प्रेम-तत्त्व

by devanshukashyap on February 25, 2011, 05:59:57 PM
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devanshukashyap
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इस धरा पे मैं फिर जन्मा हूँ
मुझे उस तत्त्व कि तलाश है,
जो है सौम्य, अति मनभावन,
जो इस सृष्टि में विद्यमान है |

सोचता रहता हूँ क्या है वो
जिसे पाने पुनः अवतरित हुआ हूँ,
क्या वह वस्तु है? या कोइ भाव है?
सर्वत: जिससे वांछित रहा हूँ |

घोर नियम धर कड़ी तपस्या
क्यों ना मेरी फलीभूत हुई?
क्यूँ आया मैं इस धरा पे फिर से
क्यूँ ना मेरी परिपूर्ति हुई ?

सहसा हुई नुपुरों कि छन छन
अब वाम कोष झंकृत हुआ,
आती दिखी प्रियतमा मुझे तुम
इस सृष्टि का सार सार्थक हुआ |

नमन है तुमको हे वामांगी
बस तुम्हारी ही तलाश थी
युगों युगों से भूला था जिसे
सर्वत: मेरे तुम विद्यमान थी |

ज्ञात हुआ है अब यह मुझको
प्रेम ही सार है इस जीवन का ,
जो है परम सत्य, अति पावन
जो है परम तत्त्व इस जग का |

इस सृष्टि का अणु परमाणु
प्रीत द्वार का रागी है,
नभ के सूरज चाँद – सितारे
इस बात के साक्षी हैं |

गौलोक के मेरे स्वामी
राधा संग ही पूरण हैं ,
जब तक स्मरें ना हम राधे को
तब तक वे ना आते हैं |

स्पर्श तेरा करने जब आया
छम से घुल गई व्योम में तुम,
जागृत हुई मुझमें अब मृगतृष्णा
जिसकी तृप्ति थी केवल तुम |

बन हठयोगी अब मैं हठ साधी
तेरी प्राप्ति कि अब धुन लागी,
पावन राम नाम माला धर
तव नाम का हो गया मैं वैरागी |

प्रतिदिन प्रतिपल हर इक श्वास ले
नाम तेरा जपता रहता हूँ,
संजोग दिवस के मधुर क्षणों का
नित चिंतन करता रहता हूँ |

हर उद्यान के हर इक पुष्प में
तेरे मुख का दर्शन है ,
सुंदर निश्चल मधुर खगोँ का,
राग तेरा ही दर्पण है |

चहुँ दिशा से बहती वायु
स्पर्श तेरा मुझे करवाती है,
और इस मंद पवना के शुभ कर
प्रेम कलश तेरा छलकातीं है |

अब तक नैन टिकाये हूँ मैं
उस ही सुंदर से पथ पे ,
मेरे अवतरण के उत्तर हेतु
संजोग हुआ था जहाँ तुझसे |

सहस्त्र सूर्यों सी आभा जागी
आयी पुनः तुम उस पथ पे,
अब होगा तप मेरा परिपूरण
हमारे मिलन कि वेला पे |

हे प्रियतमा , हे अर्धांगिनी,
धन्य हो तुम यह तत्त्व धरे,
पुरुष तत्त्व की पूर्ति तुम करती,
यह ब्रह्मांड है तुमसे चले |

अति शीघ्र अब तुम आ जाओ
तनिक भी मत विलंब करो,
अपनी शक्ति का ‘इ’ मुझको दे,
शव से मुझे शिव कर दो |

अति शीघ्र अब तुम आ जाओ
तनिक भी मत विलंब करो,
अपनी शक्ति का ‘इ’ मुझको दे,
शव से मुझे शिव कर दो |

संकलित द्वारा :
देवांशु कश्यप
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