कबूतर bekarar

by bekarar on January 25, 2011, 10:43:04 PM
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it's a true story...

मे कोई पक्षी प्रेमी नही हूँ मगर कोई विरोध भी नही है, फौर्थ फ्लोर के मेरे फ्लॅट मे कबूतरों का आना जाना कोई नया नही है, लेकिन ज़्यादातर खिड़की दरवाज़े बंद रहते हैं और यूँ भी ठंड का सा ही मौसम है सो घर के अंदर ना के बराबर ही आते हैं, लेकिन बोलकोनी पे क़ब्ज़ा जमाए बैठे रहते हैं कभी दो कभी चार बस इससे ज़्यादा नही,
कबूतर होते है बहूत शर्मीले या डरपोक कह लो, ज़रा सी आवाज़ हुई और फुररर्र्र्ररर.
खैर वैसे भी मेरा बोलकोनी मे आना-जाना कम ही होता है..अब शादी-शुदा आदमी बोलकोनी मे जाए भी क्यूँ.....
लेकिन बेटे को बहलाने के लिए कभी कभार चले जाते हैं बोलकोनी मे......पिछले दीनो कहीं किसी पनवाड़ी की दुकान पे या कहीं पर एक स्टिकर लगा हुआ था जिस पे पाँच जीव-जंतुओं के नाम लिखे थे और लिखा था की इन्हे दाना-पानी देने से लाभ होता है .....किस जीव को क्या देने से क्या लाभ होता है ये तो कुछ ठीक से याद नही पर आपलोगों की जिग्यासा शांत करने के लिए लिख देता हूँ....चिटी को आटा, मछली को दाना, गाय को रोटी, कबूतर को दाना, और कुत्ते को रोटी..खिलानी चाहिए, इससे व्यापार मे वृद्धि, ऋण से मुक्ति, घर मे शांति, दुश्मनो से तनाव समाप्ति इत्यादि फ़ायदे लिखे थे....
हालाकी मे अंध-विश्वासी भी नही हूँ...मगर जब बोलकोनी मे कबूतर आते हैं तो दाना डालने मे क्या जाता है.....फिर भले ही अंध-विश्वास को ना माने लेकिन दिल के किसी कोने मे ये सब चिसें चिपकी रह जाती हैं....तो बस जब याद आता बोलकोनी मे कबूतरों की पार्टी कर देते.......घरवाली के विरोध के बावज़ूद अब ये नियमित हो गया...घरवाली का तर्क होता की दाना खाते भी यही है और पचाते भी यहीं है...बोलकोनी मे गंदगी हो जाती है फिर सब लोग कहते हैं (यानी अडोस-पड़ोसी) की कबूतरो का घर मे रहना शुभ नही होता फिर मे जवाब मे पाच जीवों के पुण्य वाला हिसाब-किताब समझाता..या चुप्पी लगा लेता लेकिन करता फिर वही.....हाँ इस कहा-सुनी मे प्रिन्स का साथ मुझे ही मिलता... बेटे का खेल हो जाता बाप का पुण्य...

पिछले दीनो कहानी मे ट्विस्ट आ गया...कबूतर का न्यूली वेड कपल शायद हनिमून मनाके सीधा मेरी बोलकोनी मे ही लॅंड कर गया मादा गर्भवती थी ..सुबह उठे तो बेटे ने बताया....पापा पिजन ने अंडा दिया....घरवाली का मूड खराब हो गया बोली उठा के फेंक दो बाहर, मे भी इस आकस्मिक घटना से भोंचक सा ही था......ऐसा फल मिलेगा पुण्य का ये तो सोचा नही था.....जो भी हो मैने मन ही मन सोच लिया की जब अंडा दे ही दिया है तो अब बच्चा भी निकलने ही दो....बीवी को कहा की अंडा तोड़ने से पाप लगेगा हत्या का,, ब्राह्मण परिवार के संस्कार हैं तो ज़्यादा परेशानी नही हुई......

शेष भाग कल..............
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«Reply #1 on: January 31, 2011, 11:34:13 PM »
वहाँ बोलकोनी मे एक नल है और पानी पाइप लाइन मे जाने के लिए एक मुहाना है जिसका मुँह एक लोहे की जाली से बंद है ठीक उसी जाली पे कबूतर ने अंडा दिया था, तो अब ये निर्णय लिया गया की कोई भी बोलकोनी मे लगे नल का इस्तेमाल नही करेगा..हालाँकि वो इस्तेमाल भी कम ही होता है, ताकि अंडे को कोई नुकसान ना पंहुचे, बेटे की खुशी का कोई ठिकाना नही था जब मैने उसे बताया की इसमे से कुछ दिन बाद पिजन का छोटा सा नन्हा सा बच्चा निकलेगा....कितनी अज़ीब बात है की
बचपन मे हर छोटी छोटी चीज़ भी किसी उत्सव की तरह होती है, और बड़े होने के बाद ...बड़े बड़े उत्सव भी महज़ औपचारिकता ही बन कर रह जाते हैं,.......वैसे थोड़ा उत्सुक तो मे भी था क्यूंकी ये मेरे जीवन की भी पहली घटना थी की मे इतने करीब से कबूतर के पैदा होने की घटना देख रहा था, लेकिन उत्सुकता और खुशी मे जो फ़र्क़ होता है वो मेरे चेहरे के भाव और मेरे बेटे के चेहरे के भावों से आसानी से पढ़ा जा सकता था, ...

अब कबूतर ने दूसरा भी अंडा दे दिया था.......और अब ज़्यादातर समय कबूतरी उस अंडे पर बैठी रहती थी जिसे अंडे सेने की प्रक्रिया कहते हैं, प्रिन्स  (मेरा बेटा) सुबह उठ-कर सबसे पहले बोलकोनी मे खुलने वाली विंडो खोलकर देखता की पिजन को बच्चा आया की नही ..और कबूतरी को अंडे पे बैठा हुआ पाता फिर मुझे उठा कर बताता की अभी तक बच्चा नही आया, .....इधर कबूतरी दिन रात अंडे पे ही बैठी रहती, चूँकि मे उसे केवल सुबह और शाम को ही देख पता था.....अरे भाई ऑफीस भी तो जाना होता है ना........लेकिन जब भी घर वापस आता तो कबूतरी को वहीं बैठे हुए पाता...तीन चार दिन के बाद मैने अपनी पत्नी से पूछा की ये दिन मे खाना- वाना खाने के लिए तो जाती होगी......पत्नी ने कहा की उसने भी हमेशा उसे अंडे के उपर ही बैठा देखा है..........पता नही खाना भी खाती है की नही ये .....
बात को आगे बढ़ाते हुए पत्नी ने कहा......ममता चीज़ ही ऐसी होती है खाना पीना सब भूल गई है ये....और अब इसके पास जाने पर ये डर कर उड़ती नही, भागती नही, बैठी रहती है, वहीं पर ..ममता ने इसकी हिम्मत भी बढ़ा दी है.......................मन ही मन मे भी कबूतरी की ममता का लोहा मान गया था......और इधर पत्नी की बात माता से पिता की तरफ आ गई थी........
पत्नी:- "मे दिन मे जब भी इसे देखती हूँ इसी तरह बैठी रहती है लेकिन इन अंडों का बाप (यानी नर कबूतर) को यहाँ कभी नही देखा.............हालाँकि ये बात मैने भी महसूस की थी मगर कह देता तो पत्नी के व्यंगया बान सहने पड़ते ,और बात कबूतरों से निकालकर पुरुष जाति पे आने की पूरी संभावना थी....मैने दबे स्वर मे पत्नी से कहा ...हो सकता है पुरुष कबूतरों की कुछ और ज़िम्मेदारी हो,.........
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«Reply #2 on: February 01, 2011, 12:01:04 AM »
"वाह जी वाह कबूतर हो या आदमी सब बच्चों की ज़िम्मेदारियों से बचना चाहते हैं, मैने तो यही देखा है ज़्यादा-तर"
पत्नी ने कहा,
ठीक उसी वक़्त भगवान ने मेरी लाज बचाने के लिए एक और कबूतर को बोलकोनी मे भेज दिया.....मुझे पता नही था की वो कबूतर "नर" है या "मादा" लेकिन मैने लगभग चिल्लाते हुए कहा.." देखो देखो वो आ गया इन अंडों का पिता" ....
पत्नी कहाँ मानने वाली थी उसने उसे मौसी साबित कर दिया.......
खैर मुक़दमा सबूतों के अभाव मे खारिज हो गया......बहरहाल प्रिन्स से एप्रिल फूल खेलने का एक नायाब तरीका मेरे हाथ ज़रूर लग गया, बस करना ये होता की बोलकोनी की विंडो के पास गये थोड़ी विंडो खोली और उट-पटांग तरीके से उछलते हुए सुर मे चिल्लाता "पिजन के बच्चा आया.... पिजन के बच्चा आया........ पिजन के बच्चा आया..........बस वो कहीं भी होता दौड़कर चला आता.........विंडो मे देखता और हंसता फिर मे कहता .....प्रिन्स को बुध्धु बनाया और फिर दोनो हंसते.......तुरंत ही वो ये खेल मेरे साथ खेलता तो जान-बूझकर मे भी बुद्धु बनता....फिर वो हंसता...दुनिया का हर पिता जान-बूझकर बुद्धू बन जाता है अपने पुत्र से........लेकिन क्यूँ बड़ा होने के बाद बेटा झूठ-मूठ भी पिता की खुशी के लिए बुद्धू नही बनते..(कौवे और पिता-पुत्र की कहानी याद आ गई)..खैर...कुल मिला-कर सब-कुछ ठीक-ठाक था.......लेकिन जब पाँच दिन हो गये और बच्चे नही निकले तो मैने "गूगल बाबा" की शरण ली...तब मालूम हुआ की अंडे सेने मे कबूतरों को 18 दिन का समय लगता है........और ये भी पता लगा की कबूतरों के बच्चे पैदा होने के बाद दिखने मे थोड़े डरावने से ही लगते हैं...........खैर...मैने अपनी पत्नी और बेटे को बता दिया की अभी टाइम है....तब तक उस कबूतरी के खाने पीने का इंतज़ाम भी बिल्कुल अंडों के पास ही कर दिया ताकि उसे बिना उठे ही खाने-पीने मे आसानी हो.
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