जाती है दृषà¥à¤Ÿà¤¿ जहाठतक बादल धà¥à¤à¤ के देखता हूà¤
अरà¥à¤šà¤¨à¤¾ के दीप से ही मनà¥à¤¦à¤¿à¤° जलते देखता हूठ।
देखता हूठरातà¥à¤°à¤¿ से à¤à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ काली à¤à¥‹à¤° को
आदमी की मूकता को गोलियों के शोर को
देखता हूठनमà¥à¤°à¤¤à¤¾ जकडे हिंसा की जंजीर है
आख़िर यकीं कैसे करूठयह हिंद की तसà¥à¤µà¥€à¤° है ।
कितने बचपन दोष अपना बेबस नज़र से पूछते है
बेघर अनाथ होने का कारन खंडर से घर पूछते हैं
टूटे कà¥à¤‚वारे कंगन अपना पूछते कसूर कà¥à¤¯à¤¾ है
सूनी कलाई पूछती है आख़िर हमने कà¥à¤¯à¤¾ किया है
सपà¥à¤¤à¤µà¤°à¥à¤£à¥€ चà¥à¤¨à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के तार रोकर बोलते है
सà¥à¤µà¤ªà¥à¤¨ हर अनछà¥à¤† मन की बन गया पीर है ॥
नोंक पर तूफ़ान की शमा को लà¥à¤Ÿà¤¤à¥‡ देखता हूà¤
रोज़ कितनी रोशनी को खà¥à¤¦à¤•à¥à¤¶à¥€ करते देखता हूà¤
देखता हूठकà¥à¤› सà¥à¤®à¤¨ की ही बगावत चमन से
शà¥à¤µà¤¾à¤¸ का ही विदà¥à¤°à¥‹à¤¹ लहू , हृदय और तन से ।
लगता है सरिताà¤à¤‚ à¤à¥€ हीनता से सूख रहीं
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि हर हृदय समंदर आà¤à¤– बनी कà¥à¤·à¥€à¤° है ॥
हर हृदय की आस होती लौटकर न अतीत लाये
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ से à¤à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ उसका à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ मà¥à¤¸à¥à¤•à¥à¤°à¤¾à¤¯à¥‡
लेकिन पà¥à¤°à¤à¥ से पà¥à¤°à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤¨à¤¾ कि à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ देश का अतीत हो
कà¥à¤› नहीं तो हर हृदय में निषà¥à¤•पट पà¥à¤°à¥€à¤¤à¤¿ हो
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि नफरत की कैंची है जिस तरह चल रही
डरता हूठकहीं थान सारा बन न जाठचीर है ॥
Kavi Deepak Sharma
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Thankyou Yoindiabahut khoob deepak ji bahut achee kavitaa aapne likhi hai aaj ke haalaat pe..
netra..