चाहतों का भी कोई सिरा नहीं मिलता.

by charanjit chandwal on September 26, 2011, 04:08:22 PM
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charanjit chandwal
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इतने बड़े शहर हैं यहाँ क्या नहीं मिलता,
पर चाहतों का भी कोई सिरा नहीं मिलता.

उलझा हूँ उसी मोड़ पे बिछुड़े थे हम जहाँ,
उस मोड़ से आगे मुझे रस्ता नहीं मिलता.

पूछ्ते हो किन से जन्नत वो भी खाली हाथ,  
दोजख का जिनसे मुफ़्त में पता नहीं मिलता.  

सदियों से चल रहे हैं पर पहुँचे कहाँ हैं लोग,
घर में खुदा के भी जिन्हें खुदा नहीं मिलता.

नुक्ता निगाही से मेरी जब आगए आजिज़,
बोले तेरे मतलब का अब सौदा नहीं मिलता.

साक़ी  तेरी नज़र को मैं दरिया कहूँ तो क्यों,
पीने को जब एक भी क़तरा नहीं मिलता.

ना पूछ ‘चंदन’ हाल है हर हाथ में कासा,
और खुला कोई भी दरवाज़ा नहीं मिलता.

                 -चंदन
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«Reply #1 on: September 26, 2011, 04:11:34 PM »
इतने बड़े शहर हैं यहाँ क्या नहीं मिलता,
पर चाहतों का भी कोई सिरा नहीं मिलता.

उलझा हूँ उसी मोड़ पे बिछुड़े थे हम जहाँ,
उस मोड़ से आगे मुझे रस्ता नहीं मिलता.

पूछ्ते हो किन से जन्नत वो भी खाली हाथ,   
दोजख का जिनसे मुफ़्त में पता नहीं मिलता.   

सदियों से चल रहे हैं पर पहुँचे कहाँ हैं लोग,
घर में खुदा के भी जिन्हें खुदा नहीं मिलता.

नुक्ता निगाही से मेरी जब आगए आजिज़,
बोले तेरे मतलब का अब सौदा नहीं मिलता.

साक़ी  तेरी नज़र को मैं दरिया कहूँ तो क्यों,
पीने को जब एक भी क़तरा नहीं मिलता.

ना पूछ ‘चंदन’ हाल है हर हाथ में कासा,
और खुला कोई भी दरवाज़ा नहीं मिलता.

                 -चंदन

Just Excellent!!!

Bahut Bahut Khooob Channdanji..Lajawaab

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khujli
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«Reply #2 on: September 26, 2011, 04:16:09 PM »
इतने बड़े शहर हैं यहाँ क्या नहीं मिलता,
पर चाहतों का भी कोई सिरा नहीं मिलता.

उलझा हूँ उसी मोड़ पे बिछुड़े थे हम जहाँ,
उस मोड़ से आगे मुझे रस्ता नहीं मिलता.

पूछ्ते हो किन से जन्नत वो भी खाली हाथ,   
दोजख का जिनसे मुफ़्त में पता नहीं मिलता.   

सदियों से चल रहे हैं पर पहुँचे कहाँ हैं लोग,
घर में खुदा के भी जिन्हें खुदा नहीं मिलता.

नुक्ता निगाही से मेरी जब आगए आजिज़,
बोले तेरे मतलब का अब सौदा नहीं मिलता.

साक़ी  तेरी नज़र को मैं दरिया कहूँ तो क्यों,
पीने को जब एक भी क़तरा नहीं मिलता.

ना पूछ ‘चंदन’ हाल है हर हाथ में कासा,
और खुला कोई भी दरवाज़ा नहीं मिलता.

                 -चंदन



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«Reply #3 on: November 06, 2011, 07:28:58 PM »
इतने बड़े शहर हैं यहाँ क्या नहीं मिलता,
पर चाहतों का भी कोई सिरा नहीं मिलता.  Applause

उलझा हूँ उसी मोड़ पे बिछुड़े थे हम जहाँ,
उस मोड़ से आगे मुझे रस्ता नहीं मिलता.

पूछ्ते हो किन से जन्नत वो भी खाली हाथ,  
दोजख का जिनसे मुफ़्त में पता नहीं मिलता.  

सदियों से चल रहे हैं पर पहुँचे कहाँ हैं लोग,
घर में खुदा के भी जिन्हें खुदा नहीं मिलता.

नुक्ता निगाही से मेरी जब आगए आजिज़,
बोले तेरे मतलब का अब सौदा नहीं मिलता.

साक़ी  तेरी नज़र को मैं दरिया कहूँ तो क्यों,
पीने को जब एक भी क़तरा नहीं मिलता.  Applause Applause Applause Applause

ना पूछ ‘चंदन’ हाल है हर हाथ में कासा,
और खुला कोई भी दरवाज़ा नहीं मिलता.  Applause Applause

                 -चंदन

Bahut Bahut Khoob Chandan ji
Likhte rahiye, rukiye nahi
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charanjit chandwal
Guest
«Reply #4 on: December 04, 2011, 01:21:29 PM »
Bahut Bahut Khoob Chandan ji
Likhte rahiye, rukiye nahi
AAkI tafseeli daad ke liye shukryaa MKV
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