Parivartan (the change) -'Adab'

by drpandey on December 27, 2012, 02:04:46 AM
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drpandey
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~~~परिवर्तन~~~

स्वर्णिम प्रभात की नव बेला,
था दिग-दिगंत उन्माद भरा !
खग के कलरव थे पंचम में,
मानष में अगम पराग भरा !
***
पुरवाई का मंद पवन था,
और उपवन था हरा-भरा!
कली एक थी अलसाई सी,
नयनों में मधुमास भरा !
***
ऊषा के रक्तिम किरणों से,
प्रथम मिलन की प्यास लिए!
थी अंगड़ाई ले रही कली
तरुणाई का इतिहास लिए !
***
मादकता की प्रथम लहर का
लेकर भौरों ने चुम्बन !
हँसने पर मजबूर कर गई,
अंसुमाली की प्रथम किरन !
***
झूम-झूम कर पुरवाई में,
दिग-दिग का कर आलिंगन!
पुलक-पुलक कर सिहर रही थी,
लख कर निज तन-मन यौवन !
***
आकर्षित कर रही पथिक को,
अपने पर इठला-इठला कर !
इतराती थी बल खाती थी,
अपने किस्मत के ऊपर !
***
वहीँ पास में पड़ा हुआ था,
राज मिश्रित इक शिलाखंड!
जो सहता था मर्दन पद का,
भुगत रहा था प्रबल दंड !
***
बनी हुई थी इक पगडण्डी,
वहीँ निकट में वर्षों से !
वक्ष हुआ निस्त्रण था जिसका,
पद के दारुण स्पर्शों से !
***
हंसकर मुड़ी कली मदमाती,
पबि पर व्यंग प्रहार किया!
कबसे पड़े यहाँ मतवाले,
कभी किसी ने प्यार किया ?
***
देखो मुझको दो पल की हूँ,
फिरभी कितना प्यार मिला !
जीवन इसको कहते हैं,
तुमतो ठहरे निरा शिला !
***
पत्थर रखकर उर पर अपने,
पैने तीरों को सह-सह कर !
मौन दिगंबर सा बैठा था,
कठिन दंड वर्षों सहकर !
***
लेकिन चक्र हुआ पूरा जब,
पबि पर अमिय प्रपात हुआ!
इक मूर्तिकार गुजरा पथ से,
विस्मृति का प्रथम प्रभात हुआ!
***
कुछ मधुर पुष्प के यौवन थे,
मदमाती हुई दिशाएं थीं !
सौरभ द्रोणी में भर-भर कर,
फैलाती हुई हवाएं थें !
***
फिर एक कल्पना प्रबल हुई,
साकार रूप होकर निकला !
उस मूर्तिकार के उर को वह,
पत्थर जब छू कर निकला !
***
क्या था फिर छेनी और हथौड़े से,
इक मधुर राग छेड़ा उसने !
निज कुशल कला तन्मयता से,
उस पत्थर को तोडा उसने !
***
धीरे-धीरे फिर सहला कर,
इक हल्का सा आकार दिया!
कुछ मधुर तिक्त आघातों से,
निज कल्पित अंग उभार दिया!
***
इक सुन्दर सी मूरत बनकर,
उस शिलाखंड का उदय हुआ !
तब सत्यम शिवम् सुन्दरम का,
उस कलाकृति में विलय हुआ !
***
जब ओंकार की ध्वनि निकली,
मंदिर के प्रथम कपाटों से !
तब स्वेद विन्दु रिसकर निकले,
मानव के श्रमित ललाटों से !
***
खुद गढ़कर निज आराध्य देव,
शिव शंकर की प्रतिमा उसने !
कर प्राण प्रतिष्ठा शम्भू की,
विधिवत फिर नमन किया उसने !
***
कुछ पल पहले जो पथिक वहां,
रुकते थे सौरभ लेने को !
अब वाही वहां पर आते आते हैं,
पत्थर का पद-राज लेने को !
***
फिर एक भक्त आया पथ से,
मन में श्रधा विश्वाश लिए !
हाथों में जल का पात्र लिए,
होठों पर नमः शिवाय लिए !
***
शिव को अर्पित कर तंदुल-तिल,
जल से पूरित इक पात्र पुनः !
कुछ पुष्प समर्पित कर उसने,
लौटा पथ से श्रद्धालु पुनः !
***
वह कली भी वहीँ समर्पित थी,
उन चन्द अरघ के पुष्पों में !
कुछ पल पहले इतराती थी,
अब पड़ी  हुई थी चरणों में !
***
देखा जब पत्थर ने उसको,
जो शंकर बना व्यवस्थित था!
अभिमान तनिक भी पर न हुआ,
ना कली देख कर विचलित था !
***
यह परिवर्तन का नर्तन है,
अब पत्थर बना दिगंबर है !
एक कली अभी मतवाली थी,
उसका सर उसके पगपर है !!
*****

- डा. एच. पी. पाण्डेय 'अदब'
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«Reply #1 on: December 27, 2012, 02:50:53 AM »
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bahut hi umda likhi kavita hai bahut hi khoob likha hai sir aapne
jitni taarif ki jaaye utna kam
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«Reply #2 on: December 27, 2012, 06:25:49 AM »
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वह कली भी वहीँ समर्पित थी,
उन चन्द अरघ के पुष्पों में !
कुछ पल पहले इतराती थी,
अब पड़ी  हुई थी चरणों में !
bahut sahi
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dheru daad
mubarik kabul kijiye
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«Reply #3 on: December 27, 2012, 07:15:58 AM »
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«Reply #4 on: December 27, 2012, 09:48:40 AM »
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«Reply #5 on: December 27, 2012, 10:08:17 AM »
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bahut hi umda likhi kavita hai bahut hi khoob likha hai sir aapne
jitni taarif ki jaaye utna kam

Bahut bahut dhanyvaad Pritam Tripathi Ji...!!
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«Reply #6 on: December 27, 2012, 10:10:31 AM »
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वह कली भी वहीँ समर्पित थी,
उन चन्द अरघ के पुष्पों में !
कुछ पल पहले इतराती थी,
अब पड़ी  हुई थी चरणों में !
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«Reply #7 on: December 27, 2012, 10:16:46 AM »
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«Reply #8 on: December 27, 2012, 11:45:31 AM »
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स्वर्णिम प्रभात की नव बेला,
था दिग-दिगंत उन्माद भरा !
खग के कलरव थे पंचम में,
मानष में अगम पराग भरा !
***
पुरवाई का मंद पवन था,
और उपवन था हरा-भरा!
कली एक थी अलसाई सी,
नयनों में मधुमास भरा !
***
ऊषा के रक्तिम किरणों से,
प्रथम मिलन की प्यास लिए!
थी अंगड़ाई ले रही कली
तरुणाई का इतिहास लिए !
***
मादकता की प्रथम लहर का
लेकर भौरों ने चुम्बन !
हँसने पर मजबूर कर गई,
अंसुमाली की प्रथम किरन !
***
झूम-झूम कर पुरवाई में,
दिग-दिग का कर आलिंगन!
पुलक-पुलक कर सिहर रही थी,
लख कर निज तन-मन यौवन !
***
आकर्षित कर रही पथिक को,
अपने पर इठला-इठला कर !
इतराती थी बल खाती थी,
अपने किस्मत के ऊपर !
***
वहीँ पास में पड़ा हुआ था,
राज मिश्रित इक शिलाखंड!
जो सहता था मर्दन पद का,
भुगत रहा था प्रबल दंड !
***
बनी हुई थी इक पगडण्डी,
वहीँ निकट में वर्षों से !
वक्ष हुआ निस्त्रण था जिसका,
पद के दारुण स्पर्शों से !
***
हंसकर मुड़ी कली मदमाती,
पबि पर व्यंग प्रहार किया!
कबसे पड़े यहाँ मतवाले,
कभी किसी ने प्यार किया ?
***
देखो मुझको दो पल की हूँ,
फिरभी कितना प्यार मिला !
जीवन इसको कहते हैं,
तुमतो ठहरे निरा शिला !
***
पत्थर रखकर उर पर अपने,
पैने तीरों को सह-सह कर !
मौन दिगंबर सा बैठा था,
कठिन दंड वर्षों सहकर !
***
लेकिन चक्र हुआ पूरा जब,
पबि पर अमिय प्रपात हुआ!
इक मूर्तिकार गुजरा पथ से,
विस्मृति का प्रथम प्रभात हुआ!
***
कुछ मधुर पुष्प के यौवन थे,
मदमाती हुई दिशाएं थीं !
सौरभ द्रोणी में भर-भर कर,
फैलाती हुई हवाएं थें !
***
फिर एक कल्पना प्रबल हुई,
साकार रूप होकर निकला !
उस मूर्तिकार के उर को वह,
पत्थर जब छू कर निकला !
***
क्या था फिर छेनी और हथौड़े से,
इक मधुर राग छेड़ा उसने !
निज कुशल कला तन्मयता से,
उस पत्थर को तोडा उसने !
***
धीरे-धीरे फिर सहला कर,
इक हल्का सा आकार दिया!
कुछ मधुर तिक्त आघातों से,
निज कल्पित अंग उभार दिया!
***
इक सुन्दर सी मूरत बनकर,
उस शिलाखंड का उदय हुआ !
तब सत्यम शिवम् सुन्दरम का,
उस कलाकृति में विलय हुआ !
***
जब ओंकार की ध्वनि निकली,
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तब स्वेद विन्दु रिसकर निकले,
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खुद गढ़कर निज आराध्य देव,
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कर प्राण प्रतिष्ठा शम्भू की,
विधिवत फिर नमन किया उसने !
***
कुछ पल पहले जो पथिक वहां,
रुकते थे सौरभ लेने को !
अब वाही वहां पर आते आते हैं,
पत्थर का पद-राज लेने को !
***
फिर एक भक्त आया पथ से,
मन में श्रधा विश्वाश लिए !
हाथों में जल का पात्र लिए,
होठों पर नमः शिवाय लिए !
***
शिव को अर्पित कर तंदुल-तिल,
जल से पूरित इक पात्र पुनः !
कुछ पुष्प समर्पित कर उसने,
लौटा पथ से श्रद्धालु पुनः !
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«Reply #9 on: December 27, 2012, 11:46:38 AM »
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«Reply #10 on: December 27, 2012, 11:48:22 AM »
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«Reply #11 on: January 02, 2013, 01:06:48 PM »
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«Reply #12 on: January 12, 2013, 02:05:35 PM »
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«Reply #13 on: April 15, 2013, 10:53:58 AM »
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«Reply #14 on: April 15, 2013, 09:06:27 PM »
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