मालिक ने बनाया सब को एक-सा इंसान.-----------------"Sagar"

by Advo.RavinderaRavi on October 22, 2015, 09:30:25 PM
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Advo.RavinderaRavi
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आज-कल के माहोल को देख दिल दुखी  हो  जाता है.!
हम बँट चुके हैं,कभी-कभी इंसानियत ही भूल जाते हैं.!
हम कितने  खुशकिस्मत  हैं रब्ब ने हमें ज़ुबान दी है.!
बोल सकते  हैं अपनी  भावनायें  व्यक्त कर सकते हैं.!
उन बेज़ुबानों को देखें जो सिर्फ़ नाम के लिए ज़िंदा हैं.!
काश ! वक़्त रहते संभाल जायें तो कितना अच्छा हो.?


एक और  अपनी लिखी नयी ग़ज़ल पेश-खिदमत है :–


मालिक ने बनाया  है  सब को  एक-सा इंसान.!
हमने  बनाया  है  सिख   ईसाई  हिंदू मुसलमान.!!

किसी  एक से  नहीं  होती  मज़हब  की  पहचान.!
हर  मज़हब  में   होते   सब  मज़हब  के क़दरदान.!!

क़ुदरत  ने  नवाज़ा  है  सब को एक-सा ईमान.!
दिल  खोल  कर  रब्ब  है  हुआ  सब  पे मेहरबान.!!

जात – पात या मज़हब के नाम से क्यूँ लड़ते हो.!
नादान दंगाई हरक़तों से है वो खुदा भी हेरान.!!

मंदिर मस्ज़िद की ईंट में पसीना सबका लगा.!
“सागर” फिर  क्यूँ  हुआ है भाई  से  भाई परेशान.!!
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«Reply #1 on: October 23, 2015, 05:34:39 AM »
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bahut khub likha aapne Clapping Smiley Clapping Smiley Clapping Smiley
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adil bechain
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«Reply #2 on: October 24, 2015, 08:23:59 AM »
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आज-कल के माहोल को देख दिल दुखी  हो  जाता है.!
हम बँट चुके हैं,कभी-कभी इंसानियत ही भूल जाते हैं.!
हम कितने  खुशकिस्मत  हैं रब्ब ने हमें ज़ुबान दी है.!
बोल सकते  हैं अपनी  भावनायें  व्यक्त कर सकते हैं.!
उन बेज़ुबानों को देखें जो सिर्फ़ नाम के लिए ज़िंदा हैं.!
काश ! वक़्त रहते संभाल जायें तो कितना अच्छा हो.?


एक और  अपनी लिखी नयी ग़ज़ल पेश-खिदमत है :–


मालिक ने बनाया  है  सब को  एक-सा इंसान.!
हमने  बनाया  है  सिख   ईसाई  हिंदू मुसलमान.!!

किसी  एक से  नहीं  होती  मज़हब  की  पहचान.!
हर  मज़हब  में   होते   सब  मज़हब  के क़दरदान.!!

क़ुदरत  ने  नवाज़ा  है  सब को एक-सा ईमान.!
दिल  खोल  कर  रब्ब  है  हुआ  सब  पे मेहरबान.!!

जात – पात या मज़हब के नाम से क्यूँ लड़ते हो.!
नादान दंगाई हरक़तों से है वो खुदा भी हेरान.!!

मंदिर मस्ज़िद की ईंट में पसीना सबका लगा.!
“सागर” फिर  क्यूँ  हुआ है भाई  से  भाई परेशान.!!



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«Reply #3 on: October 25, 2015, 06:15:00 AM »
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Bas waaaah hi waaah  Applause Applause Applause Applause Applause Applause Applause

जात – पात या मज़हब के नाम से क्यूँ लड़ते हो.!
नादान दंगाई हरक़तों से है वो खुदा भी हेरान.!!

मंदिर मस्ज़िद की ईंट में पसीना सबका लगा.!
“सागर” फिर  क्यूँ  हुआ है भाई  से  भाई परेशान.!!
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kalam k chalne ko zamaana paagalpan samajhta hai.

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«Reply #4 on: November 03, 2015, 01:31:25 PM »
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