दर्दनाक चीख - Horror Story (2017)

by asif biswas on February 15, 2019, 10:53:43 AM
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asif biswas
Guest
Hello dosto swagat karta hoo aap sabka fhir ek baar apne ek naye daastan mein.....meri ye daastan bhi 2017 saal mein likhi sabse aakhri horror story rahi haalaki ye kahani maine ek forum website ke liye likhi thi jo haal hi 2018 ke aakhri mahino mein band ho gayi thi ooske baad yahi nahi aisi meri kayi oos forum ki aur baakiyo ki bhi kahaniya chori kar karke oonhein anay forums pe post kar di gayi aise mein mujhe jab ye kahani mili dusre forum mein to main naraz bhi hua aur oos chor ka shukraguzar bhi jisne meri kahani ko anay forum mein post kiya tha haalanki meri bahut si kahaniya website ke oos band hone se removed ho chuki hai to aasha karta hoo aapko ye darawni kahani pasand aaye mere saal 2017 ki mehnat se likhi...

This story is a fictional story...no relations with any real life incident...written by pure fantasy mind....no characters,places,events related to the reality if that happens that maybe co-incident...for weakened heart pls don't read as this story is pure scary horror one.....padhkar ise enjoy kijiye share kijiye naa ki copy karne jaisi koi harqat kijiye
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वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी में करीब सुबह ७ बजे से ही चीफ के केबिन में बैठा....उसका सबसे काबिल और सीनियर डिटेक्टिव अरुण बक्शी था l उसे कल रात को ही चीफ का कॉल आया था जिस बिनाह पे उसे अगले दिन ही हाज़िरी देनी थी l अरुण बक्शी वक़्त का पाबंद था और साथ ही साथ पुलिस के कई पेचीदा केसेस को भी उसने अबतक सॉल्व कर दिखाया था जिस वजह से वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी में उसका रुतबा चीफ के बाद सेकंड हेड के तौर पे था....उम्र लगभग ३० साल थी और चेहरे पे एक अलग ही रौब उभरा हुआ हमेशा रहता था....कॉफ़ी का कप जैसे ही खाली हुआ था I उसी पल चीफ ने अपने कदम केबिन द्वार से अंदर रखे....अरुण ने उठते ही उन्हें गुडमॉर्निंग कहा तो चीफ ने उसे हाथ दिखाके बैठ जाने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए अपने चेयर पे विराजमान होता तत्काल सिगरेट सुलगाया उसने एक बार पलटकर अरुण की ओर देखा और सिगरेट उसे ऑफर करने के लहज़े से सवालात किया...जिसके जवाब में अरुण ने शुक्रिया जताते हुए ना में हाथ हिलाया।

"कहिये सर ऐसी क्या वजह आयी की आज आपको मेरी याद आयी इस फर्म में तो मेरी जगह लेने वाले और भी कई काबिल डिटेक्टिव्स हो चुके"........मुस्कुराते हुए अरुण ने चीफ से कहा।

"हाहाहा देखो अरुण मैं जनता हूँ तुम्हारे काम करने का तरीका अलग है जो मुझे हमेशा से इम्प्रेस करते आया है...और अभी तुम्हारे आगे फर्म के बाकी डिटेक्टिव्स इतने एडवांस नहीं हुए उन्हें भी बहुत केसेस को सॉल्व करना है तब जाके उनमें से कोई तुम्हारी जगह ले पायेगा".....चीफ ने भी मुस्कुराते हुए कहा जिसे सुन अपनी तारीफ में अरुण फूलो न समाया उसे फक्र था अपने पेशे और अपने तजुर्बे पर और उससे भी ज़्यादा वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी का हिस्सा होने पर।

"कल आप मुझे कोई केस के बाबत कुछ बता रहे थे आखिर ऐसी क्या वजह है? जो मेरा इस केस को हैंडल करना इतना जरुरी हो गया।"

"देखो अरुण क्या तुम मेरे इस सवाल का जवाब देना बेहतर समझोगे की क्या तुम्हें भूत प्रेत पिसाच शैतान चुड़ैल इनसब पे यकीन है तुम्हें लगेगा तुम्हारा ये चीफ तुमसे क्या अजीब सा सवालात कर रहा है पर मैं ये जवाब तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूँ।"

"सर,पहली बात पुलिस और डिटेक्टिव की इन्वेस्टीगेशन में कानून,इन्साफ और इंसानी साजिश को छोड़कर किसी भी चीज़ो पे विश्वास नहीं किया जाता भूत प्रेत हाहाहा मैं इनपे कत्तई यकीन नहीं करता और न ही मानता हूँ ये होती है तो क्या मेरे नए केस में कुछ ऐसा ही मसला है".........अरुण ने दिलचस्पी से चीफ की तरफ देखते हुए कहा

"नहीं अरुण ये मैं नहीं कहता ये केस कहता है....दरअसल ये केस काफी कॉम्प्लिकेटेड है और अभी हाल ही में हुए मर्डर ने इसका अट्रैक्शन हमारे नज़रो में किया है...अगर ये केस सॉल्व हो गया तोह मान जाना की वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी की लोकप्रियता और भी बढ़ जायेगी और ये एजेंसी ओवर टॉप पर होगी"

"मैं तो हमेशा से इस एजेंसी के लिए यही उम्मीद करता रहता हूँ सर"

"उम्मीद नहीं अरुण आई वांट रिजल्ट्स खैर केस की तरफ ध्यान देते हुए मैं तुम्हें इस केस के बारें में कुछ चंद बातें बताना चाहता हूँ....डेड लेक का नाम तो सुना ही होगा तुमने".........अरुण ने गौर करते हुए जैसे अध्यन किया

"जो हमारे शहर से १२० किलोमीटर दूर सुनसान जंगल और हाईवे के बीच पड़ता है....उस जगह का नाम डेड लेक आज से नहीं तबसे है जबसे अंग्रेज़ो का मुकम्मल इस शहर में राज था....डेड लेक में एक पुराना झील पड़ता है और ठीक उसके सामने एक पुराना सा वीरान कॉटेज जो कभी उस घर के मालिक और मालकिन का रेजिडेंस होया करता था शहर से दूर उस वीराने में उस कपल ने क्यों घर बनाया ये आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है आज से करीब ३० साल पहले दोनों की एक रहस्मयी तौर से मृत्यु हो गयी थी घर में सिवाए खून के उनकी लाश तक न पायी गयी। लेकिन ये इस केस से जुड़ा दूसरा वाक़्या है उसके बाद वहा इन तीस सालो में कोई नहीं गया लेकिन हाल ही में हुए एक मर्डर ने इस केस को दोबारा रीओपन कर दिया है एक ५० वर्षीय आदमी जिसकी गाड़ी बीच हाईवे पे ख़राब हुयी पनाह के तौर पे उसने उस वीरान कॉटेज में हिम्मत से दस्तक दिया और अगली सुबह किसी हाईवे से गुज़रते मुसाफिर को उसकी गाडी वीरानो में खरी दिखाई दी जब उसने मुयाना किया तो पाया की उस कॉटेज के ठीक सामने बहुत ही बुरी हालत में एक लाश पड़ी हुयी थी उसके ऑर्गन्स बाहर थे जैसे जिस्म को खूब बेदर्दी से किसी धारधार हथ्यारो से फाड़ा हो कॉटेज जिसे मोहरबंद पुलिस ने आज से करीब ३० साल पहले लगाया हुआ था वह दरवाजा खुला था और अंदर जाने की हिम्मत उस मुसाफिर को नहीं हुयी क्यूंकि वो वैसे ही लाश को देखके डर गया था और उसी पल उलटे पाव गाडी में लौटते हुए पुलिस को तुरंत फ़ोन पे सूचित किया ।

"जब आपने कहा दूसरा वाक़्या तो पहले वाक़्या से आपका क्या मतलब?"..........अरुण ने तत्काल सवाल किया
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asif biswas
Guest
«Reply #1 on: February 15, 2019, 10:57:09 AM »
"वही तो रहस्य बना हुआ है उस कॉटेज को जिन मज़दूरों ने बनवाया था उनमें से एक ने पुलिस को ब्यान दिया जब उसने अखबार में उस लाश की तस्वीर कॉटेज के सामने देखी उसने बताया की उसे और बाकियो मज़दूरों को पैसे दिए गए थे क्यूंकि कॉटेज बनने से पहले खुदवाई के वक़्त वहा कई कई ताज़ी और पुराणी लाशें दफ़न थी। और मजे की बात ये है की उसका कहना है की रात होने से पहले ही वो लोग वहा से रुक्सत हो जाया करते थे जिस आदमी ने वहा कॉटेज बनवाया था वो जैसे सब राज़ो से वाक़िफ़ था लेकिन उसकी बदकिस्मती की वो भी वहाँ का एक राज़ बन गया न उसकी लाश मिली और ना ही उसकी पत्नी की....कॉटेज बनने से पहले करीब कई साल पहले की बात की जाए तो वो जगह वैसे ही सुनसान व्यवाण जंगल ही थी और पीछे तालाब और लाशो का जमीन खोद के मिलना साफ़ ज़ाहिर करता है की शहर में हुयी वारदातों का शिकार ूँ खून किये लाशो का वो जगह ठिकाना बन गयी....पहला वाक़्या से जुड़ा एक और वाक़्या मैं बताता जाऊ तुम्हे अरुण....वहाँ अंग्रेज़ो की बनायीं एक पुराणी सी ब्रिज थी जो किसी दुर्घटना में गिर गयी और आज भी उसके कुछ जर्जर अंश वहाँ मौजूद है सुना गया था की ६० लोगो से ज़्यादा अँगरेज़ मुसाफिरों की उस वक़्त मौत हुयी और वो सब के सब उस दलदल में गिरते चले गए....सुना है की वो दलदल अब वहाँ मौजूद नहीं लेकिन एक भी विक्टिम का पता न चला था सब के सब मारे गए थे"

अरुण ने चीफ के खामोश होते ही बड़ी गौर से सोचते हुए कुछ पल बिताये उसके बाद चीफ के ही कुछ कहने का इंतज़ार किया चीफ ने अरुण की तरफ देखा

"देखो अरुण वैसे तो ये जान जोखिम जैसा केस है मर्डर्स होना किसी साज़िश का अबतक का दावा है जिसपे हम विश्वास करते है लेकिन मुझे क्यों नहीं लगता की ये साज़िश नहीं किसी और वजह से हो रहा कोई ऐसा रहस्य है जिससे हम नावाक़िफ़ है इसलिए मैं चाहता हूँ तुम अपनी पूरी मर्ज़ी से इस केस पे ध्यान दो और पता लगाने की कोशिश करो की आखिर वो क्या रहस्य है पता लगाओ"..........चीफ को इतना किसी केस में दिलचस्पी लेता देख पहली बार अरुण ने देखा था।

चीफ उर्फ़ प्रकाश वर्मा अपने वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी के हेड थे हर कोई उन्हें सर से ज़्यादा चीफ कहता था...यही नहीं वह कई केसेस में जूनियर्स की हेल्प तक करते आये थे जिन वजह से उन्हें मास्टर चीफ भी कहा जाता था। अरुण बक्शी को दिए उस केस से कई उम्मीदेँ चीफ को अरुण बक्शी से थी। कारण उसके एजेंसी उसके फर्म की नीव इज़्ज़त और कामयाबी का जरिया दूसरी ही ओर अरुण बक्शी जैसे होनहार के आगे एक चैलेंज न कहना जैसे उसके कायदे में नहीं था।

__________________________

पुलिस डिपार्टमेंट को वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी का जब रिक्वेस्ट आया की वो उस डेड लेक केस को हैंडल करना चाहते है तो उन्होने काफी सोच विचार के बाद थक हारके ये केस चीफ के फर्म को सौंप दिया...इस केस को हैंडल करने का एकमात्र भार अरुण बक्शी के कंधो पर दे दिया गया...उस दिन से ही अरुण बक्शी ने डेड लेक जाने का दौरा किया...लेकिन वहाँ सिर्फ मुआना नहीं वहाँ रूककर उस रहस्य को जानने का निश्चय भी कर लिया था। यही उसकी ज़िन्दगी की आखरी भूल थी यूँ तो उसने कई जोखिम कई केसेस में उठाये थे पर उस केस में उठाके उसे जैसे ज़िन्दगी की एक सबसे बरी भूल कर देनी पड़ी थी जब उसे इस बात का अहसास हुआ तबतक देर हो चुकी थी बहुत देर...
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asif biswas
Guest
«Reply #2 on: February 15, 2019, 10:58:05 AM »
एक महीने पहले

रात के उस वक़्त वो गाडी तेज़ी से अपनी गति में चलते हुए हाईवे रास्ते से गुज़र रही थी....गाड़ी में वो अकेला मुसाफिर था खुद अपनी गाड़ी ड्राइव कर रहा था...गाडी शहर से कोसो दूर आ चुकी थी आगे आगे दूर दूर तक उसे नीम अँधेरे और कभी न खत्म होने वाली सड़क ही दिख रही थी....जिसपे हेडलाइट की रौशनी फैकते हुए उसकी कार आगे बढ़ रही थी....इतने में उसे अहसास हुआ की करीब ७ घंटो से वो महज़ गाड़ी ही ड्राइव कर रहा है....उसके हाथ अब स्टीयरिंग व्हील को पकडे दुखने लगे थे...उसने एक बार चारो तरफ देखा और फिर गाडी बीच सड़क पे ही रोक दी...न उस तरफ से कोई वहां उसे आता दिखा और न अपने बैक साइड से....उसने गाडी थामी.....फिर हेडलाइट्स ऑफ किये....गाड़ी से बाहर निकलते ही उसे अहसास हुआ सर्द हवा का...घने जंगल में जैसे हवाएं भी तेज़ हो उठी थी....उसने अपने जैकेट को और सकती से अपने जिस्म से ढांक लिया और अपने दोनों बाज़ुओं को हाथो से सहलाते हुए पॉकेट से एक सिगरेट बाहर निकला....छक्क से लाइटर की आवाज़ हुयी और सिगरेट सुलग गयी..एक-एक कश लेता हुआ धुएं को छोड़ते अपने होंठो के बीच से....वो एक बार चारो तरफ गौर करता है.....अचानक उसे दिखता है।

कि सामने एक पुराण सा कॉटेज है और हलकी सी रौशनी ठीक दरवाजे से सटे खिड़की से बाहर कि ओर पढ़ रही है..."एक सुनसान व्यावान जंगलो के ठीक बीच बना वो कॉटेज उस शख्स को जैसे अपनी तरफ खींच रहा था...शख्स के मैं में यही बात उठी की इतनी शहर से दूर एक सुनसान जंगल और हाईवे के रास्ते कोई रहता भी है। धीरे धीरे वह घडी की तरफ निगाह दौड़ता है जो उसके कलाई पे बंधी होती है......रात बारह बजके पेंतालिस ऐसे में अब उसमें और ड्राइव करने की ताक़त तो न बची थी....सिगरेट का एक लम्बा कश लेते हुए वो आगे बढ़ता है....वो उस शहर से नहीं था अगर होता तो वाक़िफ़ होता की वो कॉटेज कई राज़ो में दफ़न था अगर वो वाक़िफ़ होता तो उस कॉटेज के करीब न बढ़ता बल्कि वहां अपनी गाड़ी तक न रोकता...उसने एक बार कॉटेज के दरवाजे के दो हाथ फासले खड़े होके एक बार उसने कॉटेज का जायज़ा लिया।

उसकी बनावट ही उसकी पुराने होने की गवाही दे रहा था...लकड़ियों से बना वो कॉटेज करीब काफी लम्बाई और चौड़ाई में था....उसका पिछला हिस्सा जंगल की ओर था जिस ओर तालाब था और वही से जंगल शुरू हो रहा था.....रात के उस घने....सिगरेट को उंगलियों में फसाये कई पलो तक अपलक खड़ा वो आदमी धीरे से दरवाजे पे दस्तक देता है....उसके दरवाजे पे दस्तक देने से पहले ही दरवाजा अपने आप चर्चारती आवाज़ के साथ खुलने लगता है....वो आदमी ठिठकते हुए दरवाजे के पुरे खुल जाने तक वैसे ही मूर्ति के भाति खड़ा रहता है....

अगले ही शरण उसे सामने एक लम्बे डेस्क के पीछे एक कुर्सी पे बैठा आदमी दीखता है जिसने काले रंग की फ्रेम का चश्मा पहना हुआ था....जैसे जैसे वो आदमी अंदर दाखिल होता है....उसे अपने कदमो की आवाज़ खुद उस खामोशी में सुनाई देने लगती है.....एका एक वो बैठा शख्स अपने सर को ऊपर उठाये सामने खड़े आदमी को देख मुस्कुराता है।

"बोलिये सर"...........हैरत से देखता वो आदमी उस शख्स को घुररता है उसके मुस्कुराते चेहरे से वो न जाने क्यों एक पल को अजीब सा महसूस करता है

"जी दरअसल वो क्या ये कोई होटल है? मुझे आज की रात यहाँ रुकना है"........
"जी सर बस आप जैसे ही कुछ मुसाफिर यूँ भटकते हुए या राह गुज़रते हुए बस यहाँ आ जाते है कभी कभार"
"जी चार्जेज?".......आदमी अपने जेब से निकालते नोट देने के लहज़े से कहता है
"जरुरत नहीं पड़ेगी"
"मेरा मतलब है जब आपको यहाँ से जाना होगा तब अदाई कर दीजियेगा यहाँ का यही उसूल है"
"जी बस मुझे एक रात के लिए रुकना है"............जैसे सुन वो बैठा शख्स मुस्कुराता है

"चलिए मैं आपको आपका कमरा दिखा देता हूँ".........बिना कुछ कहे रिसेप्शन से उठते हुए वो शख्स आदमी के साथ साथ चलने लगता है

इस बीच उस आदमी को अजीब लगता है...न कोई कर्मचारी न ही किसी के होने का अहसास ऐसा लगता है जैसे उस गुमनाम कॉटेज में उस घडी सिर्फ वो अकेला ही है....न उसने सवालात किया न कुछ पहचान के तौर पे कोई छानबीन की उससे...उसे ये बर्ताव देख अजीब लगा....लेकिन वह खुद उस घडी काफी थका और बध्यान था। वो शख्स दरवाजा खोलता हुआ मुस्कुराये उसे देख वापिस उलटे पाव जाने लगता है लेकिन दो कदम आगे बढ़ते ही वो रूककर पीछे घूमते हुए फिर उसी मुस्कुराये चेहरे से उस आदमी की ओर देख पूछता है कि "रात का खाना?"........"जी नहीं शुक्रिया वैसे एक बात पूछनी थी आप यहाँ अकेले रहते है? या इस कॉटेज का कोई और भी मालिक है?".........."हाहाहा जी नहीं यहाँ का मैं ही मालिक हूँ मेरा नाम जोसफ मैं अपनी बीवी मैरी के साथ यहाँ रहता हूँ। चलिए आप आराम कीजियेगा और हाँ अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो आप बस मुझे याद कीजियेगा गुड नाईट "..........इतना कहते हुए वो एक शरण में तेज़ कदमो में जैसे चलते हुए उस गुप् अँधेरे सीढ़ियों में उतारते हुए जैसे गायब हो गया....

सबकुछ जैसे वाक़ई बेहद अजीब था....ज़्यादा दिमाग पे जोर न देते हुए उस आदमी ने दरवाजे को खोला और कमरे के भीतर कदम रखा.....उसने एक बार कमरे का जायज़ा लिया। ऐसा लगता नहीं था की कोई भी चीज़ नयी हो सब बेहद पुराणी थी....बस एक छोटी सी खिड़की थी जो अध्खुली थी...उसे खोलते ही तेज़ सर्द हवा जैसे उसके चेहरे से होके गुज़री...उसका जिस्म काँप उठा और उसने तुरंत खिड़किया और परदे लगाए...बिस्तर पे ढेर होते हुए उसे अहसास हुआ की जैसे नींद उसे अपनी आगोश में खींचना चाह रही थी। उसने उठके अपने कपड़े उतारे वापिस अपने बिस्तर पे आके लेट गया कुछ ही पल हुए थे उसे लेटे हुए की अचानक उसे एक बेहद अजीब सी चीख सुनाई दी...वो इतनी करीब से सुनाई दे रही थी कि एक पल को वो आदमी फ़ौरन बिस्तर पे जैसे एक झटके में उठ बैठा....ख़ामोशी छायी हुयी थी उसे लगा की शायद ये उसका वेहम था लेकिन अभी तो उसने एक दिल को दहला देने वाली चीख सुनी थी.....उसने जैसे ही अभी लेटने का निश्चय किया ही था की एकदम से वो चीख दोबारा गूंज उठी...."आह्ह्ह्हह्ह्हह्हह्ह्ह्ह".....वो आवाज़ किसी औरत की थी किसी के दर्दनाक चीख थी वो आवाज़...."कौंन है?"......जोर से कह उठा और पलंग से उतर खड़ा हुआ वो आदमी।
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asif biswas
Guest
«Reply #3 on: February 15, 2019, 10:59:56 AM »
इतने देर में उसे अहसास हुआ की वो आवाज़ करीब क्यों सुनाई दे रही थी? न वो चीख बाहर से आ रही थी और न ही उसके अपने कमरे से बल्कि वो चीख ठीक उसके बाए ओर से आ रही थी...धीरे धीरे लकड़ी के उस दिवार पे हाथ फेरते हुए आदमी ने अपने कानो को जैसे खरा किये उस दिवार से चिपका लिए......आने के वक़्त उसने पाया था की सब दरवाजे बंद थे और उनपे ताले झूल रहे थे....यानी उसी के आने से ये कमरा सिर्फ खुला छोड़ गया था जोसफ.....अभी कुछ शरण उसने सोचा ही था की इतने में फिर एक खौफनाक दर्द से भरी वो दहाड़ वो चीख उसके कानो में जैसे सुनाई दी...."कौंन है?".......उस आदमी ने जोर से हड़बड़ाते बड़ी बड़ी सांस लेते हुए दिवार पे एक लात मारें कहा

उसकी आँखे जैसे बाहर निकलने को आ रही थी......उसका कलेजा काँप उठ रहा था...क्यूंकि सामने की वो लकड़ी की दिवार का एक एक पल्ला अपने आप उसे गिरता दिखाई दे रहा था.......वो अब उसकी कल्पना से कई भयंकर मंज़र में तब्दील होने को थी...और ठीक उसी पल!

"आह्ह्ह्ह ससस उफ्फ्फ क्या भयंकर सपना था?"........उस आदमी ने अपने चेहरे पे आते पसीने को पोंछते हुए पाया की वह एक बुरा ख्वाब दे रहा था...उसके जान में जैसे जान आयी...और जैसे ही उसे अहसास हुआ की वो महज़ सपना नहीं था....वो जिस बिस्तर पे लेटा हुआ था। उसपे धुल जमी हुयी थी सिर्फ वही नहीं उस पुरे कमरे की ऐसी हालत हो राखी थी जैसे कई सालो से वो जगह बंद पड़ी हुयी हो....कमरे के चारो तरफ मकड़ियों के जाली और पुराने उन मूर्तियों पे धुल और मकड़ियों की जाली लगी हुयी थी....कमरे के सब चीज़ो का वही हाल था...स्विच बोर्ड काम नहीं कर रहा था.....एक पल को उस आदमी को अहसास हुआ की जब वो यहाँ आया था तब कॉटेज ऐसा नहीं था सबकुछ सलिहत से था। जबकि जोसफ ने खुद उसके सामने बत्ती जलाई थी जो अब काम नहीं कर रही थी उसने जब सर उठाया तोह पाया की वो लैंप जो न जाने कितने दिनों से दिवार पे लगी हुयी थी आधी टूटी हुयी झूल रही थी।

एक पल को ऐसा लगा जैसे वो कही और पहुंच गया हो वो भागता हुआ दरवाजे खोलके बाहर की ओर निकला उसे अँधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था...एक पल को जब वो सीढ़ियों के करीब पंहुचा तो उसे किसी के वहाँ होने की आहट सी हुयी उसने अपना लाइटर जेब से निकला और कांपते हाथो से जैसे जलाया तो उस हाथ ने आगे बड़के उस जलती आग पे अपना हाथ रखते हुए सकती से लाइटर पकड़े उस आदमी के हाथ को जैसे थाम लिया

"नं..नही छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे बचाओ somebuddy हेल्प"......वो उलटे पाओ भागना चाह रहा था लेकिन तभी उसे सकती से उस हाथ ने जैसे अपनी तरफ खींचा हो और ठीक उसी पल वो आदमी अपना संतुलन खोते हुए सीढ़ियों पे ही लुड़कते हुए नीचे जा गिरा

जब उसे होश आया तो सामने जोसफ खड़ा मजूद था और वो वैसे ही मुस्कुरा रहा था। हड़बड़ाते हुए वो आदमी उठ खरा हुआ "ओह माय गॉड उफ़ ये सब क्या हो रहा है? ये सब ये कॉटेज को क्या हुआ ऐसा लग रहा है जैसे बरसो से यहाँ कोई नहीं आया सबकुछ ऐसे क्यों? मेरी आँखे कॉटेज में घुसते वक़्त धोका नहीं खा सकती वो चीख जो मैंने सुनी वो बगल का वो कमरा"..................

"हाहाहा हाहाहा हाहाहाहा ".........जोसफ एक एक ठहाका लगाए हस्सन लगा
"हस्स क्यों रहे हो? I said why are u laughing ?".....जोर से उसे अपनी ओर खींचते ही जैसे उस आदमी के प्राण सुख गए..क्यूंकि सामने ठहाका लगाए जोसफ जैसे नहीं था उसके दोनों आँखों से खून बह रहा था और उसकी दोनों आँखे जैसे एकदम सुर्ख लाल हो रही थी

ये भयानक मंज़र देख वो कापते हुए पीछे होने लगा..."न..नहीं नहीं नही दूर रहो मुझसे"......वो दरवाजा खोलने के लिए आगे बड़ा की इतने में उसे अपने पाव सुन परे महसूस हुए वो चाहते हुए भी आगे एक कदम और न बढ़ सका

"आज से नहीं कई सालो से ये वीरनियत ये सुनसनीयत छायी हुयी है न कभी बाहर से किसी ने दरवाजे पे दस्तक दी न ही कभी किसी ने यहाँ आने की कोशिशें की कितने खुश थे हम कितने खुश? न जाने क्यों आये थे हम यहाँ? खो दिया मैंने अपना सबकुछ सबकुछ अपनी बीवी मैरी को खुद को और हमारे जिन्दगियो को".........जैसे दहाड़ उठा वो भयानक आवाज़ में तब्दील होता जोसफ

"ये ख्वाब नहीं यही हकीकत है वो आवाज़ किसी और की नहीं मौत की उस दर्दनाक चीख की आवाज़ है जो आज यहाँ फिर गुज़रेगी जो साये इतने सालो से जिस इंसान के इंतज़ार में थे वो अब फिर एक बार सुनने को चाह में है हाहाहा हाहाहाहा ".....एका एक भयंकर होती चली गयी जोसफ की वो हसी और उसी शरण किसी के तेज़ कदम ठक ठक सुनाई देने लगे उस आदमी को

जोसफ के रख्त हीन चेहरे पे जैसे मुस्कराहट छाने लगी उसकी गर्दन अपने आप पीछे की ओर सीढ़ियों से उतरती उस साये की ओर हुयी...एक एक उस आदमी की भी निगाह उस साये की ओर हुयी और जो उसने देखा उससे उसका कलेजा मुंह को आने लगा....एक मैली सी nightie उसने पहनी हुयी थी जिसपे खून के अनगिनत धब्बे लगे हुए थे वो चल ज़रूर रही थी लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुर्दा कब्र से उठके उसके सामने आ रहा हो....घसीटते अपने पाव को एक बार जब उसके चेहरे की ओर निगाह हुयी तो अहसास हुआ की उसकी आँखे उसके चेहरे पे दिख ही नहीं रही थी बस उन जगहों से खून का क़तरा बह रहा था...."मिलो इससे मेरी वाइफ माय लवली मैरी"....दोनों साये जैसे एकदूसरे को थामे उसे लगभग बेहोश कर देने वाले थे...

जैसे तैसे हड़बड़ाते खौफ्फ़ में चीखते चिल्लाते हुए उस आदमी ने कॉटेज के दरवाजे को झिंझोड़ डाला उसी शरण दरवाजा खट्ट से खुल गया। वो अंधाधुंध उस नीम अँधेरे में न जाने किस ओर भागे जा रहा था...वो इतना डर गया था की पीछे मुड़के देख भी नहीं सकता था की कब उसके सामने वो दोनों खड़े हो जाये ...और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ की वो घने जंगलो के बीचो बीच था खामोशी छायी हुयी थी अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था उसे ख्याल आया की जलने के लिए उसके पास टोर्च पीछे गाडी में छूट गयी थी उसने जैसे तैसे पेड़ की आड़ में खुद को छुपाते हुए सिगरेट अपने होंठो के बीच फसाया और कांपती हाथो से जब लाइटर तलाशने लगा तो अहसास हुआ की वो पीछे उस कॉटेज में वो छोड़ आया था...उसने घरी पे नज़र दौड़ाई अभी वक़्त कोई ३ बजे ही थे...अचानक उसे किसी की आहट सुनाई दी

और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ कुछ अजीब सा...एका एक वो आहट उसके बेहद करीब सुनाई देने लगी...उसकी अपलक दृष्टि अपने पीछे की ओर थी...और ठीक उसी पल उसने पाया की वहाँ कोई मौजूद नहीं था आहट भी सुनाई अब नहीं दे रही थी....उसने एक लम्बा सांस खींचते हुए अपने आप पर काबू किया...और ठीक उसी पल उसे उस अजीब चीज़ ने जैसे अपनी ओर आकर्षित किया "ये आवाज़ कैसी?"....एका एक उसके कदम उस ओर बढ़ चले....और जैसे ही वो पास आया ठीक उसी पल उसने खदकते उस दलदल की ओर देखा...."नं..नही नही ये नहीं हो सकता नहीं"....कधकते उस दलदल में से एक एक कर बहुत से हाथ निकलने लगे थे....एका एक उसे अहसास हुआ की वो हाथ जैसे इंसानो के नहीं किसी मुर्दा के थे उन हाथो पे ज़ख्म और खून था और तभी उसे किसी ने जोर से धक्का दिया...

वो दलदल में जा गिरा...और ठीक उसी पल उसे उन हाथो ने दबोचा "नहीं न..नहीं नहीं छोड़ दो मुझे जाने दो नही"...वो घुटती आवाज़ में तड़पते हुए चिल्लाये मदद की गुहार लगा रहा था...लेकिन कौन उस वीराने में उसकी सुनता? सामने उसने देखा की जोसफ और उसकी पत्नी मैरी खरे ठहाका लगाए जा रहे थे उनकी हसी पुरे घने वादियों में गूंज रही थी...."नही नहीं नही छोड़ दो मुझे नहीं"......दलदल उसे अपने गिरफ्त में लिए अंदर खींच रहा था उस आदमी ने पूरी कोशिशें की लेकिन उन हाथो ने उसे जैसे कसके थामे रखा था...एक ने उसकी गले को पकड़ा तो एक ने उसकी गर्दन को एक ने उसके सांस घुटते चेहरे को दबोचे रखा हुआ था....और कुछ ही शरण में एक और चीख गूंज उठी एक और दर्दनाक चीख।
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asif biswas
Guest
«Reply #4 on: February 15, 2019, 11:00:38 AM »
अपने चीफ प्रकाश वर्मा से मिलने के बाद से ही अरुण ने इस केस पे अपना पूरा ध्यान लगा दिया था......वो हाल ही में हुए उस आदमी के ब्रूटल मर्डर और उससे भी ज़्यादा उसके रहसमयी मौत की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ था......केस को हैंडल करते ही चीफ ने केस से जुडी तमाम सबूत अपने डिटेक्टिव अरुण बक्शी के लिए मुहैया करवा दिया था। अरुण ने उन तस्वीरो पे निगाह दौड़ाई तो जैसे उसका जिस्म सिहर गया। उसने आज तक कई केसेस में डेडबॉडी को काफी करीब से देखा था लेकिन कोई भी खून उसने इतनी बेदर्दी से हुयी नहीं देखी थी। तस्वीर में साफ़ लाश की बुरी हालत ब्यान हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी हिंसक जंगली जानवर की ही ये हरकत हो सकती है जिसने इतनी बेदर्दी से लाश को चिर फाड़ा था की उसके शरीर की सभी ऑर्गन्स बाहर निकले हुए थे। न जाने क्यों वो उस रात वहां गया था अपनी मौत के लिए।

सूत्रों के अनुसार वहां लाश को छोड़के किसी भी अन्य शख्स का कोई सुराग न मिला था। पुलिस ने काफी तफ्तीश और जांच पड़ताल के बाद ये शक किया था की जो ३० साल पहले कॉटेज को सील कर गयी थी वो अचानक से कैसे खुली? क्या ये हरकत उस मुसाफिर की थी जिसकी बेदर्दी से वहां मौत हुयी थी या फिर कोई और वजह.......अरुण ने काफी जांच पड़ताल किया और एक चक्कर पुलिस डिपार्टमेंट का भी काट आया जहा उसे मालूम चला की कॉटेज में सबकुछ ऐसे हालातो में था जैसे बरसो से वह कोई न आया हो सभी कमरों में ताले झूल रहे थे कॉटेज जर्जर होने के आलम में था.....कोई भी ऐसा सुराग हाथ न लगा जिससे ये महसूस हो की वहां कोई और भी मौजूद था....बस लाश के ही जूतों के निशान पीछे तालाब के नज़दीक पाए गए थे जैसे उसने भागते हुए जंगलो का ही रुख किया था फिर उसे मार्के उसकी लाश कॉटेज के सामने किसी ने फैक दी पुलिस को यही शक था की मर्डर किसी जंगली जानवर ने किया हो सकता है....

लेकिन अरुण बक्शी पेशेवर डिटेक्टिव था उसने कॉटेज से आज से करीब ३० साल पहले जो मर्डर्स हुए उस कपल के जो उस कॉटेज के मालिक और मालकिन थे उसके बाबत सवाल किया तो उसे मालूम चला की दोनों में से न ही किसी की लाश मिली और ना ही किसी का कोई सुराग ऐसा हुआ जैसे आसमान उन्हें निगल गयी या ज़मीन उन्हें खा गयी उनकी सारी चीज़े वैसे ही वह मौजूद थी जो आज भी वहाँ मौजूद है। अरुण बक्शी ने फिर अंग्रेज दौर में बने उस ब्रिज का ज़िकर किया जो उस कॉटेज से काफी नज़दीक था तो कमिश्नर ने सिर्फ इतना कहा की कोई ख़ास जानकारी तो नहीं पर आप उसे इंटरनेट पे आसानी से उसकी हिस्ट्री निकालके पढ़ सकते है। वो ब्रिज रेलवे की थी और १० साल के अंदर ही वो ठहर न पायी और उस दुर्घटना के बाद फिर किसी ने उस ब्रिज के तरफ ध्यान न दिया वो आधा टुटा ब्रिज आज भी वैसे ही वहाँ मौजूद है उसका रास्ता घने जंगलो से होके जाता है।

अरुण बक्शी को घर आते आते शाम हो गया। वो अकेला रहता था उसके परिवार उसके साथ नहीं थे। घर आकर उसने थके हारे महसूस करते ही खुद को.....पास रखी व्हिस्की की वो बोतल निकाली और उसका एक जाम बनाये उसे पीने लगा....आँखों में नींद ना थी उसके जैसे किसी गहरी सोच को बुनता जा रहा था। उसी श्रण उसने अपने लैपटॉप को खोलते हुए उसमे इंटरनेट ऑन किया उसने डैड लेक के पास वाली उस ब्रिज की हिस्ट्री काफी मशक्कत के बाद आखिर निकाल ली....अरुण की आँखे बड़ी ही गौर से उस आर्टिकल को पढ़ रही थी।

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वो रात करीब १० बजे का वक़्त था। 1933 का वो दौर जब अंग्रेजो का मुकम्मल शाशन हिंदुस्तान के सर जमीन पे था। उस रात घने जंगलो से गुज़रती हुयी ईंधन के धुएं को छोड़ती वो ट्रैन बड़ी ही तेज़ी से रेल ट्रैक पे चल रही थी। पेसेंजरो में ज़्यादातर अँगरेज़ थे जिनमें कुछ वृद्ध कुछ व्यापारी तो कुछ अफसर हर कोई अपनी कीमती सूट,कोट और लिबासो में सार्ड उस रात की हवाओ को महसूस करते हुए अपने अपनों में व्यस्त बैठे हुए थे....ट्रैन जैसे ही उस लाल ब्रिज पे चढ़ने लगी तो ट्रैन चालक को अहसास हुआ ट्रैन के ज़्यादा हिलने का उसने पहले तो गौर नहीं किया लेकिन जब ट्रैन बहुत ज़्यादा कांपने लगी तो उसे अहसास हुआ की कोई खतरा था...उसने खिड़की से झाका तो उसके प्राण काँप उठे क्यूंकि कई लम्बी ब्रिज के ऊपर चूँकि ट्रेन गुज़र रही थी और सिर्फ गुज़र नहीं रही थी वो बहुत ज़्यादा हिल रही थी....जल्द ही ट्रैन के हर पैसेंजर्स को समझ आने लगा और वो इस खतरे को भांप गए..........ट्रैन जैसे ही आधे ब्रिज पे आयी होगी की ब्रिज की ईमारत जैसे अब बुरी तरीके से टूटने के कगार पे आ गयी....एक एक इट करीब आती ट्रैन के वजहों से उसके भार को संभाल न पाते हुए टूट टुटके गिरने लगी थी...."ओह गॉड ओह जीसस सेव अस"....पैसेंजर को शान्तना देते हुए ट्रैन में सवार उन कर्मचारियों ने शान्ति बनानी चाही लेकिन जब ट्रैन एकदम बुरी तरीके से हिल उठी तो उनके वो शान्तना भी किसी काम न आ सके

और ठीक उसी पल हड़कंप मच गयी चीख चिल्लाहट और शोर मचने लगा खौफ्फ़ से हर कोई सिहर गया। और ठीक उसी पल ब्रिज एक अजीब सी भयंकर गूंज के साथ टूट गया ट्रैन सीधे उस आधे टूटे ब्रिज के साथ करीब १०० फट निचे गहरी खाई में जा गिरी उसके बाद जो बेहद भयंकर हादसा हुआ उसे ब्यान करना मुश्किल है......मलवो की ढेर आग में लापति पैसेंजर्स की बॉगी और कटी लाशें जैसे बिछी हुयी थी। "आहहह ससस कोई है कोई है आहहह"........उस भीषण एक्सीडेंट के बाद भी जैसे उस बेजान जिस्म से एक घुटती सी चीख निकल उठी....वो घायल लड़की ने अपने आस पास जब नज़र फैरा तो उसे उसी की हालत में कई लाशें और बुरी हालत में दिखी तो कही मलवो का ढेर और उससे उठता धुआँ..उसने निकलना चाहा पर उसे अहसास हुआ की वो एक दलदल में जा फसी थी और सिर्फ वही नहीं जो लाशें जो मलवो का ढेर वहाँ आस पास था हर चीज़ उस गहरे दलदल में डूबती जा रही थी।

एक बार फिर आतंकित भाव से उसने चीखते चिल्लाते हुए मदद की गुहार लगायी..."somebuddy हेल्प somebuddy plss हेल्प me "............वो डूबती चली गयी हर चीख घुटती चली गयी....और ठीक उस दलदल में छटपटाते हुए उसका जिस्म अंदर तक दुब गया सिर्फ बाहर ठहर गया तो सिर्फ उसके खून से सने वो हाथ और उसके बाद जैसे सबकुछ फिर खामोश हो गया।

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asif biswas
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«Reply #5 on: February 15, 2019, 11:04:20 AM »
"उफ़ कितना भयानक सपना था"...........पसीने से लथपथ जब अरुण को अहसास हुआ की वो एक बेहद भयंकर सपना देखकर उठा था तो जैसे उसकी जान में जान आयी

उसने वाशबेसिन के पास जाके अपने चेहरे पे पानी डाला और अपने चेहरे को पोंछते हुए मुड़कर पाया की बिस्तर पे उसका लैपटॉप खुला था और वो कब आर्टिकल वो पढ़ते हुए सो गया उसे पता न चला...उसने पास आके एक बार उस पुरानी सी तस्वीर जिसमे उस ट्रैन और ब्रिज दुर्घटना के मलवो का कुछ हिस्सा और कुछ लाशें ही दिख रही थी उसे गौर से देखा। उसके बाद काफी जांच पड़ताल के बाद पुलिस को महज़ वो एक दुर्घटना लगी और उसके बाद अंग्रेज शाशन के ख़त्म होते ही फिर दोबारा कभी उस हादसे का कुछ मालूमात न चला आर्टिकल को पड़ते हुए अरुण ने उसके राइटर का नाम जाना उसका नाम था मोह्द दीप अरुण ने पाया की वो आर्टिकल किसी परोनॉमल साइट पे लिखा हुआ था और उस साइट पे ऐसे ही कई तमाम किस्से और उनके हिस्ट्री ज़्यादातर उस मोह्द दीप ने लिखे थे। अरुण को लगा शायद इस केस की बाबत उसे और जानकारी उस मोह्द दीप से मिल सकती है लेकिन उसने जो निर्णय लिया था खुद वहाँ उस बंद कॉटेज में ठहरने का शायद उसपे शायद ही उसका बॉस चीफ प्रकाश वर्मा इजाजत देता।

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कई महीने गुज़र गए लेकिन अरुण बक्शी की इन्वेस्टीगेशन में उसे कुछ भी ख़ास कामयाबी न मिल सकी उसने फैसला किया की अब उसे अकेले ही शायद इस पुरे गुत्थी को सुलझाना होगा जो की बेहद खतरनाक फैसला था उसका। जैसे जैसे वक़्त बीतता गया पुलिस का भी ध्यान उस केस से उठ चूका था यही यकीन था की वारदात को अंजाम किसी जंगली जानवर ने दिया था यही पुलिस की अबतक की इन्वेस्टीगेशन का हिस्सा था.....जिस वजह से धीरे धीरे उस कॉटेज से फिर एक बार सबकी निगाह हट चुकी थी।

अपने ऑफिस के केबिन में बैठा वो २८ वर्षीय नौजवान लैपटॉप में उस फिल्म को देख रहा था....जिसमें एक ज़िंदा मुर्दा कबर की मिट्टियो से खुद पे खुद निकल रहा था....लड़की चीखें जा रही थी और साथ में खड़ा उसका हाथ पकडे वो युवक भी खौफ्फ़ से सहमा हुआ था....दोनों भागते हुए अपनी गाडी की ओर आये ही थे की तभी उस लड़की के दोनों गले पे उन हाथो ने अपनी पकड़ मज़बूती से बिछा ली लड़की चीख रही थी चिल्ला रही थी और ठीक उसी पल लड़का बौखलाए उलटे पाव जैसे ही पीछे की ओर पलटा उसे अपने चारो तरफ वैसे ही ज़िंदा मुर्दे अपनी तरफ आते दिखे वो चीखता रहा चिल्लाता रहा और एक एक कर सबने उसे जैसे अपने गिरफ्त में खींच लिया उसके बाद एक दर्दनाक चीख की गूंज उठी और ज़मीन पे एक सर कटी लाश गिर उठी।

"डिसगस्टिंग उफ़ is this what u called horror ?"...........उस नौजवान ने एक नज़र अपने राइटर साहिल की ओर दौडाते हुए कहा

"अब यही हमसे हो पाया आखिर फिल्म में"..........अपनी मज़बूरी को ज़ाहिर करते हुए साहिल ने कहा जो उस फिल्म का स्क्रिप्ट राइटर था

"देखो साहिल पिछले दस फिल्मो से हमारी प्रोडक्शन को काफी नुकसान हो रहा है और ये सब की वजह है लॅक ऑफ़ ऑडियंस आर यू अंडरस्टैंड व्हाट आई ऍम सेइंग टू यू"...........साहिल ने डायरेक्टर एंड प्रोडूसर राम के बातों में अपने सर को सहमति में हिलाते हुए जैसे स्वीकार किया

"तो फिर ये समझो की इस साल मुझे एक हॉट फिल्म के साथ साथ एक हॉरर बेस्ड मूवी फिरसे शूट करनी है और मुझे एक कम्पलीट फ्रेश स्क्रिप्ट की दरक़ार हैं और वो उम्मीद तुमसे है और वैसे भी प्रोडक्शन का जो हाल है अगर ये फिल्म भी फ्लॉप रही तो मुझे लगता है प्रोडक्शन हाउस मेरी क़र्ज़ में ज़रूर डुब जाएगी"...........एका एक राम ने सिगरेट जलाते हुए उसे अपने होंठो पे फसा लिया ।

"रिलैक्स सर इस बार मैंने तफ्सील से एक ऐसी स्टोरी लिखी है जिसे पढ़कर आप पक्का मेरी स्क्रिप्ट को सेलेक्ट कर लेंगे लेकिन हम्हें लोकेशन एकदम वैसी ही चाहिए"

"हॉन्टेड"......एका एक मुस्कुराते हुए राम ने कहा

साहिल ने सर सहमति में हिलाते हुए मुस्कुराया......"एक है मेरी नज़र में डैड लेक का नाम तो सुना ही होगा वहाँ एक कॉटेज है उस कॉटेज में हुए करीब २ वारदातों ने उसे हॉन्टेड हाउस घोषित कर दिया है और मजे की बात ये है की मैं वही अपने नए फिल्म को शूट करूँगा और इस बार मुझे यकीन है की हमारी फिल्म पहले से ज़्यादा बिज़नेस करेगी"

"पर सर उस जगह में तो अभी हाल ही में एक हादसा हुआ था हादसा नहीं मर्डर"

"हाहाहा हुआ होगा हम कौन सा वहाँ रहने जा रहे है २ दिन में ही अपनी शूटिंग ख़त्म करके वापिस हाहाहा"...........साहिल भी मुस्कुराते हुए जैसे राम के बातों से सहमत था।

राम पेशे से एक डायरेक्टर था जो लौ-बजट फिल्म्स का निर्माता था उसने काफी फिल्मो को न ही सिर्फ प्रोडूस किया बल्कि उसे डायरेक्ट भी किया था....उसकी फिल्में ज़्यादातर हॉरर एलिमेंट के साथ साथ अश्लीलता को दर्शाती थी यही वजह थी की कई बार तो उसकी फिल्में कॉन्ट्रोवर्सीज में घेरि जा चुकी थी लेकिन वो अपनी आदत से बाज नहीं आया था....क्यूंकि हॉट फिल्म्स के चलते ही उसकी जेब में मोटी कमाई जाती थी....लेकिन बदकिस्मती से कई पिछली १० फिल्में उसकी यूँ ही फ्लॉप होती जा रही थी जो उसकी मुस्किलो का कारण बन रही थी..

अभी अपने स्क्रिप्ट राइटर साहिल से उसने बात चीत का दौर बीच में अधूरा ही छोड़ा था की इतने में केबिन के दरवाजे से अंदर आती बला की खूबसूरत रैना को देख राम ने उसका स्वागत खड़े होते हुए किया..."वेलकम माय बेब रैना कैसी हो?"..........."मैं तो ठीक हूँ राम लेकिन मुझे बुलाने की वजह मैंने सुना तुम मुझे अपनी कोई अपकमिंग फिल्म में दोबारा सिग्न करना चाहते हो"............"हाहाहाहा एस अ लीड देखो रैना इस बार हम एक हॉन्टेड कॉटेज में इस फिल्म को शूट करेंगे और हमारे साथ वही हमारी छोटी सी क्रू चलेगी जिसमें साहिल,तुम मैं और मेरी अस्सिटेंट डायरेक्टर सौम्या और कैमरामैन जावेद साथ होगा"

"लेकिन मैंने सुना है की वहाँ मनाही है"

"ऐसे कई हादसे होते रहते है रैना और उसके बाद सबकुछ फिर ठंडा पड़ जाता है और फिर जैसा था सबकुछ वैसा चलने लगता है और मैं जहा तक बिलीव करता हूँ की वहाँ पे ऐसी कोई भी भूत पालित वाली बात नहीं सिवाय अफवाओं के"

"तो फिर वो मर्डर"

"हो सकता है कोई जंगली जानवर का काम हो वो फ़िक्र मत करो हम पुरे इन्तेज़ामात के साथ जाएंगे एंड डिस इस नॉट योर फर्स्ट टाइम विद अस हम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी सब सेट हो जायेगा बस २ डेज उसके बाद हम्हे उस जगह से कोई मतलब नहीं"

सबने सहमति में राम की बातों से हामी भरी......"फिल्म का टाइटल भी वही होगा "हॉन्टेड" हाहाहा"......ठहाका लगाए राम ने अपने बचे कूचे सिगरेट को तिलांजलि दी

Morgue रूम के ठीक सामने दरवाजे पे खड़ा अरुण बक्शी एक बार उस बड़े से हॉल रूम में झांकता है जहाँ अनगिनत स्ट्रेचर पर सफ़ेद चादरों में ढकी कई लाशें पड़ी हुयी थी| एक बार जैसे morgue रूम में घुसने से पहले वो अपने दिल को जैसे मज़बूत करता है....आगे बढ़ते हुए ठीक उसके पीछे वार्ड बॉय और साथ में फॉरेंसिक डॉक्टर डॉ अनिल भी उसके साथ आगे चलते हुए उस बंद लाकर के सामने जा खड़े होते है | हॉल में गुप् चुप्पी जैसे साधी सी हुयी थी सबने इतने देर तक.....इसी बीच डॉ अनिल ने अपनी चुप्पी को तोड़ते हुए कहा

"मिस्टर अरुण यही पे उस लाश को प्लेस किया गया है गिव मी अ मोमेंट प्लीज"......इतना कहते हुए फट से डॉ अनिल ने उस लाकर में चाबी डालते हुए घुमाया और फिर एक बड़ी ज़ोरदार आवाज़ के साथ डॉ के लाकर को बाहर करते ही उसमें रखी लाश ठीक अरुण के सामने प्रस्तुत थी...लाकर को बहार खींचने पे उस वक़्त morgue हॉल की ख़ामोशी में जैसे उस आवाज़ ने लगभग खौफ्फ़ सा दिला दिया था|
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asif biswas
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«Reply #6 on: February 15, 2019, 11:05:01 AM »
एक पल को अपनी नज़रें दूसरी ओर किये फिर धीरे धीरे अरुण ने लाश की तरफ मुड़कर देखा उसने अपने नाक पे रुमाल रख लिया...लाश की बहुत बुरी हालत थी....जैसे ही डॉ अनिल ने आदेश अनुसार उसके बदन से जैसे उस सफ़ेद कपड़े को हटाया लाश के शरीरो पे अब सिलाइया तातो से की हुयी अरुण को दिखी जो की अनगिनत उसके शरीर के छाती से लेके निचले भाग तक जा रहे थे शरीर के मॉस इस तरह से काटे गए थे जैसे किसी नरभक्षी ने उस लाश को महज़ मारा न हो बल्कि उसे खाया भी हो|

"शरीर के कई हिस्सों पे काफी गहरे ज़ख्म थे और ऑर्गन्स तक जैसे किसी ने इस क़दर बाहर निकाला हो की जैसे किसी हिंसक जानवर ने शिकार किया हो सकता है....कई जगह हम्हें दांतों के निशाँ जैसे गर्दन पीठ और आगे नब्ज़ों पे जैसे खरोचों के गहरे निशान मिले"

"आपको क्या लगता है? वो निशानात ये सब किसी इंसान का काम है?"

"हरगिज़ नहीं अगर इंसान का काम होता तो ऐसे लाश को यूँ जानवरों की तरह न शिकार के तरीके से मारा होता मुझे तो ये उस घने गहरे जंगल में किसी बहुत ही खतरनाक जानवर का ये काम लगता है"

"क्या पता? anyway वैसे अब तक इस विक्टिम की लाश कोई लेने नहीं आया जो इतने महीनो से"

"इसका नाम राजेंद्र था ये इस शहर के नहीं है| दरअसल जब पुलिस ने इनके परिवार की मालूमात करते हुए जाना तो इनकी घर में सिर्फ इनकी पत्नी ही पायी गयी.....पुलिस की इन्फॉर्म करते ही लाश की शिनकत करने से पहले ही उन्हें दिल का दौरा आया और वो"........कहते कहते डॉ अनिल रुक सा गया उसने जैसे अपने अफ़सोस को जाहिर किया

"तो फिर लाश का यहाँ रखने का क्या मतलब? अबतक तो अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए था"........
"दरअसल अब इनके परिवार वालो में कोई रहा नहीं तो इसलिए पुलिस ने केस की काफी छानबीन के बाद अब इस लाश को लावारिस अनुसार अंतिम संस्कार करा देने का ही निश्चय किया है बस १-२ दिन के अंदर ही इस लाश को पुलिस लेने आ जाएगी"
"ये तो अच्छा हुआ की मैं पहले पहुंच गया"
"हाँ कमिश्नर साहेब के परमिशन पे ही मैंने आपके लिए ये लाश को दिखाने की परमिशन हमारे हेड से ली एनीवे आपको और कुछ देखना है या कुछ मॉयना करना है"
"नो"
"ऑलराइट"..........कहते हुए जैसे लाकर डॉ अनिल ने खोला था उसे वैसे ही वार्ड बॉय को कहा की बंद करे

"वैसे डेड लेक कॉटेज पे हुए इस मर्डर को पुलिस हादसा ही मानती है"
"लेकिन मुझे इस केस को बारीकी से जांचने की लिए ही ज़िम्मेदारी दी गयी है और जब तक मैं निश्चिंत न हो जाऊ तब तलक मैं इसे हादसा नहीं मान सकता"
"इट्स योर ओन थिंकिंग मिस्टर अरुण बक्शी वैसे जो पोस्टमर्टम और कार्यवाही हमने की उससे तो बस यही बात सामने आती है"

अरुण ने उनका शुक्रियादा किया डॉ अनिल ने इसे अपना फ़र्ज़ समझते हुए शुक्रिये को क़बूल किया फिर डॉक्टर इज़ाज़त लेते हुए दूसरी ओर चले गए.....अपनी सोच में अकेला खड़ा अरुण कश्मकश में जैसे घिरा हुआ था अभीतक कोई भी प्रोग्रेस उसे हासिल न हुयी थी जो की उसकी मुस्किलो का कारण बन रहा था...अभी अरुण हॉस्पिटल से बाहर जा ही रहा था की इतने में उसे खुद को घूरते एक अनजान शख्स को देख हैरानी सी हुयी उसने माथे पे शिखर लाते हुए पाया की सामने सीढ़ियों पे वो लगातार उसे ही घुर्र रहा था लेकिन जैसे ही अरुण की निगाह उसपे हुयी वो वहा से जैसे भागने को हुआ तेज़ कदमो से सीढ़ियों से उतारते हुए वो जाने लगा था|

"एक्सक्यूज़ मी वेट".........अरुण शक भरी नज़रो से उसका पीछा करते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा

उस शख्स ने अपनी लॉन्ग कोट को ठीक करते हुए अपनी हैट को गिरते से जैसे बचाया और तेजी से हॉस्पिटल से निकलते हुए अपनी गाडी में सवार हुआ इतने में रियर व्यू मिरर में उसे अरुण अपने पीछे दौड़ते हुए करीब आते दिखा....इग्निशन में पहले से ही चाबी डाले हुए उस शख्स ने कार स्टार्ट कर ली थी...अरुण को मौका भी न मिला उसकी कार तक को चुने का की वो इतनी स्पीड में वहाँ से निकल गयी...

पीछे अरुण हपसते अपनी साँसों पे काबू पाते हुए खड़े उस गाडी को अपने से दूर जाते देख रहा था लेकिन उसने उस गाडी का नंबर अपने ज़ेहन में नोट ज़रूर कर लिया था|

घर का दरवाजा खोलते हुए तेजी से उस शख्स ने अपने कमरे में दाखिल होते ही एक बार बाहर झांकते हुए देखा और कस्के दरवाजा लगा दिया....उसने एक लम्बी सांस खींची और फिर पास की खिड़किया लगाते हुए पर्दो को बराबर करते हुए.....पास पड़ी कुर्सी पर विराजमान हुआ |

उसने एक बार अपने कमरे को चारो तरफ से घूरते हुए नज़र फेरा कमरे के हर दिवार पर कई रहस्मयी पेंटिंग्स बानी हुयी थी जिसमें कुछ डरावनी किसी तस्वीर में लिलिथ पिशाचनी की नंगी पेंटिंग बानी हुयी थी तो किसी पेंटिंग में इंसान से जानवर बनता कोई शख्स किसी तस्वीर दिखती कोई आत्मा तो कही दीवारों पे तरह तरह के डरावने मास्क्स लटके हुए बिस्तर के ठीक पास एक स्टडी टेबल था जिसपे अनगिनत बुक्स थी जो ज़्यादातर कई लैंग्वेजेज में थे किसी में लिखा था "ड्रैकुला कैसल" "डी हॉन्टेड रोड" "आफ्टर लाइफ" यकीनन वो शख्स का पेशा कुछ ऐसा था जो हॉरर मैटर से रिलेटेड था उसने आँखें मुंदी और फिर सर कुर्सी के ऊपरी सिरहे पर रखकर सुस्ताने लगा....करीब कई दिनों से वो उस मुसाफिर की लाश का मुआना करने के लिए अस्पताल के चक्कर काट रहा था...लेकिन कई पर्यतन के बाद भी उसे morgue रूम में रखी उस डेड लेक में हुए मर्डर विक्टिम की लाश को देखने तक न दिया...आख़िरकार इतने जद्दो जेहेद के बाद उसे कामयाबी मिली और घुस देते हुए वहाँ के एक कर्मचारी को उसने लाश देखने का एक अवसर पा लिया था| वो सुबह सुबह ही उस कर्मचारी के साथ उस रूम में दाखिल हुआ और उसने उस मुसाफिर राजेंद्र की लाश का मुआना किया....उसकी हालत देखते ही जैसे उसके शक में यकीन का पुट आया इससे पहले की वो कुछ और देर वहाँ ठहर पाता इतने में कर्मचारी ने उसे इख़्तिला दी की बाहर डॉक्टर अनिल किसी एजेंसी के जासूस के साथ लाश को एक बार फिर देखने के लिए आ रहे है| उसी पल कर्मचारी ने उसके सामने ही राजेंद्र की लाश को डुप्लीकेट चाबी से लॉकर में दोबारा बंद किया और दोनों किसी की नज़रो में आने से पहले ही वहाँ से निकल भागे|

लेकिन सीढ़ियों से उतरते पाँव वही ठहर गए क्यूँकि जिस डेड लेक पे वो कई सालो से सर्चिंग में था उस बाबत उस केस की बाबत किसी जासूस के hire होने की खबर ने उसकी दिलचस्पी को और बढ़ा दी थी| उसी पल उसने ठहरके वही दोनों का इंतज़ार किया और फिर डॉ अनिल और अरुण बक्शी को morgue रूम में घुसते पाया फिर चोरी छुपे उनकी सारी वार्तालाप सुनी जिससे उसे यकीन हो गया की वो अकेला डेड लेक उस हॉन्टेड कॉटेज केस पे अकेला ध्यान नहीं दे रहा था| उसे लगा पुलिस ने तो हाथ खड़े कर लिए थे तो फिर जासूस के इस केस से जुड़ने का क्या सम्बन्ध?

अँधेरा छाने लगा था.....अचानक उस शख्स की नींद टूटी तो हड़बड़ाहट में उसने पाया की पुरे कमरे में गुप्प अँधेरा हुआ सा था...उफ़ न जाने कितने देर से वो कुर्सी पे यूँ सोया पड़ा हुआ था....उसने उठके पाया की बाहर कुत्ते कई देर से भौंक रहे थे| उसने परदे को सरकाये बाहर गलियारे में झाका वहाँ खामोशी और सन्नाटा छाया हुआ था|

उसने अंगराई लेते हुए पास पड़ी शराब का एक जाम तैयार किया और जैसे ही उसे लबो से लगाने को हुआ तो अचनाक किसी ने बड़ी जोर से दरवाजे पे दस्तक दी...ठक ठक उसने पलटकर सामने बंद दरवाजे की और देखा...रात ९ बज चूका था कौन हो सकता है? आजतक तो वो अकेले ही जिंदगी जीता आया कोई उसे कई सालो से मिलने भी न आया था| परिवार वालो को खोये तो अरसा हो गया था उसके बाद तो वो अपनी जीवन में अकेला ही था| ठक ठक दरवाजे पे फिर दस्तक हुयी इस बार उसने शराब की एक चुस्की ली और फिर तेज कदमो से चलता हुआ दरवाजे के पास पहुँचा | उसने दरवाजा खोला तो पाया की सामने कोई मौजूद नहीं था|

एक बार उसने बाहर अँधेरे रोड पे झाँका न कोई नहीं तो फिर कौन था? उसका दिल धड़क उठा उसने वापिस अंदर होने का निर्णय लिया घर में प्रवेश करते और जैसे ही पलटते हुए दरवाजा वो लगा ही रहा था की इतने में
उस हाथ ने उसके कंधे पे रखते ही उसे चौका दिया.....वो एक पल को सहम उठा और फिर उसने अपनी सांसें धीमी लेते हुए सामने पाया की ये वही उसका पीछा करता सुबह वाला शख्स था अरुण बक्शी.......अरुण उसे मुस्कुराते हुए देख रहा था

"आप डर गए?".
"आपने डराया तो डर गया"........उस शख्स ने नार्मल होते हुए मुस्कुराये जवाब दिया
"हाहाहा दरअसल मुझे लगा की शायद मुझे देखके आप दरवाजा ही न खोले क्यूँकि आज हमारी मुलाक़ात अधूरी जो रह गयी थी"
"क..क्या मतलब?"
"अरे जिस अस्पताल का आप चक्कर कुछ दिनों से लगा रहे है उसकी बाबत मुझे सारी जानकारी उस घुस लिए कर्मचारी ने बता दी जिसने मुझे आपका पीछा करते हुए देखा हाँ लेकिन वो मुंह खोल नहीं रहा था धमकी देनी पड़ी पुलिस की तो सब कुछ सच्चाई से उसने बता दिया"

"क्या कहने का मतलब है आपका? ये कैसा इलज़ाम है?"............झूठा ग़ुस्सा दिखाते हुए अपने चोरी को छुपाने के लहज़े में वो शख्स गरजा
"देखिये ये आप deny नहीं कर सकते की मैंने आपको कई आवाज़ें दी पर आप रुके नहीं और मुझे अपना परिचय देने की ज़रूरत नहीं क्यूँकि आप मुझे जानते है तभी तो मुझे घूर रहे थे पहले मेरे इस सवाल का जवाब दीजिये की आप हस्पताल में उस वक़्त क्या कर रहे थे वो भी morgue रूम के पास अगर ना भी कहे तो कोई बात नहीं शायद पुलिस के दबाव में"
"आप यहाँ से जा सकते है मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता"
"घर आये मेहमान को ऐसे आप ट्रीट करते है मिस्टर मोह्द दीप उर्फ़ परनोमालिस्ट"......इतना कहते ही अरुण ने दीप के चेहरे पे उलझन भरे भाव देखे

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asif biswas
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«Reply #7 on: February 15, 2019, 11:05:39 AM »
उसके बाद कुछ भी छुपाना दीप के बस में नहीं था...क्यूँकि वो डिटेक्टिव अरुण बक्शी के आगे कोई झूठ भी नहीं रख सकता था.....बातों के दौरान अरुण ने बताया की वो उसके कार के नंबर प्लेट को नोट करने के बाद ही उसके घर तक पहुँचा था....बाकी तो इंटरनेट पे उससे जुडी पर्सनल इनफार्मेशन उसे आसानी से हाथ लग गयी थी....अरुण ने उससे सवालात किया की आखिर क्यों वो? उस मुसाफिर की लाश देखने वहाँ पहुँचा था और डेड लेक से उसका क्या सम्बन्ध था? अरुण ने बताया की अगर वो साफ़ साफ़ कुछ न कहेगा तो फिर पुलिस छानबीन करेगी और यकीनन उसे डेड लेक से जोड़ेगी और फिर उस हादसे को साज़िश ही मानेगी....दीप को डर घुस गया उसने अरुण के आगे अपने घुटने टेक दिए|

इस बीच दीप ने उसके लिए एक ड्रिंक बनाते हुए सर्व की उसके आगे...अरुण ने मुस्कुराते हुए ड्रिंक क़बूल किया ...उसने चुस्किया लेते हुए एक बार घर को चारो तरफ से देखा उसे बेहद अजीबोगरीब तस्वीरें और किताबो को घूरते देख दीप मुस्कुराया...इस बीच उसने अपने लिए फिर एक नया ड्रिंक बना लिया था|

"मैं पेशे से परनोर्मलिस्ट हूँ भूत-प्रेत पिशाच वेयरवोल्फ आत्माये इन सब पर मेरी मुकम्मल रिसर्च हुयी है और मैंने ये सब की है मैंने अकेले खुद पे खुद स्टडी करते हुए मैं सिर्फ इन सबकी वजूद न ही सिर्फ तलाश करा हूँ बल्कि इनकी कमज़ोरी इनकी होने की वजह सबकुछ निकालता हूँ"......एक पल को दीप ने अरुण की और देखा जिसे शायद इन सब बातों से उसपे हसी आ रही थी|

"मिस्टर मोहद दीप शायद आप भूल रहे है मैं इन सब चीज़ों पे यकीन नहीं करता"
"मैं जनता था आपका यही जवाब मुझे मिलेगा मिस्टर अरुण.....लेकिन आपके यकीन करने या न करने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूँकि कई साल से मैंने डेड लेक उस मनहूस कॉटेज और उस जगह के बारें में बहुत चीज़ें मालूमात करते हुए इस नतीजे पे पहुँचा हूँ की वहाँ कोई जंगली हिंसक जानवर नहीं आत्माओ का बसेरा है एक नहीं कई आत्माये"
"हाहाहा यानी मेरे सीनियर चीफ प्रकाश वर्मा को यकीन आपने दिलाया था"
"मैंने नहीं खुद पे खुद हर किसी को अपने आप समझ आ गया है की वहाँ जाना मतलब मौत के आँगन में पाव रखने जैसा है"

"ठीक है मान लिया की आपकी बात सच है तो फिर आपका आगे क्या विचार है?"
"उस कॉटेज से कई राज़ जुड़े हुए है मैंने पाता लगाया और उन्हें इंटरनेट पे अपने ब्लॉग पे शेयर किया"
"जो मेरी नज़रो से गुज़रा और आपका ही एक मात्रा डेड लेक से जुड़ा टॉपिक मुझे दिखा वरना कोई भी इतनी राज़ो से वाक़िफ़ नहीं जितना आप है"
"रिसर्च की है मैंने बताया न तुम्हें?"

"इंसान जब मरता है तो अगर बुरी मौत या बिन ख्वाहिश के वो मरे तो उसकी आत्मा प्रेत आत्मा का रूप धारण कर लेती है....उसके बाद वो भटकती रहती है जिस वजह से वो हिंसक हो जाती है और वापिस इंसानी दुनिया में आने की चाहत रखने लगते है हम उन्हे देख सकते है लेकिन कुछ पल के लिए वो फिर हवा सी बोझल हो जाती है ऐसे ही वहाँ जो ट्रैन हादसा हुआ था उसके बाद से वहाँ कोई गया नहीं मैं वहाँ कभी गया तो नहीं क्यूँकि ये matter पे मेरी दिलचस्पी इसी वर्ष से शुरू हुयी थी"

"मतलब वहाँ लोगो को मारके काटके फैका गया तो वो सब रूह बन गयी हाहाहा आर यू किडिंग में? इन सब पे आप यकीन करिये ऐसे कई हादसे शहर में भी होते है तो कहाँ है आत्मा हाहाहा?"

"देखना चाहते हो तुम तुम्हे ऐसा इसलिए लगता है की तुम ठहरे एक जासूस कभी साज़िश और शक के घेरे से बहार आओ और इस दुनिया को देखो बहुत राज़ दफ़न है इस सरज़मीं में बहुत से"..........गंभीरता से अरुण की तरफ देखते हुए मोह्द दीप ने कहा

एक पल को अरुण खामोश हो गया....."ये देखो ये किताबे ये देखो ये इनफार्मेशन कहो की मैं झूठा हूँ आजसे करीब ३० साल पहले २ मर्डर्स हुए ये दो कपल थे मैरी और जोसफ फर्नांडेस कॉटेज में करीब ३ दिन बाद ही ये दोनों ऐसे गायब हुए जैसे आसमान ने इन्हे निगल लिया हो कोई अपनी सारी दौलत संपत्ति घर छोड़कर यूँ कही निकल जाता है क्या? आजतक पुलिस को उनका सबूत न मिला पीछे रह गयी उनकी लावारिस वो लाश लेकिन जानते हो...जानते हो वो दोनों वही है हाँ उनकी आत्मा वही है"

"ये क्या बेवकूफ भरी बाते है हो सकता है उनका असल में मर्डर करके कोई उन्हें किसी और जगह ठिकाने उनकी लाश लगाए भाग गया हो देखो दीप अब बहुत हो रहा है शायद मेरा यहाँ आना फ़िज़ूल हुआ"

"मेरी पूरी बात सुनने से पहले तुम नहीं जा सकते".....अरुण इस बार खौफ्फ़ खा गया क्यूँकि दीप ने कस्के उसके बाज़ू को पकड़ा हुआ था उसने पलटके दीप को गुस्से से देखा तो दीप ने मांफी मांगते हुए फिर नार्मल होते हुए खुद को....रिक्वेस्ट भरे लहज़े से फिर अरुण की तरफ देखा

"आई ऍम सॉरी बट प्लीज लिसन टू मी फर्स्ट"
"कहो"
"कॉटेज में ३० साल बाद आज फिर जो कुछ उस मुसाफिर के साथ घटा उससे मेरा शक यकीन में तब्दील हो चूका है की वहाँ उन्ही का बसेरा है और वो सब वहाँ इकट्ठा होकर ज़िन्दगी को मौत बनाने की तलाश में है कोई भी वहाँ भूले भटके जाता है तो उसकी मौत तय लिखी होती है"
"ओह पार्डन मी मैं अब और इस बारें में कुछ नहीं सुन सकता मैं जा रहा हूँ गुड नाईट एंड गुड़ बाय"........कहते हुए अरुण वहाँ से जाने लगा....ऐसा लग रहा था जैसे वो काफी डिस्टर्ब सा हो गया था |

अभी वो दो कदम दरवाजे से बाहर निकलने को हो ही रहा था की इतने में उस आवाज़ ने उसे ठहरने पे मज़बूर कर दिया...उसने घूमकर दीप की ओर देखा जिसके आँखों में दहशत सिमटी हुयी थी जैसे उस वाक़्या को बताते ही वो सिहर गया हो

"आत्माओ से कांटेक्ट करना उनकी नेगेटिव एनर्जी और उन्हें देख लेना ये शक्तिया मुझमें तबसे है जबसे मैंने ये पेशा चुना या यु कह लो कोई अलौकिक ताक़त जो पुरखो से हमारे खानदान के हर इंसान में थी....मैंने भी कई आत्माओ को देखा और उनसे बात किया है कुछ शांत होती है लेकिन बेमौत तड़प में छटपटाती रूह बहुत ही खतरनाक और भयंकर उनके चेहरे को देखते ही जैसे हार्ट फेल हो जायेगा मैंने भी कांटेक्ट किया उस मुसाफिर की लाश मैंने इसलिए देखि क्यूँकि उसने खुद मुझे जो बताया उससे मैं बुरी तरह से डर गया था| वो आया था मैंने उसे बुलाया था उसी दरवाजे से उसी वक़्त उसी हालत में करहाते हुए दर्द में छटपटाती उसकी रूह क्या भयंकर चेहरा था उसका ऐसा लग रहा था जैसे तेज़ाब से किसी ने उसके चेहरे को जला दिया हो"

अरुण वहाँ और ना ठहरता अगर दीप ने उसे जाते वक़्त वो बात न कही होती....उसे पहले तो यकीन न लगा लेकिन उसके दिल ने उसे रोककर उस बात को सुनने पे जैसे मजबूर कर दिया....सुनते ही जैसे उसके रौंगटे खड़े हो गए उसे ये बात बचकानी नहीं बल्कि डरावनी सी लगी....क्यूँकि दीप के आँखों में उसे सच्चाई दिख रही थी....

"मरने से पहले वो यहाँ आया था"........अरुण ने कहा
"मरने से पहले कोई रूह आती है भला मरने के बाद वो यहाँ आया था"........कहते हुए दीप खामोश हो गया फिर उसने एक लम्बी सांस भरते हुए फिर बताना शुरू किया वो वाक़्या

"वो 10 नवंबर की रात थी जब मैंने काफी इनफार्मेशन के बाद भी कोई ख़ास बात उस जगह के बाबत न निकाल पायी तब मैंने ऊपरी ताक़त का सहारा लिया और वो मेरा छठा प्रयास था आत्मा को बुलाने का कमरे में उस वक़्त गुप अँधेरा था और ठीक उसी समय न जाने कैसे लाइट्स अपने आप चली गयी मोमबत्तिया आस पास की भुजने के कगार पे हो गयी जो आत्माओ का बुलाने का मैं अमल कर रहा था मैंने मोमबत्तियों को अभी भुजने से रोकने का प्रयास किया ही था की अचानक"


"वो रात आज भी मैं न भूल सकता हूँ| आत्माओ को बुलाने का मेरा छठा प्रयास जैसे नाकामयाब सा मुझे लग रहा था| डेड लेक की मालूमात जबतक मुझे हुई तब मुझे नहीं मालुम था की हाल ही में वहाँ वो घटना घट जाएगी| खैर मेरे लिए उस राज़ को जानना वाक़ई बेहद ज़रूरी हो सा गया| काफी सोच विचार के राजेश नाम के उस मर्डर विक्टिम को ही मैंने आख़िरकार बुलाने का फैसला कर लिया"

"उसकी आत्मा को!"............अरुण ने अध्यन से बाहर निकालते हुए दीप को टोका
"हाँ मैंने बुलाया था उसकी आत्मा को और वो आयी भी थी| प्रमाण दिखाने के लिए मेरे पास सबूत के तौर पे ये है ये"............एका एक दीप ने अपने जैकेट और शर्ट दोनों को अपने सीने तक उठा लिया

अरुण ने देखा की उसके पेट के निचले भाग पे एक गहरा ज़ख्म उभरा हुआ था ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने किसी धार तेज़ चाक़ू से हमला किया हो|

"य..ये कैसे हुआ?"
"हैरत में पढ़ गए न उस आत्मा को बुलाने का खामियाज़ा मैंने भुगता है"
"तुम्हारा मतलब ये है की वो राजेंद्र की आत्मा ने तुमपर हमला किया"
"बुलाके गलती ही तो की उस जैसी हिंसक आत्मा मैंने कभी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखी थी"

_________________

अरुण चुपचाप सुन रहा था....और दीप अपने शर्ट और जैकेट को ठीक करते हुए फिर वो दास्तान जैसे सुनाने लगा......"वो रात १० नवंबर की थी करीब २ घंटे से मैंने कोशिश पे कोशिश जारी रखी थी वक़्त की सुई जैसे ही १ से ऊपर हुयी तो अपने आप जैसे हवाओ का शोर मुझे अपने कानो में सुनाई देने लगा....लाइट अपने आप आने जाने लगी और फिर एक पल को पूरी तरीके से चली गयी नियम के अनुसार मैं उस वक़्त उठ नहीं सकता था वरना सारे रस्म भंग हो जाते खामोशी छायी हुयी थी मैं अँधेरे में वैसे ही बैठा हुआ आँखे मूंदें हुए मुझे अच्छे से मालुम है की मैंने दरवाजे की दोनों कुण्डी लगायी हुयी थी"...........अरुण ने दीप के इशारे पे दरवाजे की तरफ देखा जिसमे दो मज़बूत कुंडिया उसे दिखी|

"हवाओ का शोर बढ़ने लगा और उसी पल मुझे अहसास हुआ की कोई तेज रौशनी जैसे घर में पढ़ रही थी और मैंने गौर किया की मोमबत्तिया भुझने के कगार पे हो गयी थी सातो मोम्बत्तीयो में कुल दो मोमबत्तिया ही जैसे तैसे अपनी फड़फड़ाती लौ में जल रही थी| हो हो करती हवाओ की सरद मुझे जैसे काँपने पे मजबूर कर रही थी अचानक मैंने साफ़ देखा की वो तेज़ सरद हवाएं इस खुले दरवाजे से अंदर आ रही थी मैंने तो दरवाजा लगा दिया था तो फिर ये दरवाजा कैसे खुला? यकीनन आत्मा का अहसास मुझे अपने आस पास महसूस हुआ तभी एक साया..... दरवाजा जैसे हो हो करती हवाओ के शोरर के साथ और भी तेजी से पूरा खुल गया बहार से तेज़ रौशनी और साथ साथ सरद हवाएं अंदर घर में दाखिल हो रही थी मैंने आँखे खोले ही हुए पढ़ना जारी रखा वो साया उस मुर्दे की थी एका एक जैसे वो अंदर आके ठीक सामने जहा तुम खड़े हो वही वो खड़ा हो गया|

मैंने उसे देखते हुए बेहोश होने की कगार पे था.....मैंने कई आत्माओ से रूबरू खुद हुआ हूँ| लेकिन उस जैसी दुष्ट आत्मा मैंने आजतक नहीं देखी थी| वो उसी हालत में था ज़ख्मो में लिपटा खून से लथपथ पुरे कमरे में जैसे सिरहन सरद की इतनी बढ़ गयी की मुझे कुछ कहने में भी काफी मुश्किलें हो रही थी"
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asif biswas
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«Reply #8 on: February 15, 2019, 11:07:50 AM »
दीप ने जो उस हुलिया का ब्यान किया अरुण ने राजेंद्र उस मुसाफिर की लाश को वैसा ही पाया था|

"क्यों बुलाया मुझे? मैं तुम्हें किसी को नहीं बख्शुंगा"..........उस आत्मा ने अपनी दोहरी आवाज़ में गरजते हुए जैसे कहा
"क..क क्या हुआ था तुम्हारे साथ? किसने मारा है तुम्हें? किसने की तुम्हारी ये हालत".........दीप ने उस आत्मा से कहा जो उसे हिंसा भरी नज़रो से घुर्र रही थी
"मार डाला गया मुझे मार डाला गया"..............गरजते किसी बदल की तरह उस दोहरी आवाज़ में राजेंद्र की आत्मा ने कहा.....एक पल को दीप डर गया उसने अपने दिल को बेहद मज़बूत किया|

"क..किसने मारा तुम्हें?"............दीप ने फिर सवाल किया कांपते हुए
"उन लोगो ने उन सबने मिलके मुझे मारा मैं उस रात उस कॉटेज के तरफ से गुज़र रहा था रात के उस आलम जब मैं वहाँ पंहुचा तो एक आदमी को कॉटेज में मौजूद पाया और फिर और फिर".........वो बोलते बोलते गले से एक अजीब आवाज़ निकलने लगा जैसे अब दीप का उसपे काबू पाना मुश्किल हो रहा था|

वो दर्द से जैसे करहा उठा दीप ने उसकी उस भयंकर आवाज़ को सुन खुद को सक़्त कर लिया.....दीप ने देखा की उसकी आँखों से खून बह रहा था उसकी दोहरी आवाज़ पुरे कमरे और उसके दोनों कानो में जैसे सुई की तरह चूब रही थी| अब जैसे उसके बस में नहीं था उसे और काबू करना

"मैंने पूछा किसने मारा तुम्हें? कौन लोग थे वो?"
"उन लोगो ने सबने मिलके मुझे मारा है वो सब इंसान नहीं थे|"
"क्या वो जोसफ और उसकी पत्नी मैरी थे?".................उस आत्मा ने जैसे इस सवाल से अपने दांतो को जैसे पीसा जैसे अब वो घात लगाके बस दीप पे हमला ही करने वाला था| उसने सिर्फ अपनी गर्दन को हिलाया दीप को अपना जवाब मिल चूका था उसका शक यकीन में तब्दील हो चूका था|

"वहाँ और भी थे और भी और भी"............जैसे दहाड़ उठी वो आत्मा

दीप को महसूस हो चूका था की वो एक एक कदम आगे बढ़ाता हुआ जैसे दीप की ओर बढ़ रहा था| "ठहर जाओ वही पे ठ....ठहर जाओ वही ये मेरा हुकम है".............उस आत्मा ने गुर्राते हुए उसके करीब बस बढ़ रहा था.....दीप को उठना ही पड़ा क्यूंकि अब उसके स्पेल उस आत्मा पे काम नहीं कर रहे थे.....उसे समझ आ चूका था की ये बेशक बहुत शक्तिशाली आत्मा थी| जो मरकर अब जान से मारने पे उतारू हो चूका था| दीप ने उठते हुए वहाँ से भागना चाहा उसने पास की दराज़ जैसे तैसे खोली ओर उसमें से एक ताबीज़ निकाली ओर उसकी तरफ देखा

जो करीब १ हाथ दूर खड़ा था उसके दोनों ज़ख्म भरे खून से लथपथ हाथ जैसे उसके गले को बस दबोचने वाले थे....दीप ने ताबीज़ तुरंत उसके माथे पे लगाने की कोशिश की....उसकी इस कोशिश में उस आत्मा ने उसपे अपनी पकड़ बिठानी चाही ओर उसी पल उसके एक हमले से दर्द में दीप तड़प उठा आत्मा की उस ऊँगली ने उसके तलपेट पे जैसे मांस को नाख़ून से खरोच दिया था| अगर वो उसके सामने से न हटता तो पक्का वो पांचो ऊँगली के नाखुनो से उसके पेट को फाड़ डालता|

दर्द में तड़पते हुए गिरकर दीप ने पाया की ज़ख्म पे हाथ रखते ही उसे अपने हाथो पे खून का अहसास हुआ| वो आत्मा उसी की तरफ बढ़ती हुयी जैसे आ रही थी.......दीप समझ चूका था की अब वो उसे बिना मारे जाने नहीं वाली....वो खून करने पे आमादा हो चुकी थी....दीप ने तेजी से घायल हुए हालत में भी उठते हुए उस ताबीज़ को ठीक उसके माथे पे जैसे दोबारा लगा दिया.......इतना करना ही था की वो आत्मा दूर होने लगी कमरे में हवाएं जैसे बाहर से तुफानो की तरह घुसते हुए घर के सभी सामानो को गिरा दे रही थी| ऐसा लगा जैसे कोई तेज तूफ़ान आ गया हो|

"आअह्ह्ह ससस आह्ह्हह्ह्ह्ह छोड़ दो मुझे आआअह्ह्ह".........दोहरी आवाज़ निकालता हुआ दर्द में छटपटाते हुए वो आत्मा जैसे पीछे होती जा रही थी ओर दीप उसके माथे पे ताबीज़ वैसे ही लगाए उसके और बढ़ रहा था......माथे पे ताबीज़ के लगते ही जैसे वो तड़प उठा चीखने चिल्लाने लगा ऐसा लगा जैसे कान के परदे फट जायेंगे उसके माथा जैसे अपने आप जलने लगा था

मैं दुआ पड़ता गया और उस आत्मा पे अपना काबू पूरा करता गया....."छोड़ दो मुझे छोड़ दो मुझे"........वो गुर्राता हुआ दर्द भरी चीख में दहाड़ते हुए जैसे तिलमिला रहा था अगर मेरा उसपर से काबू हट जाता तो यकीनन वो उसी पल मेरे गर्दन को अपने दोनों हाथो से पकड़ लेता मेरी मौत तय थी| और खुदा ने साथ दिया और उसी पल वो मुझे धुएं में तब्दील होता दिखा उसकी दहाड़ और भी भयंकर होती चली गयी|

और ठीक उसी पल पुरे कमरे में चमड़े जलने के भाति एक अजीब सी बदबू गूंज उठी....जैसे उसका नापाक रूह जल रहा था| "आअह्ह्ह आआआह आआआआअह्ह"..........दहाड़ते छटपटाते हुए वो मेरे नज़रो के सामने एका एक ओझल होने लगा और कुछ ही श्रण भर में एक जलता धुआँ खिड़की के शीशो को तोड़ता हुआ जैसे घर से निकल गया|

कुछ देर तक ख़ामोशी छायी रही अरुण अपने बाज़ुओं को एकदूसरे से बांधे चुपचाप बड़े देर से दीप की बातें सुन रहा था| दीप ने स्वयं ही अपनी चुप्पी को तोडा...

"अब कहो ये टूटे शीशे ये मेरे ज़ख्म और इतना कुछ उस आत्मा का ब्यान करना क्या ये सब अब भी तुम्हारे लिए महज़ काल्पनिक बातें है जो मैं गढ़ रहा हूँ मेरी जान जाते जाते बची इतनी आत्माओ में कभी भी मुझपर ऐसा जानलेवा हमला ना हुआ है | फिर भी अगर ये बातें तुम्हारी समझ से बाहर है तो फिर मैं एक ही बात कहना चाहूंगा अगर ऐसा है तो अब तुम जा सकते हो जो सच्चाई तुम यहाँ जानने आये थे वो मैं बता चूका".........दीप खामोशी से चुपचाप अरुण के आगे पीठ किये खड़ा था|

"दीप आई ऍम सॉरी पर मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ भी ऊपरी चीज़ एक्सपीरियंस नहीं किया जिस बिनाह पे मेरा यकीन करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन अगर इन बातो में सच्चाई है तो फिर राजेंद्र की आत्मा के कहने के मुताबिक़ वो सब दुष्ट आत्माओ का किया धरा है"

"वही तो मैं जानना चाहता था की आखिर कौन कौन है? राजेंद्र के मुताबिक़ वो सिर्फ मिया बीवी नहीं है वह नापाक रूहों का जैसे एक पूरा डेरा है और वो सब उस खामोश वीराने में हर घडी किसी के इंतज़ार में जैसे सोये रहते है और जब किसी ज़िन्दगी की दस्तक उन्हे मिलती है तो वीरानो में कई ऐसी असीम ताक़त जीवित हो जाती है लेकिन इसका सम्बन्ध उस ट्रैन हादसे से जुड़ा भी हो सकता है जबतक हम वह नहीं जाएंगे तबतलक कुछ भी कहना फ़िज़ूल ही होगा"

"जान जाने का जोखिम है हाँ ये बात मैं कह रहा हूँ जान जाने का जोखिम है अगर ऐसा कोई चीज़ वह मौजूद है तो".......दीप जैसे अरुण की बातों से सकती से उसकी तरफ देख रहा था मानो जैसे अब भी उसका यकीन ना ही था

"तुम समझते क्यों नहीं? कोई जानवर कोई इंसानी साज़िश नहीं वहां पर आत्माओ का बसेरा है"

"अगर ऐसा है तो फिर हमारे इस केस में होने का क्या फायदा? हम किसके पीछे जाए जो ज़िंदा ही नहीं जो तमाम रूहें है जो कई सालों से वहा भटक रही है"

"हाँ अरुण हम्हें कॉटेज के तमामो रहस्यों से पर्दा हटाना है तो हम्हें उन्ही चीज़ों के पीछे लगना होगा और वह तुम मेरे बगैर अकेले भी नहीं जा सकते एक दिन भी तो क्या एक रात भी गुज़ारना वहा मुश्किल है अरुण"

"तो फिर कैसे इन घटनाओ को रोका जाएगा कैसे उस डेड लेक पे बढ़ रहे उन वारदातों को हम रोक पाएंगे"
"मुझे वह जाके मालूमात करना होगा"
"लेकिन इसमें खतरा है दीप"
"जानता हूँ | पर यही एक जरिया है अरुण बस एक यही"

"ठीक है | तो फिर एक काम करते है हम दोनों ही उस कॉटेज उस डेड लेक में जाएंगे मैं भी जानना चाहता हूँ की आखिर ऐसी ये क्या ताक़त है जिसका मरकर भी वजूद है"............एका एक जैसे गंभीरता से अरुण ने कहा |.

अरुण ने दीप पे यकीन तो कर लिया था लेकिन उसके दिल में ये बात पूरी तरीको से हजम नहीं हो रही थी| अब वो खुद चाहता था की अगर ऐसी कोई चीज़ थी भी तो वो उसे बिना देखे विश्वास नहीं करने वाला था| दीप ने उसे कहा की वो तैयार रहे जब भी वो इख़्तिला उसे करेगा...अरुण ने सहमति लेते हुए एक बार दीप से मांफी मांगी और वह से रुक्सत हो गया पीछे जैसे छोड़ गया सोच में फसे खड़े ही दीप को....

उस दिन जब अरुण घर लौटा था....तो एक एक बात उसके दिमाग में घूम रही थी....राजेंद्र की लाश दीप के हिसाब से बुलावे पे आयी उसकी आत्मा उसपे किये वो वार जिसका ज़ख्म उसने दीप के तलपेट पे देखा वो टूटी खिड़की का हिस्सा.....सब कुछ जैसे उसके दिमाग में दृश्य की तरह घूम रहा था |

एजेंसी से मुहैया करवाई उसके पास रखीं वो गन जो उसने केवल एक ही बार जान जाने में इस्तेमाल किया था बेहिचक उस क्रिमिनल पे शूट किया था| उसने कागज़ बानी पुड़िया में कुछ बुलेट्स को टेबल पे डाले उसे गिना और फिर पुड़िया बनाते हुए अपनी जीन्स की पॉकेट के हवाले किया..फिर उसने गन से मैगज़ीन निकाली उसे परखी फिर उसमें पांचो की पांच गोलियों को देखा....गन लोडेड थी...वो जानता था डेड लेक में बिना उस गन के उसका जाना मतलब निहत्ता हुए जाना था....वो जानता था की अगर साज़िश की उसे बू मिली तो यकीनन उसे भी मारने की कोशिश की जायेगी जिस पल उसे ट्रिगर दबाना ही पड़ेगा...एक पल को उसने दीप पे भी शक किया था| कोई भी झूटी कहानी वो गढ़ ही सकता था| लेकिन अगर वो सच में आत्माये थी तो क्या गन से निकली गोली उसके काम आती क्यूंकि ये सब तो ज़िंदा इंसानो पे काम आते है मृत पे थोड़ी.....सोच की कश्मकश में घिरा खिड़की के पास खड़ा था | तभी अरुण ने देखा की सर्दी से चाँद बादलो में ढका सा हुआ था....

दिसंबर २० तारिक के उस दिन ही डायरेक्टर राम अपने क्रू जिसमें उसकी अस्सिटेंट डायरेक्टर सौम्या,राइटर साहिल,हीरोइन रैना,कैमरामैन जावेद,और मेक अप-आर्टिस्ट सुनील के साथ उसने कॉटेज जाने का रुख किया था....सर्दी का कोहरा इस हदतक बढ़ गया था की भरी सुबह अँधेरी शाम जैसी लगने लगी थी...राम अपनी सिगरेट का कश लेते हुए अपने क्रू मेंबर्स को हसी मज़ाक करते हुए देख रहा था | उसने पाया की सौम्य चुपचाप बैठी हुयी थी वो जानता था क्यों? वो हरगिज़ कॉटेज आने के लिए तैयार नहीं हो रही थी ये पहली बार था की उसने अपने डायरेक्टर को साफ़ इंकार किया जाने के लिए....लेकिन राम के धमकी भरी बातों ने जैसे उसे मजबूर कर दिया....वजह अगर वो उसके साथ शामिल नहीं हुयी तो नौकरी से तो हाथ धोएगी ही कोई भी डायरेक्टर उसे काम नहीं देगा....सौम्य का मूड इसी लिए ऑफ था डायरेक्टर राम ने उसपे चांस मारने के भी कई कोशिश किये थे लेकिन वो उसके हाथ न आयी थी| इसी लिए अब उसका पूरा फोकस अपनी नयी फिल्म "हॉन्टेड" को शूट करने में था|
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asif biswas
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«Reply #9 on: February 15, 2019, 11:09:30 AM »
गाड़ी तेज़ रफ़्तार में नेशनल हाईवे से गुज़रते हुए तुरंत पहाड़ी इलाको से होते हुए घने जंगलो में भीड़ भाड़ भरी आवादी को पीछे कई कोस दूर छोड़ उस सुनसान इलाके में आगे बढ़ रही थी| इसी बीच सौम्या ने देखा की सड़क के ठीक बगल में एक पुराण सा बोर्ड लगा हुआ था जिसमें लिखा था "डेड लेक" और एक एरो सीधा उस रास्ते की और जैसे डायरेक्शन दे रहा था|

सौम्य का ना जाने दिल इतना बेचैन उसे क्यों लग रहा था? वो उस मर्डर केस को सुनी थी जिसमें उस मुसाफिर की ब्रुटली मर्डर हुयी थी और वही डेड लेक पे उसकी बॉडी पायी गयी थी...कोहरा इतना ज़्यादा छाया हुआ था की गाडी के शीशो पे ओस से पानी बह रहा था.....राम ने कार वाइपर्स से शीशो को साफ़ करवाते हुए आगे रोड पे ध्यान दिया|

उसने गाडी तुरंत बायीं ओर मोड़ी....किसी कच्ची सड़क पे जैसे गाडी उतर गयी थी इसलिए बार बार गाडी जैसे हिचकोले खा सी रही थी...जब राम ने एकदम से गाडी को रोका तो वो चेहेक्ते हुए बोल उठा

"गाइस वि हेव रिचड टू आर डेस्टिनेशन"..........एका एक सबने उतरते हुए सामने की ओर पाया की...पुराना सा लकड़ी का बना वो कॉटेज उनके ठीक सामने था.....वो इतना वीरान लग रहा था जिसे देखके हर कोई एक पल को सिहर गया

"मैंन डिस प्लेस इस रेली स्केरी एंड होर्रिबल".........साहिल ने कॉटेज की ओर देखते हुए राम से कहा....जो मुस्कुरा उठा

"जब जगह इतनी डरावनी हो सकती है तो सोचो फिल्म कितनी होगी हाहाहा".........रैना और बाकी क्रू मेमेबर्स भी हस पड़े

"क'मौन गाइस आओ रैना लेट'स गेट इनसाइड"...........शूटिंग का सामन निकालते हुए डिक्की से वो छोटी सी क्रू अपने डायरेक्टर के साथ दरवाजे की ओर बढ़ चली|

"अरे इसपे ताला झूल रहा है".........पीछे खड़े जावेद ने टोका
"रिलैक्स गाइस चाबी मेरे पास है अथॉरिटी वालो को काफी परसुएड करना पड़ा कुछ टेबल सरकाना पड़ा तब जाके ही उन लोगो ने हामी भरी".........कहते हुए डायरेक्टर राम ने चाबी से ताला खोलते हुए कहा|

ताला खट की आवाज़ के साथ खुल गया.....राम ने मुस्कुराते हुए जैसे कुण्डी खोलके दरवाजे को धक्का देना चाहा तो ऐसा लगा जैसे दरवाजा अंदर से लॉक्ड था....राम ने २-३ बार दरवाजे को सकती से धकेला...लेकिन दरवाजा खुला नहीं.....सबके चेहरों पर अजीब सी हैरानी दिखने लगी|

"गेट पे ताला लगा था वो तो खोल दिया हमने फिर ये अंदर से बंद कैसे? क्या कोई अंदर मौजूद है?".......सौम्या ने ही सवाल किया

"ओह क'मौन सौम्या सेंस लगाने वाली बात है....ये एक वीरान abadoned कॉटेज है जहा कई सालो से कोई नहीं रह रहा शायद अंदर से लॉक्ड होने का कारण कोई और बात हो सकती है वेट".......डायरेक्टर राम ने थोड़ा सोचा फिर उसने कॉटेज का मुआना चारो ओर से किया...

"हे गाइस एक खिड़की है सुनील तू आ".......सुनील उसके पास आया हर कोई दरवाजे पे ही खड़ा दोनों की बातो को सुन रहा था

"न..नहीं मैं अकेला अंदर"..........सुनील ने प्लान सुनते हुए हिचकिचाए लहज़े से कहा
"अबे डरपोक कोई चोरी नहीं करने कह रहा हूँ| बस अंदर जाके दरवाजे पे देखना कोई कुण्डी लगी है क्या?"........राम की बात सुन सुनील ने हामी भरी

जैसे तैसे सुनील ने खिड़की खोली तो वो आधी खुल गयी थी पर इतनी जगह थी की कोई भी अंदर घुस सकता था.....उसने एक बार पलटके सबकी ओर देखा फिर चढ़कर अंदर चला गया....."यस शाबाश जा अंदर"......सुनील अंदर घुस चूका था घर में....

दरवाजे पे राम वापिस लौटा.....हर कोई चुपचाप था..."सुनील सुनील अबे गेट खोल क्या हुआ? मर गया क्या? अबे क्या बाहर ही खड़ा रखेगा हम्हें"......खिजलाते हुए राम ने कर्कश स्वर में कहा

लेकिन जब कोई सुनील की तरफ से जवाब न मिला तो एका एक सबके चेहरे पे परेशानी के भाव आने लगे.....रैना ने ही कहा "वो कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा?"..........राम ने जैसे उसकी बात सुनी ही ना हो...उसने आगे बढ़ते हुए दरवाजे पे दस्तक दी..."सुनील सुनील दरवाजा खोल".......पर कोई जवाब न मिला राम को अंदर से.....

वो अभी कुछ सोच ही रहा था....की इतने में दरवाजे की खट से कुण्डी किसी ने अंदर से खोली....पलभर न लगा और चर्चारती उस तीखी आवाज़ के साथ दरवाजा खुलने लगा...एका एक सबकी नज़र दरवाजे के खुलते ही भीतर के गुप् अंधेरो में पड़ी.....जावेद और राम पहले कमरे में दाखिल हुए पीछे साहिल भी सौम्य के साथ अंदर आया रैना ने अपने मुंह पे कपड़ा रख रखा था मानो कई दिनों से बंद घर से कोई अजीब सी महक आ रही हो|

तभी अचानक सुनील सबके सामने प्रस्तुत हुआ| राम ने उसे डांटा....सुनील खुद खासते हुए बोल उठा

"लगता है बरसो से यहाँ कोई नहीं आया सब चीज़ें अपनी अपनी जगह मौजूद है| दरअसल मैं जब अंदर आया तो मैं घर का ही मुआना करने लगा था सॉरी फॉर डेट लेकिन कमाल है की गेट अंदर से लॉक्ड था"....सुनील ने अपने आश्चर्य को प्रकट करते हुए कहा |

"तो क्या अंदर कोई मौजूद था?"...........जावेद ने सवाल किया

सुनील ने इंकार में सर हिलाया.....एक बार हर किसी ने चारो तरफ का मुआना किया....पुराणी सब चीज़ें वह मौजूद थी.....सामने एक डेस्क और टेबल था जिसपे धुल मिटटी लगी हुयी थी...."स्ट्रेंज एनीवे गाइस पहले थोड़ा कमरों का मुआना कर लेते है उसके बाद ही शूट का प्लानिंग करेंगे"

"वैसे हम यहाँ कबतक रुकेंगे"

"फॉर २ डेज".........सौम्य के सवाल का तुरंत राम ने जवाब दिया...सौम्य खामोश हो गयी....

सभी क्रू मेंबर्स ने कॉटेज के हर कमरे,किचन बाथरूम को पाया की वो सही हालातो में थे और वह धुल की ऐसी परत जमी हुयी थी जैसे कई बरसो से वह कोई भी ना आया था यानी पुलिस के तफ्तीश के बाद ही वो बंद कॉटेज का दरवाजा इतने दिनों बाद उन लोगो ने खोला था और इस्तेमाल करने लायक थे.....कमरे की साफ़ सफाई का जिम्मा सौम्या को सौंप दिया गया जिसके के लिए ये बेहद मुश्किल हुआ फिर भी उसे काम तो करना ही पड़ा हलकी फुल्की साफ़ सफाई और ठहरने के बंदोबस्त में कुछ घंटे खर्च हुए इस बीच क्रू मेंबर्स ने पाया कॉटेज में नीचे के साथ साथ ऊपर भी कुछ कमरे मौजूद थे जिनमें ताला लगा हुआ था उन लोगो ने खुद ही ताला तोड़ दिया जिनकी चाबी वैसे भी उन्हे नहीं मिल पायी थी सामन बहुत से कमरों में मौजूद थे और कुछ दीमक चट कर गए थे ग्रांडफादर क्लॉक टूटी हुयी थी जिसकी सुई करीब डेढ़ पे अटकी हुयी थी शीशे उसके धुल से मैले हुए थे छतो पे लगा फानूश काम नहीं कर रहा था और कुछ टुटा हुआ सा था कई तस्वीरें धुल में जमी थी जिनमें कुछ देख पाना मुश्किल ही था क्यूंकि तस्वीर फट हो चुकी थी बस एक फ्रेम में मैरी और जोसफ जो उस घर के मालिक थे उनकी एक तस्वीर बारे बैडरूम में मौजूद थी क्रू मेंबर्स ने पाया की बेड सही हालातो में थे इसलिए उसपे आराम किया जा सकता था और डाइनिंग टेबल सोफे भी गुड कंडीशन में थे उन्हें हैरत हुयी की सब जैसे का तैसा वह उस कॉटेज में छोड़ा रखा हुआ था |......दोपहर होते होते बादल घने हो गए और फिर काले बादलो से आसमान ढक गया.....बारिश मूसलाधार होनी शुरू हो गयी.....अपने कमरे में बैठी सौम्या ने झाँका तो घने जंगलो में बारिश बरस रहा था....जैसे जैसे वक़्त बढ़ रहा था उसका मन न जाने क्यों बेचैन सा होता जा रहा था?

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asif biswas
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«Reply #10 on: February 15, 2019, 11:10:38 AM »
"आज मौसम बेहद ख़राब लग रहा है लेकिन शूट तो करना ही होगा"..........राम सिगरेट का कश लेते हुए अपने राइटर साहिल से कह रहा था|

"पर आउटडोर में शूट करना मुनासिब रहेगा मुसलसल बारिश हो रही है ऐसे में शूट नहीं हो पायेगा".....साहिल ने जवाब देते हुए कहा

"शूट तो होना ही है आउटडोर से नहीं इंडोर से ही सही खैर बिगनिंग ऑफ़ थे स्टोरी क्या थी तुमने स्क्रीन प्ले रेडी कर लिया है न?".........राम ने साहिल की ओर देखते हुए कहा

"जी बिलकुल शुरुवात में एक हॉट सीन है जिसमें हीरोइन और उसका पति कॉटेज में ख़राब मौसम के चलते रात की पनाह लेने आते है| वीरान कॉटेज को देख वो दोनों यहाँ रात गुज़ारने को तैयार हो जाते है| फिर एक रूम में दोनों के बीच वही से हॉट सन शुरू होता है".........एक एक कश लेते हुए सिगरेट का राम मुस्कुराता है

"फैंटास्टिक नाइस तो फिल्म का फर्स्ट बिगनिंग हम इसी कॉटेज के एक कमरे से करते है क्यों? ऑलराइट"......राम उठ खड़ा हुआ उसने अपने क्रू मेंबर्स को बुलाया

सौम्या चुपचाप सबके साथ साथ हामी में जवाब दे रही थी....कुछ ही देर में सेट लगाया जा चूका था | रैना एक झिल्ली जैसी सफ़ेद गाउन पहने बिस्तर पे बैठी हुयी डायलॉग्स को पढ़ रही थी| उसे डायरेक्शन बताने के बहाने राम उसे कई जगहों पे छू रहा था | ये सब चीज़े सौम्य नोटिस कर रही थी और हीनभावना भरी नज़रो से डायरेक्टर राम को घुर्र रही थी| रैना भी हस हस के जैसे फ्रीली डायरेक्टर राम से बिलकुल चिपककर बैठी उसके साथ काम से ज़्यादा अठखेलिया कर रही थी|

डायरेक्टर राम ने कैमरामैन जावेद से कहा की इस सीन में वो खुद रैना के साथ शूट करेगा.....जावेद ने कैमरा संभाल लिया था | सुनील रैना का जल्दी से मेक अप करते हुए राम के आदेश अनुसार तुरंत सेट से बाज़ू हटके खड़ा हो गया....शूट स्टार्ट हो चुकी थी......रैना के जांघो पे हाथ फेरते हुए राम उससे फ़्लर्ट कर रहा था.....रैना मुस्कुराये उसके हर डायलॉग्स का जवाब मुस्कुराये दे रही थी|

सौम्या की मज़बूरी थी जो उसे डायरेक्टर राम के साथ काम करना पड़ रहा था | डायरेक्टर राम ने उसे कई मौके दिए थे की वो उसकी फिल्म का हिस्सा बने लेकिन सौम्य ने इन्कारी में सर हिलाये रखा था| खुन्नस में डायरेक्टर राम काम का सारा भार उसपे ही छोड़ देता था| सौम्य लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी क्यूंकि उसकी माली हालत ठीक नहीं थी और डायरेक्टर राम के पास काम करने के सिवाह उसके पास कोई चारा भी नहीं था| वो जिस बिग ब्रेक की फिल्मो में इंतजार में लगी हुयी थी वो इंतजार अबतक बस चल ही रहा था |

अचानक जैसे ही शूट प्रोग्रेस में था उसी पल धढ़ से कोई चीज़ आवाज़ की जिसने सेट पे मौजूद हर किसी को चौका दिया....कैमरामैन जावेद एक पल को हड़बड़ा उठा जिससे कैमरा हिल गया.....डायरेक्टर राम और रैना दोनों ने उस आवाज़ को सुना था राम ने थोड़ा चिढ़ते हुए गुस्से में कहा "व्हाट डी हैल ? ये आवाज कहाँ से आयी? क्या जावेद पूरा सीन चौपट कर दिया तुमने"..............जावेद ने मांफी मांगते हुए जैसे खुद को झेप लिया|

"सौम्या देखनाा आवाज कहाँ से आयी?"..............राम ने पास खड़ी सौम्य को कहा....सौम्य हड़बड़ाई पहले तो सहमी फिर उसने बाहर निकलते हुए झाँका चारो ओर खामोशी थी और कोई नहीं था

"सर बाहर तो कोई नहीं है"..........सौम्य ने अंदर आते हुए कहा
"उफ़ हो डिस्ट्रक्ट हो गया क्या जावेद कैमरा पूरा हिला दिया तुमने अब ये सीन फिर शूट होगा एंड डिस टाइम नो डिस्टर्बेंस प्लीज".........कहते हुए शूटिंग फिर शुरू हुयी|

सौम्या का लेकिन मन स्थिर नहीं था........उसने बाहर जाके मुआना किया....सीढिया सामने उसे दिखी जो ऊपर के माले की और जा रही थी...जहा वो खड़ी थी वो बड़ा सा लम्बा सा हॉल रूम था......उसने एक बार दोनों तरफ की ओर देखा....सूरज बदलो में एकदम कही चुप गया था मुसलमुसल बारिश के वजह से एक दम कोहरा और अँधेरा छा सा गया था| सौम्या ने आगे बढ़ते हुए सीढ़ियों से ऊपर चढ़ना शुरू किया...आज सुबह ही उसने वह जाके बाकी क्रू मेंबर के साथ चेक किया था| कई कमरों में ताला झूल रहा था एक कमरा डायरेक्टर का था दूसरा जिसमे वो और रैना के सोने का इंतजाम किया गया था | जबकि तीसरा कमरा जावेद और सुनील का था....अचानक सौम्या अभी सोचते हुए उलटे पाव जा ही रही थी की अचानक उसने पाया की सामने खिड़की पे किसी का अक्स मौजूद था| एकदम से उसने घूमके सामने की उस खिड़की ओर देखा जो की जंगलो की ओर खुलता था| एका एक कदम बढ़ाते हुए जब वो वहा पहुंची तो वहा कोई नहीं था|

सौम्या ने खिड़की को आहिस्ते से झटका देके खोल दिया तो बाहर की सर्द हवा उसे अपने चेहरे पे यूँ लगी जैसे जैसे हवाएं उसपे झपटी हो....अपनी आँखों से धुल साफ़ करते हुए सौम्या ने बाहर देखा तो बदलो में बिजलियों की गरगराहट शरू हो चुकी थी| उसने जल्दी से खिड़किया लगायी तो बाहर से अंदर आती हवाओ का शोर भी थम गया | सौम्या अपने कमरे में आयी उसने आस पास की चीज़ो को देखा सब कितने पुराने थे कुछ दराज़ें तो दीमक खायी बुरी तरीके से ख़राब हो चुकी थी| सौम्या कुर्सी पर ही बैठते हुए सोच में दुब गयी की वो आवाज़ आयी तो ऊपर से थी पर किधर से आयी थी?

सौम्या को अचानक अहसास हुआ की ठीक सामने आईने में कोई ठीक उसके बगल में खड़ा मौजूद है....सौम्य का ध्यान जब आईने पे होने लगा तो उसे सचमुच किसी के होने का अहसास अपने पास लगा...उसने झट से आईने की तरफ देखा तो वह कोई नहीं था| सौम्या अकेले उस रूम में और ज़्यादा देर ठहर नहीं पायी और रूम का दरवाजा लगाए झटपट सीढ़ियों से नीचे उतर गयी|

शूट हो चूका था | सौम्या को जब कमरे में आते डायरेक्टर राम ने देखा तो जैसे उसपे बरस पड़ा...."सौम्या कहाँ चली गयी थी तुम ? there was a Shoot happening and u just disappeared कितनी आवाज़ें दी मैंने तुम्हें?".........राम की बात सुनके सौम्या चुपचाप हो गयी

"वो दरअसल? मैं उस आवाज़ के पीछे ऊपर गयी मैंने किसी को ऊपर फील किया जैसे कोई परछाई"
"व्हाट रब्बिश? परछाई किसकी आत्मा की हाहाहा"..........राम जैसे सौम्या का मज़ाक उडाता हुआ बोला....साथ में खरे सारे क्रू मेंबर भी हस पड़े
"सर आई ऍम नॉट लाइंग मैं सच कह रही हूँ |"
"लुक सौम्या आई डॉन'ट वांट की तुम बाकियो को भी अपने इलुशन से डराओ मैं नहीं चाहता यहाँ कोई भी किसी भी किस्म का सीन क्रिएट हो अंडरस्टैंड दू यू अंडरस्टैंड?"...............राम के हिदायत भरी बातों से सौम्या को खामोशी ही साधके मानना पड़ा

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asif biswas
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«Reply #11 on: February 15, 2019, 11:12:15 AM »
डायरेक्टर राम को उस दिन शूटिंग करने का और अवसर न मिला कारण था बिगड़ते मौसम का मिजाज और ऊपर से घना छाया कोहरा और अँधेरा होने को था जबकि वक़्त शाम ४:३५ का था....रैना ने बाथरूम को खोला और अंदर दाखिल होते हुए नल को खोला....ऊपर से पानी उसके संगमरर जैसे बदन पे गिरने लगा...वो ठन्डे पानी से ठिठुर सी गयी थी उसने कुछ देर नहाया उसके बाद झट से नल को बंद कर दिया..."उफ़ सौम्या सौम्या विल यू प्लस गिव मी माय टॉवल?"...........रैना को लगा जैसे कमरे में कोई था ही नहीं | उसने फिर उकताते हुए आवाज़ दी....

वो वैसे ही भीगे बदन ठण्ड से ठिठुर सी रही थी..."सौम्या सौम्या उफ़ आर यू डेयर?".........रैना को लगा की शायद वो नीचे थी...उसने दरवाजा खुद ही खोलना चाहा तो दरवाजा अपने आप खुलने लगा...दरवाजे की आवाज़ सुन वो झट से पीछे को हो गयी | दरवाजा आधा खुलकर ठहर गया......"इस समवन डेयर?"........जवाब पाने से पहले ही किसी ने हाथ अंदर बढ़ाते हुए तौलिया अंदर की ओर किया....रैना को लगा की शायद ये सौम्य ही थी...."थैंक गॉड सौम्या उफ़ ससस य..यी क्या आह्ह्ह्ह"..........एक पल को रैना चीख उठी क्यूंकि तौलिया जैसे ही उसने उस हाथ से लिया उसे असलियत दिखी....वो हाथ पे कई ज़ख्म उभरे हुए थे और उनसे खून निकल रहा था यकीनन वो भयानक हाथ सौम्या का नहीं हो सकता था.....चीखते हुए जैसे ही रैना ने दरवाजा लगाना चाहा वो हाथ अपने आप गायब हो गया और तभी शावर का नल अपने आप खुलने लगा....

रैना को समझ न आया और ठीक उसी पल उसे अहसास हुआ की ऊपर नल से पानी नहीं लाल लाल ताजा खून निकल रहा था....रैना चीखते हुए बाहर निकलना चाह रही थी खून से तरबतर वो पूरी भीग चुकी थी....वो अपने बदन पे लगते खून को देख चिल्ला उठी दीवारों पे और फर्शो पे भी खून बहे जा रहा था|

"अरे ये तो रैना की आवाज़ है"............एका एक अपने सिगरेट को फैकते हुए राम ने अपने क्रू मेंबर्स की ओर देखते हुए कहा....जो उस चीख को सुनते ही फ़ौरन हड़बड़ा उठे सब के उस वक़्त हॉल रूम में नीचे बैठे हुए शूट को लेके बातचीत में राम से लगे हुए थे....तुरंत सब सीढ़ियों से ऊपर के माले पे चढ़ते हुए आये.....उसी पल सौम्या राम से टकराई जो नीचे उतारते हुए उन लोगो को बुलाने ही आ रही थी|

"क..क्या हुआ? व्हाट हैपेंड?"........दोनों बाज़ुओं से सौम्य को पकड़ते हुए....जो खौफ्फ़ खायी हुयी थी
"व..वो रैना अंदर बाथरूम से बाहर नहीं आ रही और वो चीखें जा रही है मैं उसकी आवाज़ सुनते ही फ़ौरन रूम में आके ये सब हाल देखा"..........सौम्या के खामोश होते ही उसे परे हटाए राम बाकियो के साथ कमरे में प्रवेश करता है |

इतने में रैना दरवाजा खोले तौलिया लपेटी वैसी ही खून से तरबतर भीगी हालत में बाहर निकल आती है....उसे देख हर कोई चौंक जाता है....राम उसे दोनों बाज़ुओं से थामते हुए सकती से उसे झिंझोड़ते हुए शांत करने की कोशिशें करता है...कुछ देर बाद रैना खामोश हो जाती है|

"रैना ये सब ये क्या है? व्हाट जस्ट डी फ़क हैपेंड विद यू?".........राम उसकी हालत को देखते हुए कहता है....सौम्या रैना को बिस्तर पे बिठाती है....हर कोई वह खड़ा मौजूद होता है|

रैना जैसे तैसे अपने पे काबू पाते हुए सुबकते हुए सारा हाल ब्यान करती है..."क्या ? शावर से ब्लड खून कैसे आ सकता है? हमने जब चेक किया था तो बंद बाथरूम था और नल में तो पानी भी नहीं आ रहा था |"

"राम सर ठीक कह रहे है | मैंने ही तो सारे कमरे अच्छे से चेक किये थे....थोड़ी बहुत साफ़ सफाई भी की थी पर बाथरूम में नल से बेहटा खून और तो और मैं तो यहाँ इस कमरे में थी ही नहीं मैं तो बाकी कमरों का जायज़ा लेने बाहर गयी हुयी थी तुम्हारी आवाज़ सुनी to"

"अगर वो तुम नहीं थी तो वो हाथ जिसने मुझे तौलिया बढाए दिया उस हाथ पे मैंने ताजे ज़ख्म देखे खून लगा देखा ऐसा लगा जैसे वो सफ़ेद हाथ किसी इंसान का नहीं बल्कि"

तबतलक राम ने बाथरूम में झाका तो उसके होश उड़ गए....जब वो अंदर लौटा तो पाया की सुनील अंदर कमरे में दाखिल हुआ...."राम सर ऊपर की टंकी पूरी खाली पड़ी है कोई खून तो क्या मुझे तो वहा किसी की इंसान की डेडबॉडी भी नहीं".......सब जैसे चुप से हो गए

"म..मैं सच कह रही हूँ राम इस घर में ज़रूर कुछ है मेरी हालत देखो ये मेरे पुरे शरीर में खून कहाँ से लग गया बताओ जरा अगर मैं झूट कह रही हूँ तो"..............रोती रैना को राम ने चुप करा और उसे अपने साथ फिर बाथरूम में ले आया "मैं खुद देखता हूँ रुको".......उसने जैसे ही नल खोला तो साफ़ पानी उसे नल से गिरता दिखा

"अरे पानी तो पूरा साफ़ है कोई खून तो नहीं फिर खून कैसे आया?".........राम ने सबकी ओर देखते हुए कहा...रैना भी एकदम हैरान थी

"पर?"...............रैना जैसे समझ न पायी की आखिर उसके साथ क्या हुआ था?
"देखो रैना मुझे लगता है ज़रूर इसमें किसी की चाल है मुझे तो ऐसा ही लगता है की कोई हमारे साथ मज़ाक कर रहा है और अगर ये मुझे किसी क्रू की शरारत लगी तो मैं उसे छोडूंगा नहीं".......राम ने सबकी ओर देखते हुए कहा हर कोई जैसे साफ़ इंकार में सर हिलाते हुए इस बात को नकार रहा था |

रैना दोबारा से बाथरूम जा नहीं रही थी पर राम ने उससे कहा की वहां सौम्य के साथ वो खुद मौजूद रहेगा ये सुनके जैसे रैना को थोड़ी हिम्मत मिली....उसने बाथरूम का दरवाजा लगाया पर कुण्डी नहीं लगायी| उस वक़्त फिर कोई हादसा नहीं हुआ....लेकिन हर किसी के मन में हुए इस हादसे एक अजीब सा शक और डर दोनों दिलो में समां गया था |

कुछ देर बाद फिर सब सामान्य हो गया....माहौल में हस्सी मज़ाक का दौर फिर शुरू हो गया....हर कोई dining table पे बैठा खाने का लुत्फ़ उठा रहा था | इतने में उस आवाज़ को सुन सब दोबारा चौंक उठे...."अरे ये आवाज़ कैसी?"......"ये आवाज तो किसी हॉर्न की लग रही है?"..........एका एक राम और बाकी सब उठकर दरवाजे के पास आये....उन्होने देखा की बारिश थम चुकी थी | और उस गाड़ी के हेडलाइट बंद होते ही दो जन गाडी से बाहर की ओर निकले...

"अरे सर यहाँ के लिए सिर्फ हम्हे अथॉरिटी ने परमिशन दे रखी थी तो फिर ये लोग कौन? वो भी शाम के इस वक़्त"..........राम को साहिल ने टोका...सौम्य भी चुपचाप उन दोनों कॉटेज के सामने खड़े घुररते हुए देख रही थी |

एका एक दरवाजा खोलते हुए राम सुनील और साहिल के साथ बाहर निकला.....अपनी तरफ उन तीनो को आते देख वो दोनों चौंक उठे|
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asif biswas
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«Reply #12 on: February 15, 2019, 11:12:56 AM »
गाड़ी से निकलते ही एक पल को दीप और अरुण ने उस विशाल कॉटेज की ओर देखा....एका एक अरुण के मन में जैसे उसे महसूस हुआ की वाक़ई वो जगह किसी भूतिया स्थान जैसे थी| आस पास घना जंगल और उसके बीच वो कॉटेज....दीप जैसे मुंह खोले हर तरफ से कॉटेज का जायज़ा ले रहा था| दोनों खामोशी से वैसे ही खड़े थे | सुबह के निकले दीप और अरुण पहले ही देर हो चुके थे उनके रास्ते में जैसे कई बाधाएं आयी थी.....दीप ने रास्ते में कहा था की शायद खुदा भी नहीं चाहता की वो उस मनहूस कॉटेज का रुख करे.....लेकिन अरुण को तो छानबीन और रहस्य से पर्दा हटाने के लिए ही ये केस मिला था....वो कभी भी अपनी ज़िंदगी के किसी भी केस में पीछे नहीं हटा था चाहे वो केस कितनो भी प्राण घातक साबित क्यों न हो?

गाड़ी बीच रास्ते में ख़राब हुयी थी...ऊपर से कोहरा और मुसलसल बारिश ने रास्ते को और भी कठिनाई से भर दिया था....बड़ी ही मुश्किल से वो दोनों सुबह के निकले आखिर शाम को कॉटेज पहुंचे थे | अरुण को मालुम था की हादसा अँधेरा होते ही शुरू हो जाता है इसलिए डेड लेक आने से पहले वो पूरा तैयारी के साथ आया था...इधर दीप भी तैयार था और वो कई सामग्री अपने साथ ले आया था.....उसका तो विश्वास था की उसे इंसान का तो खतरा नहीं पर वहा उसकी जान यकीनन मुश्किल में पड़ सकती थी | उसे विश्वास था की की अरुण बक्शी वहा सिर्फ कॉटेज की साज़िश को मालूमात करने ही उसके साथ आया था |

इतने में दीप ने अपनी चुप्पी तोड़ी "उफ़ एक तो सर्द का मौसम और ऊपर से ये व्यवाण वीराना जंगल और सामने ये रहस्मयी कॉटेज ऐसा महसूस हो रहा है जैसे यहाँ कई राज़ दफ़न है मुझे तो कॉटेज में पाव रखने पर भी डर लग रहा है"................अरुण ने उसकी ओर मुस्कुराये देखा

"मैं तुम्हारे साथ हूँ दीप तुम्हें कुछ नहीं होगा हम यहाँ जिस गुत्थी को सुलझाने आये है वो सुलझाके ही यहाँ से वापिस जाएंगे"

"आमीन".........दीप ने अपने गले में झूलते उस ताबीज़ को हाथो में समेटे हुए कहा

"ये लोग कौन है ?"..........एक पल को अरुण ने भी दीप की बात सुन सामने की ओर देखा तो यकीनन सामने से तीन लोग कॉटेज से निकलते हुए उनकी तरफ आ रहे थे |

"ये तो इंसान लग रहे है जीते जागते इंसान पर यहाँ इस क्राइम सीन एरिया पर ये लोग?"........एका एक अरुण ने बड़बड़ाते हुए कहा

डायरेक्टर राम,साहिल,जावेद उनके सामने खड़े होक उन्हें अपलक हैरानी भरी निगाहो से देखने लगे.....अरुण बक्शी ने उन तीनो को बड़ी गौर से घुरा....डायरेक्टर राम ने भी दीप और अरुण बक्शी का जैसे आँखों से मुआना किया |

"हम्म आपकी तारीफ़? इस वक़्त आप दोनों यहाँ क्या कर रहे है?".......राम ने गंभीर होते हुए कहा

"मेरा नाम अरुण बक्शी है और ये मेरे साथ आये परनोमालिस्ट मोहद दीप लेकिन ये सवाल मेरा बनता है की आपको यहाँ आने की अनुमति किसने दी? क्या आप जानते नहीं की कई महीने पहले यहाँ पर एक क़तल हो चूका है जिसकी इन्वेस्टीगेशन अभी भी चल रही है".........अरुण ने भी राम की तरफ देखते हुए कहा....इस बीच दीप और राम के बगल में खड़े उसके क्रू मेंबर जावेद और साहिल भी चुपचाप थे |

"आई थिंक मिस्टर यू डॉन'ट नो अबाउट मी आई ऍम फिल्म डायरेक्टर राम किशोर....और यहाँ हम एक फिल्म की शूटिंग के लिए आये है ये मेरे क्रू members है cameraman जावेद एंड इस फिल्म के स्क्रिप्ट एंड स्क्रीन राइटर मिस्टर साहिल हमारे साथ बाकि के क्रू members भी है जो इस वक़्त कॉटेज में है हमने आपकी गाड़ी देखी तो हम्हें लगा की इस वक़्त यहाँ कौन आ सकता है? जबकि ये एक abadoned प्लेस है "

"आपको शूटिंग करने के लिए यही जगह मिली थी जबकि यहाँ आना पब्लिक के लिए साफ़ मनाही करा दी गयी है"

"मिस्टर आई हैव दी अथॉरिटी परमिट इफ यू वांट आई कैन शो यू बट मैंने तो सुना था की पुलिस ने इस केस पे अपनी तवज्जोह देनी न के बराबर कर दी है तभी तो हुम्हे परमिशन मिल सका"

"मिस्टर राम किशोर शायद आप मुझसे वाक़िफ़ नहीं मैं वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी का सबसे एहम सीनियर डिटेक्टिव अरुण बक्शी हूँ जब पुलिस किसी केस को सुलझाने में असमर्थ हो जाती है तब हम ही उस केस में पुलिस की रज़ामंदी के साथ इन्वेस्टीगेशन करना शुरू कर देते है वैसे आपको यहाँ नहीं आना चाहिए था"

"ओह आई सी, यानी की आप शहर के जाने माने सुप्रसिद्ध डिटेक्टिव फर्म ऑफ़ प्रकाश वर्मा से तालुक रखते है"

"यानी आप बहुत कुछ जानते है"

"हम्म्म आप भूल रहे है मैं भी सुप्रिसद्ध डायरेक्टर राम किशोर हूँ और यहाँ आने की वजह है मेरी अपकमिंग फिल्म की शूटिंग "हॉन्टेड" हम लोगो को इससे अच्छी प्लेस कही और नहीं मिल सकती वैसे जासूस के साथ परनोमालिस्ट ये कैसी वजह है?"............एका एक राम ने डीप की और नज़र फेरते हुए कहा

"जी मेरा नाम मोहद डीप है और मैं कई सालो से ऐसी ही सुपरनैचरल एलिमेंट्स पे रिसर्च कर रहा हूँ | और मेरी यहाँ आने की वजह भी कुछ ऐसी ही है जिनमें अरुण साहब ने भी हस्तश्वेप किया है"

साहिल ने इस बीच डायरेक्टर राम के कान में फुसफुसाया अरुण और दीप दोनों को देखने लगे...."अच्छा अच्छा तो वो शख्स आप है जिसने डेड लेक के ऊपर कई रेसर्चेस करते हुए उसकी हिस्ट्री और यहाँ हुए चीज़ों को पैरानॉर्मल एक्टिविटी ठहराया है वाक़ई अगर आपसे मुलाक़ात पहले होती तो मेरे राइटर साहिल को स्क्रिप्ट लिखने में और भी आसानी होती..."

"वैसे आप लोग कितने दिन के लिए यहाँ ठहरे हुए है?"...........अरुण ने सवाल किया

"जी २ दिन की शूटिंग है दरअसल हमारे काम करने का स्टाइल ही कुछ ऐसा है आज हमारा आधे से ज़्यादा शूट हो जाता लेकिन आप तो देख ही रहे है मौसम का मिजाज और सर्दी और कोहरा आउटडोर शूटिंग करना ही बेहद कठिन हो रहा है हमारे लिए".............डायरेक्टर राम अरुण और डीप से बात चीत करते हुए कॉटेज की तरफ रुख करता है......पीछे उसके क्रू मेंबर्स भी चल रहे होते है....

"वैसे आप यहाँ इन्वेस्टीगेशन करेंगे तो इससे हम्हें तो दिक्कत नहीं होगी न"

"वैसे तो यहा हमारे ठहरने का मन तो नहीं था लेकिन ऐसा लगताहै की वापिस आज शहर आ जाना हो न सकेगा यही रात काटनी पड़ेगी वैसे शूटिंग तो आज आप कर भी नहीं पाएंगे तो खलल कैसा? हाहाहा"..........अरुण ने मुस्कुराते हुए हसकर जवाब दिया....

कॉटेज में दाखिल होते ही....अरुण और दीप से राम ने अपने बाकी के क्रू मेंबरस हीरोइन रैना मेक उप आर्टीस्ट सुनील और अपनी असिस्टेंट डायरेक्टर सौम्या से परिचय करवाया....एका एक सबसे रूबरू होते हुए अरुण ने सौम्या की तरफ देखा.....सौम्या ने भी उसे एक पल को देखा दोनों की नज़रे मिली तो जैसे होंठो पे दोनों के ही मुस्कराहट छा गयी....डीप खामोशी से कॉटेज को बारीकी से चारो तरफ अपनी नज़र फेर रहा था.....उसने एक बार सस्पेंस भरे अंदाज़ में सामने सीढ़ियों की ओर देखा और एक पल को बस देखता ही रहा....

"गाइस ये है अरुण बक्शी और ये है इनके साथ आये परनोर्मलिस्ट मोहद डीप और ये भी आज हमारे साथ यही ठहरेंगे वैसे अरुण साहब अगर मैं आपका इंट्रोडक्शन इन सबको दू तो आपको कोई मुश्किल तो नहीं"......मुस्कुराते हुए इजाजत भरे लहज़े से डायरेक्टर राम ने अरुण से पूछा

"आपको देने की ज़रूरत नहीं मैं खुद ही इन्हे खुद से खुद से करवा देता हूँ | दरअसल मैं यहाँ इन्वेस्टीगेशन करने के लिए आया हूँ मेरा नाम अरुण बक्शी एंड आई ऍम द इन्वेस्टिगेटर अप्पोइंटेड फ्रॉम वर्मा डिटेक्टिव एजेंसी देखिये आप लोगो को किसी भी तरह की फ़िक्र करने की कोई बात नहीं आप सब आराम से रह सकते है हम अपना काम करेंगे और आप लोग अपना हम आपके शूट में किसी भी तरह की दखल अंदाज़ी नहीं देंगे आई होप की आप लोग भी हमारे साथ यूँ ही को-ऑपरेट करेंगे | "

इतना कुछ सुनकर हर कोई जैसे सकते में चुपचाप पड़ गया....किसी ने कोई ऐतराज़ तो नहीं जताया और न जताने का उनका कोई राइट बनता था क्यूंकि ये सरकारी मामला था हर कोई डेड लेक के उस घटना से रूबरू था और सब की नज़र अपने डायरेक्टर राम की ओर थी जो खुद चुपचाप बेफिक्र सा खड़ा था |

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कमरे का दरवाजा खोलते हुए सौम्या ने मुस्कुराये अरुण की तरफ देखा.....दीप अपने हैंडबैग को सोफे पे रख एक दृष्टि दोनों की ओर देखते हुए फिर पुरे कमरे को जैसे घुर्र रहा था | अरुण ने मुस्कुराये सौम्या का जैसे शुक्रियादा किया

"थैंक्स फॉर अररंजिंग डिस रूम फॉर अस"..........सौम्य मुस्कुराये शर्म से नज़रें झुका लेती है
"इटस माय pleasure यहाँ आपको रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी"...........अरुण भी मुस्कुराया
"ऑलराइट"...........सौम्या रूम से निकल ही रही थी की उसने मुड़कर अरुण की ओर देखा

अरुण उसके यूँ वापिस अपनी ओर होने से उसकी तरफ सवालातों से देखने लगा....."वो आप लोग कुछ खाएंगे भी हमारे पास खाने की चीज़ें मौजूद है दो दिन हुम्हे ठहरना है न तो इस वजह से"........अरुण अपनी ज़िन्दगी में कभी किसी से बात करते हुए इतना शरमाया नहीं था उसने पाया की सौम्य का भी वही हाल था |

"जी हम्हें फ़िलहाल तो ज़रूरत नहीं अगर हुयी तो आपको बता देंगे"
"वैसे अगर बुरा न माने तो एक बात पूछ सकती हूँ"
"हाँ पूछिए"
"क्या? आपको लगता है की सच में ही कोई क़ातिल यहाँ घूम रहा है? क्या इस कॉटेज को हत्याने की किसी की साजिश है जो ऐसी वारदात को अंजाम दे रहा है".........एक पल को अरुण ने सौम्या की ओर सोच भरी निगाहो से देखा

"हम्म हो सकता है कुछ भी हो सकता है फ़िलहाल जबतक हम ये पता न कर ले की ये वाक़ई किसी की साज़िश है हम कुछ कह नहीं सकते एनीवे आप!",,,,,,,,,,,अभी अरुण उससे कुछ और कह पाता...इतने में उस आवाज़ ने सौम्या को चौका दिया....उसका डायरेक्टर राम उसे आवाज़ दे रहा था |

"ज..जी मुझे जाना होगा सर बुला रहे है|"..........कहते हुए सौम्या रूम से बाहर निकल गयी

अरुण मुस्कुराये वापिस सोफे पे आके बैठ गया....उसने पाया की डीप आँखे मूंदें जैसे कुछ पड़ रहा था....."क्या हुआ?"............."कुछ नहीं बस दिल से ईश्वर को याद कर रहा हूँ की अब वोही हमारी हिफाज़त करे इस जगह से वैसे एक बात कहना चाहूंगा इस लड़की को देखके ऐसा क्यों लगा? की ये कुछ बताना चाह रही थी पर बता न पा सकी बीच में ही उस राम ने उसे आवाज़ देके बुलवा लिया वरना तुम उससे ज़रूर कुछ पूछकर जान सकते थे".............ये बात सुनके अरुण चुपचाप सर हाँ में हिलाता है.....
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asif biswas
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«Reply #13 on: February 15, 2019, 11:14:02 AM »
"वैसे एक बात और कहु? अरुण मैं तो इसलिए फ़िक्र में हूँ की क्या हम आज की रात भी यहाँ चैन और सुकून से गुज़ार पाएंगे क्यूंकि मुझे तो नहीं लगता की हम यहाँ से जा भी पाएंगे"

एक पल को अरुण दीप की ओर देखने लगा....लेकिन बात तो उसकी सच थी चाहा तो ठहरना नहीं था....लेकिन वक़्त और हालत ने जैसे उन सबको यु जैसे वहां उस रात के लिए फसा दिया था | अरुण ये भी जानता था की जो हादसे होते है वो रात के वक़्त ही होते है वो बस पूरी तरह से अँधेरा होने का इंतजार करने लगा था....बाहर बदलो में गरगराहट फिर शुरू हो चुकी थी..कुछ ही पल में तूफ़ान चलने लगा था | कॉटेज में अब नीम अँधेरा होने लगा था.....हर कमरों में मोमबत्तिया जल रही थी|

_________________________

"आपने मुझे बुलाया सर"...........राम उस वक़्त चेयर पे बैठा अपने कमरे में बाकी क्रू मेंबरस के साथ था रैना सुबह से ही उस वाक़ये के बाद डरी हुयी थी इसलिए वो अपने कमरे में सो रही थी |

"हाँ उन्हें उनका कमरा दिखा आयी तुम?".....राम ने सौम्या से पूछा
"यस सर"..........सौम्या कहकर चुप सी हो गयी
"ज़्यादा उन लोगो से बातचीत करने की ज़रूरत नहीं है तुम्हे हो सकता है की वो लोग हमसे भी पूछताछ करे और मैं नहीं चाहता की फालतू में हम ऐसी किन्ही मामलो में पड़े उनसे रैना के साथ हुए उस घटना का जरा सा भी ज़िकर करने की ज़रूरत नहीं अंडरस्टैंड ये हिदायत मैं सबको दे रहा हूँ"
"यस सर".................सौम्या ने जैसे राम का आदेश माना था | हर कोई भी राम के इस बात के साथ सहमत था|

________________

शाम ७ बज चूका था....डायरेक्टर राम अपने कमरे में एकांत में बैठा हुआ वैसे ही आज शूटिंग अधूरी रह गयी थी| और ऊपर से कॉटेज आये जो चीज़ें यहाँ अजीबो गरीब हुयी थी उससे वो वाक़ई परेशां था अब अब चिंता का सबब यहाँ उस डिटेक्टिव अरुण और उसके साथ परनोमालिस्ट की हाज़िरी ने दे दिया था जो की उसके काम में बाधा दाल सकते थे| वैसे ही जावेद को उसने उनपे नज़र रखने को बोल दिया था लेकिन फिर भी वो रात गुजरने की बात बोले थे यानी कल सुबह वो यहाँ से रुक्सत भी हो सकते थे | इन्ही कश्मकश में वो अँधेरे में मोमबत्ती की फड़फड़ाती लौ को देखते हुए सिगरेट का कश ले रहा था |

इतने में उसे ऐसा अहसास हुआ जैसे जब भी वो सिगरेट का कश लेता है तो उसके सुलगने से उस कुछ पल के लिए कोई साया ठीक अपने बगल से गायब होता दिखता है और फिर सिगरेट निचे करते ही फिर वो साया जैसे उसके बेहद करीब खड़ा हो जाता है| बार बार गौर करते हुए एक पल को राम मुड़कर अपने पीछे देखता है लेकिन मोमबत्ती की फीकी रौशनी में उसे कुछ साफ़ नहीं दिख रहा था| उसने अपने दिल को समझते हुए इसे वेहम माना और कुर्सी से उठ खड़ा हुआ|

अचानक दरवाजा अपने आप खुलने लगा....अँधेरा काफी था इसलिए उसने मोमबत्ती अपने हाथो में उठाये दरवाजे के चर्र चर्र करती तीखी आवाज़ में उसके खुलते ही थोड़ा तेज़ आवाज़ में कहा "कौन है?".......कोई जवाब न मिला लेकिन किसी के भीतर कदम रखने की आहट सी हुयी

जब उसने भीतर कदम रखते हुए खुद को राम के सामने प्रस्तुत किया तो राम मुस्कुरा पड़ा....ये कोई और नहीं उसकी हीरोइन रैना थी..."अरे रैना तुम कब जगी? अभी तबियत कैसी है? ठीक तो होना"..........रैना की मुस्कराहट उसे बेहद अजीब लगी

वो मुस्कुराते हुए उसके बेहद नज़दीक आयी और उसके गर्दनो पे दोनों हाथ रखके बोली

"हम्म्म मैंने काफी सोचा राम एंड आई ऍम सॉरी की मेरी वजह से तुम आज बोदर हुए"
"अरे कोई बात नहीं रैना असल में ये जगह है ही ऐसी की कोई भी इसे भूतिया घर ही कहेगा जो कुछ हुआ शायद इसमें किसी की शरारत हो अब इसे भूल जाओ ओके"...........रैना ने मुस्कुराया और हाँ में सर हिलाया

राम ने उसके बदन पे हाथ फेरते हुए बाकियो के बाबत पूछा की वो लोग कहाँ है?........रैना ने मुस्कुराके बस इतना कहा की अगर कोई आएगा भी तो बंद दरवाजे से घूमकर वापिस चला जायेगा......राम ये सुनते ही शैतानी मुस्कराहट दिए झट से कमरे का दरवाजा लगा देता है.....

__________________________

उस कमरे में एकांत में बैठा साहिल के हाथ पेपर्स पे चल रहे थे| वो अपनी कहानी को और भी बेहतरीन ढंग से बीच बीच में एडिट कर रहा था....उसके हाथ में फसी कलम तेजी से उस सफ़ेद कागज़ो पे चल रहे थे| हवाएं तेज थी हो हो करती ठंडी हवा खुली खिड़की से अंदर दाखिल हो रही थी|........परदे हवाओ से एकदम उड़ रहे थे| साहिल अपनी लेखनी में इतना मलिन था की उसे अहसास भी नहीं की वो सर्द से ठिठुर रहा था लेकिन वो इस क़दर लिखने में खोया हुआ सा था की चाहके भी वो उठके खिड़किया नहीं लगा सकता था | वो करीब सात सालो से इस पेशे में था उसकी लिखी कई हॉरर फिल्में राम के डायरेक्शन द्वारा थिएटर्स में हिट रही थी | इस बार वो अपनी कहानी को इस कॉटेज से जोड़ते हुए बेहद डरावना बनाने की कोशिश कर रहा था|

अचानक से बदल में जैसे विस्पोट हुआ ऐसी गरगराहट भरी आवाज़ उसके कानो में पड़ी तो उसका जिस्म सिहर उठा और उसी शरण उसे अहसास हुआ की उसकी कलम की स्याही पुरे स्क्रिप्ट पे उसके हाथो के एकदम से हड़बड़ाहट में हिलने से फ़ैल गयी थी....."उफ़ ये क्या हो गया एक तो यहाँ लैपटॉप काम नहीं कर रहा सुबह से कोशिश में हूँ लाइट का कोई इन्तेज़ामात नहीं यहाँ पे उफ़ अब ये पेपर भी ख़राब हो गया"........कहते हुए उसने एक नए कागज़ पे अपने स्टोरी को वापिस दोहराना चाहा लिखते हुए |

अचानक उसे अहसास हुआ की सामने की खिड़की से बाहर भीषण तूफ़ान और हवाओ से आपस में पेड जैसे टकरा रहे थे.....अचानक उसके देखते ही देखते हवा इतनी तेजी से कमरे में दाखिल हुयी की उसके मेज पे रखके सारे कागज़ अपने आप बिखरने लगे.....साहिल उठते हुए उन सब कागज़ो को झुक झुक कर थामने लगता है.....उसी बीच बिजलिया चमकने लगती है और बादल आपस में टकराते हुए जैसे माहौल को और भी डरवाना अपनी आवाज़ों से करती जा रही थी|

अचानक साहिल देखता है की कुछ कागज़ अपने आप हवा से उड़ते हुए खिड़कियों के पास उड़कर गिर जाते है....साहिल उन्हें उठाने के लिए खिड़की के पास आता है और झुककर जैसे ही कागज़ को उठाये खिड़की पे देखता है तो चीख उठता है........क्यूंकि सामने का नज़ारा ही कुछ ऐसा था उसके सामने ठीक उस बरगद की पेड पे झूलती वो सर कटी लाश जैसे हवाओ से इधर उधर हेल रही थी....साहिल ने गौर किया की उसने एक गाउन पेहेन रखा था और उसकी कटी उस धड़ से खून बह रहा था | ये दृश्य देखना उसके लिए जैसे संभव न हुआ वो उलटे पाव दौड़ते हुए जैसे दरवाजे से बहार निकलने को जा ही रहा था की अचानक वो रुका उसने देखा की सामने मेज पे राखी उसकी कलम उन कागज़ो पे अपने आप चल रही थी | वो घबराते हुए कांपते हुए ये दृश्य देखके उसके पास आया उसने देखा जैसे कलम कोई चला रहा हो| पर वह कोई भी मौजूद नहीं था उसे कोई कलम थामा हुआ भी न दिखा

वो कलम जोर जोर से उन कागज़ो पे चलती जा रही थी | कागज़ जैसे कलम की खिचाई से फटती जा रही थी एका एक सभी कागज़ो पे वो कलम बिना रुके अपनी स्याही लिखावट के तौर पे छूटती जा रही थी| अचानक अपने आप कलम अपने आप लुड़कते हुए फर्श पे गिर पड़ी साहिल भयभीत उस कलम के लुड़कते हुए अपने पास आने से उसे अपने पाँव से एक ओर फैक देता है| एका एक वो बिना पीछे मुड़के वह ठहरे कमरे से तेजी से दौड़ता हुआ बहार निकल जाता है|

पेड़ पे वो झूलती वो सर कटी लाश अपने आप जैसे गायब हो जाती है |

"अरे ये तो साहिल की चीखने की आवाज़ है".........एका एक लिविंग हॉल में बैठे जावेद और सुनील चौंककर उठ खड़े हुए...वो लोग फट से अपनी कुर्सियों से उठते हुए सीढ़ियों की तरफ बढे इतने में सौम्या को उन्होने अपने सामने सामने पाया

"अरे ये तो साहिल चीख रहा है आवाज़ तो ऊपर से आ रही है"
"क्या हुआ? ये शोर कैसा?"...........इतने में दीप और अरुण वहा उनके पास पहुंचते हुए कहते है
"पता नहीं सर साहिल की चीख सुनते ही हम फ़ौरन यहाँ पहुंचे"
"चलो ऊपर".........अरुण ने जैसे सबको आदेश देते हुए सीढ़ियों पे हड़बड़ी में चढ़ता हुआ बोलने लगा

तभी सीढ़ियों से नीचे आते हुए डर और दहशत में उन्हे साहिल दिखा....जिसे पसीना पसीना डरा सेहमा हुआ देख...अरुण ने ही उसे थामा..."क..क्या हुआ? तुम चीखें क्यों? तुम इतना डर क्यों रहे हो? क्या देख लिया तुमने?"...........साहिल बस कांपते हुए इशारे से ऊँगली ऊपर की तरफ करता हुआ जैसे कुछ कहना चाह रहा था|

"अरे बोलो तो सही आखिर बात क्या है?".....अरुण ने उसे झिंझोड़ते हुए ज़ोर देते हुए कहा
"व..वो व..वहा ऊपर मेरे कमरे में मैं स्क्रिप्ट तैयार कर रहा था....अचानक बाहर तूफ़ान इस क़दर बढ़ा की मैं बिखरे हुए कागज़ उठाने लगा....जैसे ही खिड़की के पास पंहुचा तो देखा की सामने उस पेड़ पे एक सर कटी लाश झूल रही थी| मैं ये सीन देखके बहुत डर गया जैसे कमरे से निकलना चाहा तो देखा की मेरी कलम अपने आप कागज़ो पे चल रही थी मैं यकीन नहीं कर पा रहा आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? जरूर इस घर में कोई रूह है मेरा तो जी घबरा रहा है"...........साहिल बहुत ज़्यादा डरा हुआ था|
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asif biswas
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«Reply #14 on: February 15, 2019, 11:14:42 AM »
उसकी बात सुनकर एक पल को अरुण ने दीप की तरफ देखा....दीप जैसे किसी गहरी सोच में डूबा माथे पे शिखर लिए खड़ा था....हर कोई खौफ्फ़ से जैसे अरुण और साहिल की और देखते हुए कुछ सोच रहे थे | "मैं ऊपर जा रहा हूँ"......कहते हुए अरुण सीढ़ियों से चढ़ते हुए ऊपर के माले पे चला गया....."अरुण रुको'........कहते हुए दीप आवाज़ दिए उसके पीछे सीढ़ियों पे चढ़ते हुए ऊपर चला गया.....

उस कमरे के दरवाजे को हलके से धकेलते हुए अरुण अंदर आया....दरवाजा आधा ही खुला था...वो धीरे धीरे कमरे की खामोशी को महसूस कर रहा था| उसने पाया की स्याही से ख़राब कुछ कागज़ वैसे ही मेज़ पे बिखरे हुए पड़े हुए थे| उसने खिड़की के पास जाके बाहर की और झाका बाहर गुप् अँधेरा था | हो हो करती हवाओ का शोर उसे सुनाई दे रहा था| उस घडी बारिश थम चुकी थी...लेकिन आसमान उसे बिगड़ते मौसम में कुछ अलग सा दिखा| उसने देखा की खिड़की से बाहर दूर दूर सिर्फ जंगल दिखता है| और कई दूर उसे एक टुटा लाल ब्रिज दिख रहा था| उसने अपने आस पास भी नज़र फिराई लेकिन वहा उसे कही सामने या किसी भी आस पास के पेड़ पे कोई कटी सर वाली लाश न दिखी जिसका ज़िकर साहिल ने बारे यकीनी तौर पे किया था|

अचानक उसे किसी की अपने बाज़ू में आहट सी हुयी तो उसने मुड़कर देखा की दीप उसके संग खड़ा बाहर झाँक रहा था....उस वक़्त सर्द हवाएं दोनों के चेहरों पे पड़ रही थी|

"इस खामोश वीराने भरी अँधेरी रात में मुझे घबराहट सी हो रही है| वो झूट नहीं कह रहा लाश वही सामने उस पेड़ पे लटक ज़रूर रही थी जो अब हमारी नज़रो से बोझल हो चुकी".........दीप की अजीब सी बात सुनके अरुण वापिस मेज की तरफ रुख करता है वो कागज़ो को पलटते हुए देखता है और तभी उसके चेहरे का रंग बदलने लगता है....

"ये क्या?"........अरुण की बात सुन दीप उसके हाथ में उठी उस कागज़ को निहारता है
एका एक उसकी भी आँखों में जैसे खौफ्फ़ समा उठता है....वो तुरंत अरुण के हाथ से उस कागज़ को अपने हाथो में लेकर देखने लगता है....."हे खुदा ये तो संकेत है किसी अनहोनी के होने का"......एका एक उसकी बात सुन अरुण भी अजीब नज़रो से उस कागज़ को देखने लगता है...

उस कागज़ पर जो कलम साहिल ने चलती हुयी देखि थी दरअसल वैसे ही कुछ कागज़ो पे वैसे ही स्याही से इस कदर घसीटते हुए कुछ ऐसा कलम ने लव्ज़ छोड़ा था जिसे कोई भी देखता तो खौफ्फ़ से सिहम उठता....ूँ कागज़ो पे बिलकुल एक ही जैसा शब्द लिखा हुआ था| और वो था "DIE "

अरुण ने देखा की पीछे खड़े हर कोई मौजूद थे क्रू मेंबर्स के....जिनमें जावेद सुनील साहिल और सौम्य भी थे....आवाज़ सुनके तबतलक रैना के साथ डायरेक्टर राम भी कमरे में उपस्थित हो चूका था| वो वैसे ही परेशानी में दिख रहा था क्यूंकि डिटेक्टिव अरुण बक्शी के हाथ में जो कागज़ था उसने उसे साफ़ तौर पे देख लिया था| रैना भी खौफ्फ़ से सिहर उठी थी|

"मैं जान सकता हूँ की यहाँ हो क्या रहा है?".........राम ने कहा
"दरअसल आपके राइटर साहिल ने जो कुछ ब्यान किया उसके बाद आप सबकुछ साहिल से ही सुने तो बेहतर होगा"........साहिल ने कांपते हुए राम को जब सबकुच बताया तो वो उसपे जैसे बरस पड़ा

"क्या हुआ है? गाइस तुम सब को कभी रैना तो कभी तुम तो कभी सौम्य को दिखता कोई अक्स ये सब फ़िज़ूल है ओके"

"आपके क्रू मेमेबर्स झूट नहीं कह रहे है दरअसल यहाँ आने से पहले से ही मुझे यकीन था की इस वीराने बंद पड़े कॉटेज का कोई और ही राज़ है और ये बात मुझसे बेहतर दीप आपको बता सकते है"........राम ने सिर्फ अपने सर पे हाथ रखकर सिर्फ न में अपने सर को हिलाते हुए जैसे अरुण की बात को अनसुना सा कर दिया

"देखिये मिस्टर हम यहाँ शूटिंग के लिए आये है जिसके लिए हम्हें परमिशन भी है ये फालतू की बातो पे आपको यकीन हो सकता है पर मुझे नहीं आई डॉन'ट बिलीव इन डिस काइंड ऑफ़ सुपरस्टीशन और तुम साहिल इतने बड़े राइटर होकर तुम ऐसी फालतू बात कैसे कर सकते हो? कहाँ है वो सर कटी लाश बोलो"

"अगर मैं झूठ कह रहा हूँ तो फिर ये इनके हाथो में ये जो कोरे कागज़ो पर स्याही से घसीटती हुयी लव्ज़ लिखी है क्या वो मैंने लिखी है मैंने अपनी इन्ही आँखों से कलम को अपने उन कागज़ो पे चलते हुए देखा है| सामने उस पेड़ पे एक औरत की सर कटी लाश देखी है फिक्शन और रियलिटी में फर्क जानता हूँ मैं"

"ओह शट अप"..........खिजलाये स्वर में राम ने साहिल को जैसे खामोश कर दिया.....वह खड़ा हर कोई चुपचाप था और सोच में डूबा हुआ सा था|

"देखिये मिस्टर राम अपने क्रू मेंबर को चुप करा लेने से आप सचाई को झुटला नहीं सकते.....अगर लाश थी तो वो गायब कैसे हो सकती है इतने जल्दी तो कोई उस पेड़ से लाश को हटा तो नहीं सकता न?"........अरुण ने इस बार जैसे विश्वास करते हुए कहा...जिसे सुन राम उसकी तरफ देखने लगा

"तो आप के कहने के मुताबिक़.....यहाँ इस डेड लेक में कोई आत्मा है कोई रूह वास करती है जो हम्हें परेशान कर रही है वो हमारी मौत चाहती है इसन'ट व्हिच यू वांट टू से?".........अरुण ने कोई जवाब नहीं दिया

"अरुण सही कह रहे है| और कहने का कुछ यही मतलब बनता है मैंने डेड लेक पे करीब कई महीनो से रेसर्चेस करते हुए ये पाया है की ये सच है की ये जगह वाक़ई हॉन्टेड है लेकिन सिर्फ एक रूह नहीं यहाँ बहुत सी ऐसी तमाम रूह है जो सिर्फ किसी किसी की मौत का इंतजार करती है मैं यहाँ वैसे ही आके इस राज़ को जानना चाहता था| और इसमें मेरी मदद अरुण भी कर रहे है| आप लोग शायद मेरी बातो पे यकीन न करे पर यही सच्चाई है क्यूंकि मैंने खुद उस मुसाफिर की आत्मा से रूबरू हुआ हूँ और उसने मुझपे जानलेवा हमला भी किया था".............दीप की बात सुनकर एका एक सबकी नज़र उसकी और जैसे अपलक थी...किसी को विश्वास न हुआ लेकिन समझते ही सबके चेहरों का रंग बदल सा गया

"देखिये मोहद डीप आपकी बातो पे ये लोग विश्वास कर सकते है| मैं नहीं आपका पेशा आपको इसकी इज़ाज़त देता है लेकिन मुझे भूत प्रेत सिवाय फिल्मो में ही अच्छे लगते है इन रियलिटी देयर इस नो क्लूो ऑफ़ अन्य काइंड ऑफ़ सच थिंग"............दीप का जैसे इस बार राम पर बहुत तेज गुस्सा आया|

"जब मौत से रूबरू होंगे डैन यू नॉट इवन फाइंड अ क्लू ".......दीप के बात से राम तिलमिला उठा...लेकिन उसकी हिम्मत न हुयी की वो और कुछ कह पाता

"आई ऍम गोइंग तो स्लीप आई वांट एवरीवन की कल सुबह ६ बजे ही सब हाज़िरी दे हम कल अपनी शूटिंग कंटिन्यू करेंगे दैट'स आल"........बिना कुछ कहे अरुण और दीप को घुररते हुए राम वहां से निकल गया..

क्रू के हर मेंबर भी वहा से जाने लगे....सिवाय साहिल और सौम्य के...जिन्हें शायद अरुण और दीप पे यकीन था...साहिल भी थोड़े देर बाद वह से अपने कमरे में चला गया...."अरुण उसे तो यकीन नहीं होगा लेकिन अगर वक़्त रहते हमने सबको सचेत न किया तो शायद कोई अनहोनी सच में घट सकती है ये कागज़ो पे लिखे स्याही से इसका एक ही मतलब होता है वो चीज़ इस पुरे कॉटेज में वास करती है"..........दीप की बात सुनकर अरुण ने उसकी तरफ खामोसी से देखा फिर उस कागज़ को फाड़ते हुए एक ओर फैक दिया|

"मुझे यकीन है आप लोगो की बातो पे मैं झूठ नहीं कहूँगी मैंने वो साया आज दोपहर के वक़्त देखा था| और यही नहीं आज रैना के साथ भी कुछ अजीब सी चीज़ घटी थी जिसे बताने से राम ने हुम्हे सकत हिदायत की थी".........सौमया में सारी सच्चाई दीप और अरुण को बतानी शुरू की जो कुछ आज दिन में उनके साथ घटा था |

"इसका मतलब साफ़ है यहाँ पे वो चीज़ें मौजूद है".............दीप को सेहेमा हुआ देख सौमया और अरुण उसे अजीब निगाहो से देखने लगे जैसे उन्हे ये सुनके यकीन सा हो रहा था|

"देखो सौमया तुम अपना ख्याल रखना कोई भी दिक्कत हो तुम हमसे कहना अभी तुम जाओ वरना डायरेक्टर राम को हमपे शक हो जायेगा"...........अरुण ने जैसे सौमया को समझाया

"ठीक है"........सवालो में डूबी सौमया उस कमरे से चली गयी....

दीप धीरे धीरे उस पुरे कमरे को देखने लगा....अरुण ने भी छानबीन शुरू कर दी थी....उसे मालुम था की इस कॉटेज में कोई तो सुराग उसे हासिल होगा.....दराज़ पुराने वॉरड्रोबेस कमरे की हर जगह से लेके वो सबके सो जाने के बाद लिविंग रूम को भी छान रहे थे| दीप ने उस तस्वीर की ओर देखा और अपने हाथो से उसपे लगी मिटटी को पोछते हुए उस तस्वीर को उतारकर गौर किया |
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