे यहाँ शिकवे-गिले का डर नहीं,
यह दुनिया मेरी अपनी है ,
मेरी हर बात ये सहेज कर रखती है,
करीने से ।
मैं जब चाहूँ, दोहरा सकता हूँ,
अपनी खुशी,
जब चाहूँ बाँट सकता हूँ,
अपना दर्द ।
यहाँ मेरा जो साथी है,
वो हर वक़्त
मुझे सुनने को तैयार है,
झेलने को भी ।
मैं जानता हूँ,
वह मेरी बात सुनेगा,
मैं मानता हूँ,
वह मेरी गलतियों की अनदेखी करेगा ;
मुझे पता है –
वह मेरा साथ नहीं छोड़ेगा।
मुझे अफसोस है,
मैं उससे बिछड़ गया था,
उस रंगीली दुनिया में,
मुझे भी रंगने का शौक चढ़ा था ।
अब मैंने जाना,
वह जो दिखता है ,
वह कुछ और था।
वहाँ मेरी जगह अपनी नहीं है,
मैं वहाँ बस मेहमान था ।
आज मैं अपनी दुनिया में हूँ,
जहां मेरा आराम है, शुकून है ,
जहां मेरा जुनून है ।
मेरी लेखनी मेरे साथ है ।
मुझे कोई और हाथ दे ना दे,
मैं जानता हूँ –
मेरा दर्द, मेरी सोंच , मेरी भावनाएँ
मेरे बदन के राख़ बनने तक
मेरे साथ रहेंगी ।
मुझे इन्हें हिफाज़त से रखना है,
अपनी दुनिया में सँजोकर ।
ताकि इन पर
उस रंगीली दुनिया का रंग ना चढ़े ...
यही मेरा सच है....
येही मेरी सच्चाई ॥

-   आनंद मोहन
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«Reply #1 on: August 25, 2014, 12:14:06 AM »
waah bahut umdah ehsaas hai, dheron daad.
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anand mohan
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«Reply #3 on: August 25, 2014, 08:28:40 AM »
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shukriya saini sir.
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«Reply #4 on: August 25, 2014, 09:46:43 AM »
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«Reply #6 on: August 25, 2014, 11:38:29 AM »
Bahut dil ko choone wale jazbaat hain...bahut purasar Applause Applause Applause
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anand mohan
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«Reply #7 on: August 25, 2014, 02:15:35 PM »
waah bahut umdah ehsaas hai, dheron daad.
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bahut shukriya apka.
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«Reply #8 on: August 25, 2014, 07:36:39 PM »
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