रूहानी ज़हर - (Sci-fi horror story)

by ASIF on November 01, 2026, 12:13:46 AM
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Shayari Qadrdaan
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Hello friends haazir hoo aur aap sabka sawagat karta hoo is saal ke teesre phere mein, apni story aur Meri yeh pehli likhi Sci-fi horror kahani "Roohani Zeher" ke thread pe, is saal na hi sirf maine spy thriller "SHOOTER" likhi jispe maine baaki kahani se zyada mehnat ki balki isi saal ek short apni pehli sci-fi thriller story "INTEZAAR" bhi likhi, sci-fi mujh jaise lekhak ke liye pehla concept tha, jo ki hamesha se mujhe challenging aur difficult genre lagta tha, lekin sirf typical horror ya thriller stories likhna mera hunar nahi, main ek versatile writer hoo aur ye toheen hoti ki maine sci-fi jaise purane western par adhunik, concept par kaam na ke barabar kiya, ye kahani saal 2027 ko aane wali thi, aur meri agli dusri sci fi story banne ja rahi thi "INTEZAAR" ke baad, maine socha sci-fi pe sirf mehez thriller kyu likhna?, Jabki horror hi meri pehli pasand aur purana jisme mera tajurba raha hai, par sci-fi horror ka concept bhi aaj ke daur mein thoda alag hona chahiye tha, humne vilayat ki kayi filmo mein aise concepts dekhe hai, par zombie ya koi adrishya taqat, ya brahmaand jeev, aliens ya koi experimental horror jaise Frankenstein ya Dr Jekyll and Hyde wala ghisa peeta concept likhna wohi purana lagta, jiski filme humne dhairo dekhi hai,

Maine horror pe koi genre nahi chodha, lekin aaj ka zamana typical horror aur thriller stories se aage badh chuka hai, ab toh yoindia pe readers ghat chuke hai naam barabar replies milte hai, ye wohi platform tha jaha maine aisi kahaniya likhi aur na umeed hote huye bhi mujhe apni horror aur thriller kahaniyo ke liye sahara gaya, toh dosto ye kahani meri pehli sci-fi horror hone ja rahi hai, aur dusri baar isliye kyunki Maine thriller genre mein is sci-fi concept ko "INTEZAAR - in search of truth" ke sath isi saal aapke saamne pesh kiya, is sci fi horror story ko jise maine mehez 3 din mein puri kiya aur chautha din mujhe ise final draft karne mein laga, amuman main ek ek din karke kahani adhura nahin likhta, chahe jitna waqt mein uljha hoo main aadhe aadhe din tak baithkar ek kahani ke kayi aadhe se zyada hisse kayi chapters, tabtak roz likhta hoo jabtak wo muqammal na ho jaye, main besavro mein se hoo, chahe mujhe yoindia ke bahar naam na mile, par aap logo ka pyar aur is mehnat aur meri kabiliyat ko jo is yoindia platform ke madhyam se pathako ne samjha hai wohi mere liye bahut hai

Toh dosto chalte hai kahani ki taraf, yun toh "INTEZAAR - In search of truth" meri dusri aur aakhri kahani is saal ki hoti, par maine mann badla aur ye kahani sci-fi horror story saal ke aakhir mein likh daali taaki saal ke khatam hone se pehle aur meri 2027 mein aane wali badi kahani "Black shadow - insaf ki devi" aane se pehle main sci-fi horror mein apni kalam azmana chahta tha, kuch saal se lagbhag crime thrill universe ke mukammal se lekar uske ant "Inteqam" ke bawjud maine thrills bahut zyada likh diye itna ki pehle ki tarah saal mein main ek dafa teen horror stories ek waqt mein likha tha usse bhi zyada maine smp novels ke rasiya hone ke chalte kayi thriller zone mein kahaniya is era mein likh daali par ab dosto besavri se intejar rahega apni is pehli likhi science fiction horror story aur sci-fi genre ke dusre kahani ke liye, aapke amuman raay aur feedbacks ke intejar mein hamesha, chahe ache ho ya bure, shukriya

Disclaimer :- यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। कहानी में दिखाए गए कुछ वैज्ञानिक प्रयोग, वायरस म्यूटेशन और कत्ल के दृश्य बेहद हिंसक, डरावने और परेशान करने वाले  हो सकते हैं।, कहानी में उपयोग किए गए सभी नाम, स्थान, चरित्र और घटनाएँ लेखक की कल्पना की उपज हैं। इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वास्तविक स्थान या घटना से कोई संबंध नहीं है। यदि ऐसा होता है, तो इसे मात्र एक संयोग माना जाएगा। कहानी का उद्देश्य केवल रहस्य, रोमांच और मनोरंजन पैदा करना है। यह किसी भी प्रकार के हिंसक या अवैध कृत्यों का समर्थन नहीं करती है। पाठक अपने विवेक से काम लें। यह कहानी १८ वर्ष से कम उम्र के पाठकों के लिए कत्तई उपयुक्त नहीं है। केवल वयस्कों के लिए है। यह कहानी लेखक (आसिफ बिस्वास) की अपनी मूल और मौलिक रचना है। इस कहानी के सभी अधिकार पूरी तरह से लेखक के पास सुरक्षित हैं। लेखक की लिखित अनुमति के बिना इस कहानी, इसके किसी भी भाग या चैप्टर को किसी भी अन्य वेबसाइट, ब्लॉग, सोशल मीडिया या फोरम पर कॉपी करना, री-पोस्ट करना या किसी भी रूप में प्रकाशित करना पूरी तरह से वर्जित है। इस कहानी या इसके किसी भी विषय/भाग से संबंधित किसी भी पूछताछ या अनुमति के लिए, कृपया लेखक के Yoindia हैंडल पर संपर्क करें!
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«Reply #1 on: November 01, 2026, 12:17:37 AM »
Chapter 1


जनवरी 1970,

वह घनी इंसानी आबादी से दूर वीरान पहाड़ी इलाका था, रूस के सुदूर साइबेरियाई इलाके की वो सुबह आम सुबह जैसी नहीं थी। चारों तरफ कोहरे की एक घनी और ठंडी चादर लिपटी हुई थी। सूरज अभी क्षितिज से बाहर नहीं निकला था, लेकिन वातावरण में एक अजीब सी वीरानियत और रीढ़ में कंपन पैदा कर देने वाली तेज़ बर्फीली हवाएं चल रही थीं।

तभी उस सन्नाटे को चीरती हुई एक कान फोड़ देने वाली गड़गड़ाहट गूंजी। कोहरे को चीरते हुए एक मिलिट्री हेलीकॉप्टर ज़मीन पर उतरा। पंखों की तेज़ हवा ने सूखी बर्फ को हवा में उड़ा दिया। हेलीकॉप्टर के रुकते ही उसमें से पांच-छह लोग बाहर निकले—ये सोवियत संघ के चुनिंदा रिसर्च साइंटिस्ट और डॉक्टर्स की एक स्पेशल टीम थी। उसमें से 5 लोगों की टीम बाहर निकली—दो सीनियर साइंटिस्ट, दो रिसर्च लैब के डॉक्टर्स और उनका एक यंग इंडियन असिस्टेंट डॉक्टर। सभी पूरी तरह से बायो-सूट और शीशे वाले मास्क में ढके हुए थे। इस मिशन को बेहद गोपनीय रखा गया था, इसलिए आर्ियोलॉजिस्ट्स और लोकल माइनिंग वर्कर्स को पहले ही वहाँ से हटा दिया गया था। इस टीम में एक भारतीय डॉक्टर भी शामिल था, जिसे उसकी बेजोड़ सूझबूझ के लिए इस मिशन का हिस्सा बनाया गया था।

उन्होंने चारों तरफ पैनी नजरों से इलाके का निरीक्षण किया, बायो सूट पहनने के बावजूद उन्हें बाहर की तेज हो-हो करती सर्द हवाओं का शोर और लगभग बर्फीली हवा उड़ती साफ उन वीरान पथरीले इलाकों में दिख और सुनाई दे रही थी। वे सभी फौरन एक गहरी माइनिंग साइट (खदान के खड्डे) की तरफ बढ़े। कुछ दिनों पहले, यहाँ काम कर रहे पुरातत्वविदों (Archaeologists) और माइनिंग वर्कर्स ने खुदाई के दौरान ज़मीन के नीचे कुछ बेहद संदिग्ध और असामान्य देखा था, खदान के अंदर एक बहुत गहरी गुफा जैसा गड्ढा था। आर्केयोलॉजिस्ट्स को माइनिंग के दौरान पत्थरों पर कुछ अजीब चीज़ दिखी थी, जिसके बाद रेडिएशन या किसी ख़तरनाक वायरस के डर से काम तुरंत  'खड़े हाथ' रोक दिया गया था। और इस गुप्त टीम को बुलाया गया।

बाहर का तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे था, लेकिन जैसे ही टीम के एक डॉक्टर ने खदान के अंदर डिजिटल मीटर से तापमान मापा, सब हैरान रह गए। "तापमान बिल्कुल नॉर्मल है"....एक डॉक्टर की आवाज़ में अचरज था। इतनी भीषण सर्दी में ज़मीन के इतने नीचे तापमान का सामान्य होना विज्ञान के नियमों के खिलाफ था।

सावधानी से कदम बढ़ाते हुए वे उस गुफा के ठीक बीचों-बीच पहुँचे। वहाँ दीवार पर एक अजीब सी खुदी हुई जगह थी, जहाँ से एक चमकीला, हरा तरल पदार्थ रिस रहा था। टीम ने सबसे पहले सुरक्षा के लिहाज से उस पर एक न्यूट्रलाइजिंग स्प्रे मारा। लेकिन उस लिक्विड पर कोई रिएक्शन नहीं हुआ। जब स्प्रे बेअसर रहा, तो डॉक्टरों ने आगे बढ़कर उसका बारीकी से विश्लेषण किया।

विश्लेषण के नतीजे चौंकाने वाले थे। सीनियर साइंटिस्ट ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "यह एक वायरस है!"
तभी टीम के एक डॉक्टर ने बात को हल्का करने की कोशिश की, "इसमें डरने की क्या बात है? ऐसे सैकड़ों-लाखों वायरस दुनिया के हर कोने में दबे पड़े हैं।"
लेकिन वहाँ खड़े भारतीय डॉक्टर की आँखें कुछ और देख रही थीं। उसने गंभीर आवाज़ में कहा, "हो सकता है कि यह कोई आम वायरस न हो... यह एक ज़ोंबी वायरस की तरह काम कर रहा हो।"

एक दूसरे वैज्ञानिक ने फौरन अपने रेडिएशन डिटेक्टर को देखा और कहा, "नहीं, इससे कोई रेडिएशन नहीं फैल रहा है। लेकिन जो भी है, इसे तुरंत काबू में किया जाए, बेहद एहतियात के साथ।"

सभी ने भारी प्रोटेक्टिव सूट और सुरक्षा हेलमेट पहन रखे थे। उन्होंने सावधानी से उस हरे तरल को टेस्ट ट्यूब में भरना शुरू किया। यह ज़िम्मेदारी भारतीय डॉक्टर की थी। लेकिन टेस्ट ट्यूब्स को सील करते वक्त, भारतीय डॉक्टर के मन में न जाने क्या आशंका या योजना आई—उसने बाकी सबकी नज़रों से बचाकर चालाकी से एक छोटा सैंपल अपनी जेब में छुपा लिया।

सोवियत संघ की वो एक बेहद सुरक्षित और गुप्त अंडरग्राउंड लैबोरेट्री था। चारों तरफ कांच के बड़े-बड़े जार, मशीनें और वैज्ञानिक परीक्षण चल रहे थे। वहां हर किस्म के वैज्ञानिक आधुनिक उपकरण से लेकर सफेद कोट पहने आला दर्जे के साइंटिस्ट और डॉक्टर्स मौजूद थे। तभी लैब में मौजूद एक महिला डॉक्टर हैरान होकर चिल्लाई, "सर! ज़रा यहाँ देखिए!"

जब सीनियर साइंटिस्ट ने माइक्रोस्कोप में देखा, तो उसके होश उड़ गए। उसने कांपती आवाज़ में कहा, "माई गॉड... यह तो जीवांतु Living Micro-organism है! इतने करोड़ों सालों से ये वायरस इन अंधेरी गुफाओं के अंदर ज़िंदा है?" उस वायरस के भीतर अजीब से जीवित लक्षण (Biologically active traits) पाए जा रहे थे, जो विज्ञान की समझ से परे थे।

वैज्ञानिकों ने किसी ज़िंदा जानवर पर सीधे प्रयोग करने की बजाय, पहले एक मरे हुए सेल (Dead Cell) पर उस वायरस की एक बूंद डाली। पलक झपकते ही, वो मृत कोशिकाएं अचानक पुनर्जीवित (Rejuvenate) हो गईं। लैब में मौजूद सभी लोगों के लिए यह किसी दैवीय चमत्कार जैसा था।

उत्साहित होकर उन्होंने इस प्रयोग को आगे बढ़ाया। उन्होंने एक मृत चूहे पर उस वायरस को डाला। लेकिन चूहे का शरीर बहुत ज़्यादा डीकंपोज़ (सड़) चुका था, इसलिए उसमें कोई जान नहीं आई। यह देखकर भारतीय डॉक्टर ने सुझाव दिया, "हमें किसी ताज़ा शव पर इसका परीक्षण करना चाहिए।"

लैब में मौजूद एक हाल ही में मरे चूहे के शरीर पर जब यह वायरस इंजेक्ट किया गया, तो जो हुआ उसने सबको सुन्न कर दिया। वह लाश धीरे-धीरे हिलने लगी! उसके दिल और दिमाग के जो हिस्से पूरी तरह बंद हो चुके थे, जो पूरी तरह 'ब्रेन डेड' घोषित था, वह दोबारा एक्टिव हो रहा था। यह वायरस रेंगते हुए इंसानी सेल्स के अंदर जा रहा था और मरे हुए अंगों को दोबारा ज़िंदा कर रहा था।

लेकिन यह चमत्कार कुछ ही पलों में एक खौफनाक दुःस्वप्न में बदल गया।

वह पुनर्जीवित हुआ ज़रूर लेकिन देखते ही देखते वो चूहा  अचानक अत्यंत हिंसक हो गया। उसकी आँखों का रंग बदल गया और उसके पूरे शरीर पर नीली-काली नसें भयानक तरीके से उभर आईं। उसमें एक ऐसी राक्षसी ताकत आ चुकी थी कि उसने लैब के उस बेहद मजबूत और मोटे शीशे Reinforced Glass पर ज़ोरदार वार करना शुरू कर दिया। शीशे पर पड़ते स्क्रैच और दरारें देखकर डॉक्टरों के चेहरों का रंग उड़ गया। वे खौफ से कांपने लगे।

सीनियर साइंटिस्ट ने फौरन चैंबर के अंदर एक जहरीला Poisonous Gas छोड़ने का आदेश दिया। लेकिन उस भयानक जीव पर उस गैस का कोई असर नहीं हुआ। वह हर हाल में कांच तोड़कर बाहर निकलने पर आमादा था। मौत सबके सामने खड़ी थी।

तभी भारतीय डॉक्टर ने फुर्ती दिखाई। वह आगे बढ़ा और उसने लैब के दराज़ से तलाशते हुए एक बेहद शक्तिशाली एसिड केमिकल सब्सटेंस उस जीव के ऊपर डाल दिया। एसिड गिरते ही वह हिंसक शरीर चीखते हुए पिघलने लगा और देखते ही देखते उसकी पूरी बॉडी पूरी तरह गल कर नष्ट हो गई। उसने बदस्तूर शीशे का ऊपरी मुआयना बंद कर दिया, शीशे के अंदर मांस की सड़न और बदबू उठने लगी तत्काल वहां सबने सर्जिकल मास्क को अपने चेहरे पे लगा लिया था ताकि किसी किस्म का कोई दूसरा खतरा ना पैदा हो,

लैब में सन्नाटा पसर गया था। सभी वैज्ञानिक बुरी तरह डरे और हांफ रहे थे। कुछ घंटे बाद बीते जब सबकुछ नॉर्मल लगने लगा तो स्थिति को भांपते हुए सीनियर हेड डॉक्टर ने गंभीर और ऊंचे स्वर में ऐलान किया, "सरकार को इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं होना चाहिए! यह पूरी तरह कॉन्फिडेंशियल Top Secret है। इस वायरस का एक्सपेरिमेंट यहीं और इसी वक्त रोक दिया जाए।"...
भारतीय डॉक्टर चुपचाप खड़ा सब सुन रहा था, वह चाहकर भी कुछ कह नहीं पाया। लेकिन वो खौफ खाया हुआ था कि लैब का हर कर्मचारी इस बात से बेखबर था कि उसके जेब में अब भी वो सैंपल जिंदा मौजूद था, वो चाहता था कि वो उनकी नजरों से बचाए उस सैंपल वायरस को उसे किसी भी तरह पहले उनकी पहुंच से कहीं दूर ले जाना था

सीनियर डॉक्टर ने आगे आदेश दिया, "इस वायरस के जितने भी सैंपल्स लैब में हैं, उन्हें तुरंत नष्ट किया जाए। और जहाँ यह पाया गया था, साइबेरिया की उस माइनिंग साइट को तुरंत बंद कर दिया जाए और वहाँ आगे कोई खुदाई न हो। वहां मौजूद उन बचे हुए सभी वायरस को इसी केमिकल सब्सटेंस से हमेशा के लिए डीकंपोज़ कर देना ही बेहतर फैसला रहेगा।"...​लेकिन उन वैज्ञानिकों को यह अंदाज़ा भी नहीं था कि उस ज़हर की एक टेस्ट ट्यूब पहले ही लैब से ग़ायब हो चुकी थी,

अधिकारियों के आदेश पर उस खदान को सील करने से पहले उन खुदाई में मिले बचे अवशेषों और मौजूदा वायरस को ऑर्डर के तहत उसी तेज़ाब केमिकल सब्सटेंस से नष्ट कर दिया गया, लैब के सैंपल्स भी नष्ट कर दिए गए और इसके साथ यह खौफनाक कहानी वक़्त की परतों में कहीं दफन होकर आई-गई बात हो गई।

छप्पन साल बाद

साल २०२६ की एक ठंडी, स्याह रात। बंगाल के एक गुमनाम शहर का 'नरीम पॉइंट' इलाका। बाहर सड़कों पर मौत जैसा सन्नाटा पसरा था, लेकिन वहाँ स्थित एक आलीशान नाइट क्लब के भीतर जैसे आबादी जश्न और अय्याशी में डूबी थी। तेज़ म्यूज़िक और थिरकते कदमों के बीच, बार काउंटर के पास एक कोने में बने सोफे पर बैठा एक अधेड़ उम्र का शख्स शराब की चुस्कियां ले रहा था।
यह दीपक था। महंगे सूट-बूट और रसूखदार चेहरे वाला यह आदमी कभी देश के एक बेहद प्रतिष्ठित रिसर्च लैब का सीनियर डॉक्टर और मुख्य ट्रस्टी हुआ करता था। लेकिन औरतों के प्रति उसकी बदतमीज़ी, अश्लील हरकतों और महिला कर्मचारियों में उसके खौफ की वजह से, कुछ साल पहले फीमेल स्टाफ यूनियन ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। डॉक्टरों ने उसके साथ काम करने से मना कर दिया, जिसके बाद बदनामी से बचने के लिए अधिकारियों ने उसे सीधे निकालने के बजाय ट्रांसफर की बात कही। पर दीपक का अहंकार इतना बड़ा था कि उसने डॉक्टर के पेशे से ही किनारा कर लिया और कुछ समय बाद ट्रस्टी के पद से भी इस्तीफा दे दिया।

पैसे की उसे कोई कमी नहीं थी। शादी उसने की नहीं थी। उसका मानना था कि शादी करके जो एक सुहागरात मिलती है, वैसी कई सुहागरातें वह महज़ पैसे के दम पर रोज़ मना सकता है, वो भी अलग-अलग औरतों से बिना उन्हें बीवी का दर्जा दिए। औरतें उसके लिए सिर्फ एक खिलौना थीं। लेकिन उसकी इस सोच के पीछे एक गहरा जख्म था। सालों पहले उसकी एक बेहद खूबसूरत बीवी होया करती थी, जिससे वह बेपनाह प्यार करता था। शादी आपसी रजामंदी बतौर प्रेम विवाह थी, उसे इस बात का रत्तीभर इल्म नहीं था कि उसकी बीवी जितनी सती सावित्री और मोहब्बत का ढोंग उसके पैसों और रुतबे के लिए उससे करती थी, वहीं दूसरी तरफ उसकी ज़रूरत से ज़्यादा ग़ैर-मौजूदगी और अपने बिगड़े क्लबहाउस जाने की आदतों के चलते उसने अपना एक पुराना यार पाला हुआ था, वह घर में सिर्फ और सिर्फ उसी की बनकर रहती थी पर उसके चले जाते ही वो अपने यार के यहाँ तो कभी यार को अपने घर बुलाकर उसके साथ कई-कई घंटे अपने ही पति के बिस्तर पर गुलछर्रे उड़ाया करती थी, नौकर-चाकर नाम मात्र थे जो दोपहर बाद ही वो चलता कर देती थी इतना कि गार्ड का पहरा भी उसे खौफ नहीं था क्योंकि गार्ड को अपने मालिक से मोटी रकम मिलती थी और उससे ज्यादा बख्शिश उसे उसकी बीवी और उसके आते-जाते उनके काबिल दोस्त उर्फ यार से जो उसकी नज़र में बड़े शरीफ और अक्सर उनकी मालकिन से गए वक्त बिना झिझके मिलने चले आते थे, लेकिन एक रात जब वह अपने काम से फारिग होकर वक्त से पहले घर लौटा तो उसने घर में पांव रखते ही लिविंग हॉल कि सीढ़ियां तय करके ऊपर अपने कमरों से सिसकियों और आहों की आवाज सुनी ये आवाज दो जनों की थी, वो सावधानी से दरवाजे तक पहुंचा जो कि उस वक्त भिड़ा हुआ था , तब उसने पाया उसकी गैर-मौजूदगी में उसकी बीवी किसी गैर मर्द के साथ हमबिस्तर में डूबी नग्न हालत में बिस्तर पर थी। दीपक ने उन्हें देख लिया था। उसका खून खौल उठा था, पर उसने कोई तमाशा नहीं किया। वह चुपचाप भारी मन से लैब लौट आया। उसने उसे तलाक़ नहीं दिया, अगले दिन अपने घर पहुँचा और उससे ऐसे व्यवहार किया कि जैसे वो कुछ जानता ही नहीं था, हालाँकि उसकी बीवी को कोई हैरानी नहीं थी बल्कि उसने साफ़ उसके चेहरे पे परम संतुष्टि के भाव देखे जो शायद कल रात उसे मिले थे, वो मन्न ही मन्न उससे घिन्ना करने लगा, लेकिन उसकी बीवी उससे ऐसे बगलगीर होकर मिली जैसे वो उसके इंतज़ार में सारी रात बस उसके लिए बैठी थी, अब ये बर्ताव भी दीपक को दिखावा लगने लगा, पर वो शांत रहा उसने चाल चलना शुरू किया बल्कि चालाकी से उसकी दवाइयों और खाने में ऐसा स्लो-पॉइज़न मिलाया कि वह धीरे-धीरे बीमार होने लगी और आखिर बिस्तर के हवाले जब उसने उस तूफानी रात को उसके सिरहाने में बैठकर एक आखिरी बार उसे जी भरकर देखा और उसके मंसूबों की नाकामी पे मन ही मन ठहाका लगाया वो पहले से ही दवाई और बीमारी से कमज़ोर बेसुध बेहोश सोयी पड़ी थी, उसने फुर्ती से उसके कलाई में वो दवाई इंजेक्ट कर दी, वो दवाई उसकी चल रही दवाई से मिलते ही जैसे उसके शरीर पर रिएक्शन कर गयी, और वो कुछ देर में आँख उलटते काँपने लगी मुंह से झाग आया, और जल्द ही कुछ वक्त बाद उसका बदन ऐंठते हुए वैसे ही शांत रह गया उस रात वो हमेशा के लिए सो गई। दीपक के ऊंचे रसूख के कारण किसी ने उंगली नहीं उठाई, डॉक्टरों ने इसे 'मेडिसिन रिएक्शन' मान लिया।

अब दीपक की पैनी निगाहें क्लब में ऐसी 'पाक-साफ़' औरतों को तलाशती थीं, जो किसी धंधे या जिस्मफरोशी से न जुड़ी हों। ऐसी घरेलू औरतें जो आसानी से हाथ नहीं आती, पर किस्मत की मारी इस क्लब में दिख जाती थीं। उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने में एचआईवी या एड्स जैसी बीमारियों का खतरा भी नहीं रहता था।

तभी उसकी नज़र ज़ोरदार ठहाके लगाते तीन जुआरियों पर पड़ी, जो पास ही डार्ट्स फेंकने का खेल खेल रहे थे। दीपक जुए और सट्टेबाजी का माहिर खिलाड़ी था, वह कभी कोई दांव नहीं हारा था। वह उन तीनों के पास गया, जो शादीशुदा लग रहे थे।

दीपक ने उनके सामने '५०१ पॉइंट्स' के डार्ट्स खेल की बाज़ी लगाने की बात कही। उस आदमी ने उसे खुरदुरी निगाह से देखा और ऐंठते हुए कहा, "मैं कभी हारा नहीं हूँ।"

दीपक ने मुस्कुराते हुए कहा, "तो ठीक है, एक-एक दांव लगाएं? क्या कहते हो?"

उसने कहा, "मंज़ूर।"

खेल शुरू हुआ। शुरुआत में वह आदमी दीपक पर भारी पड़ रहा था, लेकिन तभी पासा पलटा। दीपक ने हौले-हौले 'ट्रेबल' और 'डबल' मारते हुए पॉइंट्स को आधे से भी कम कर दिया और बाज़ी अपने नाम कर ली। वह आदमी चिढ़ गया। जब उसने हार के पैसे दीपक के आगे रखे, तो दीपक ने उसे दोबारा खेलने के लिए उकसाया, "मैं एक बार और खेलना चाहता हूँ। अगर इस बार जीते तो डबल!"

उसके दोस्तों ने उसे रोकने की कोशिश की, "अरे तू पहले ही जुए में बहुत पैसे बर्बाद कर चुका है, मत खेल!" लेकिन हार के अपमान से तिलमिलाया वह ज़िद्दी आदमी नहीं माना। दीपक उसकी इसी कमज़ोरी को पकड़कर उसे टीज़ कर रहा था।


दीपक ने कहा, "ठीक है, शर्त तो लगा लेते हैं लेकिन अगर हार गए तो क़ीमत दुगनी... पूरे ५०,००० रुपये।"
उसके दोस्त भड़क उठे, "अरे दिमाग़ ख़राब है तुम्हारा?"
दीपक ने कड़े स्वर में कहा, "मुझसे तमीज़ से बात करो। शायद तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ। अगर तुम्हारा दोस्त हारा तो ५०,००० देगा, लेकिन अगर जीता तो मैं खुद इसे १ लाख रुपये दूँगा।" दीपक ने जेब से चेकबुक निकालकर चेक भरना शुरू किया, जिसे देखकर उन तीनों की आँखें फटी की फटी रह गईं। बाज़ी दोबारा शुरू हुई।

दीपक जानता था कि जो इंसान अंदर से चिढ़ा हुआ और घुट रहा हो, वह कभी एकाग्रता से नहीं जीत सकता। दीपक ने अपने पुराने पैंतरे चले और खेल के अंत में उसको पूरी तरह हरा दिया। वह आदमी घुटनों के बल गिर पड़ा।

दीपक ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब तुम्हारे पास कोई चॉइस नहीं है। वादे के मुताबिक तुम्हें मुझे ५०,००० रुपये देने होंगे।"

उसने हाथ-पैर जोड़ते हुए कहा, "मुझे माफ़ कर दीजिए, मेरे पास इतनी रक़म नहीं है।"....उसके दोस्त भी मिन्नतें करने लगे।

दीपक ने कहा, "कतई नहीं। ठीक है, एक रास्ता और है। लेकिन अगर वह रास्ता तुम नहीं माने, तो सोच लेना।"

उसने पूछा, "मतलब?"

दीपक पहले से ही उसकी हिस्ट्री जानता था। यह आदमी रोज़ यहाँ आता था, जुए में हारता था, घर का सामान और बीवी के गहने तक बेच चुका था, और भारी कर्ज़ में डूबा था। दीपक ने उसके सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने उसके पैरों तले ज़मीन खिसका दी: "अपनी बीवी मुझे एक रात के लिए दे सकते हो?"

"हरामज़ादे!" उसने गुस्से में तमतमाकर दीपक का ग्रीबान थामना चाहॉ, पर उसके दोस्तों ने उसे पकड़ लिया। वे भी दीपक पर भड़के, "तू जानता है तू क्या कह रहा है? बाज़ी पैसों की लगी थी, ऐसी घिनौनी सोच लाया भी कैसे तू?"

दीपक ने बड़े आराम से उनकी तरफ देखा और एक ठंडी मुस्कुराहट के साथ कहा, "लगता है पेशेवर जुआरियों के साथ-साथ बदतमीज़ों की टोली भी हो। क्या मैं जानता नहीं कि तुम तीनों कर्ज़ में डूबे हो? मुझे सिर्फ एक फोन कॉल करना पड़ेगा, और पुलिस यहाँ आकर तेरे इस दोस्त को उठा ले जाएगी। मैं दावा करूँगा कि इसने शर्त के मुताबिक मेरा पैसा खा लिया।"

उसने तपाक से कहा, "हूँ! जुए की शर्त पर पुलिस मुझे उठाएगी? ये सब बकवास किसी और के आगे करना, नहीं देते तेरे पैसे।"

दीपक ने चालाकी से अपना पासा फेंका, "ठीक है, जब कल तेरे घर पुलिस आएगी तो बेझिझक उन्हें समझाना कि जुए के पैसे के लिए पुलिस कब से उठाईगीरी का काम करने लगी? पर एक नामचीन रिटायर्ड सरकारी डॉक्टर के साथ बदतमीज़ी और उसके पैसे ऐंठने के जुर्म में... जब मेरे जानने वाले आला पुलिस अधिकारी दोस्त तेरे जैसे जुआरी को उठाकर लंबे समय के लिए अंदर डालेंगे, तो वो महज़ वक्त की बात रह जाएगी।"

यह सुनते ही तीनों कांप उठे। हारा हुआ जुआरी हकलाते हुए बोला, "तू... तू ऐसा नहीं कर सकता।"

दीपक ने सौदा तय करते हुए कहा, "सोच ले, घाटे का सौदा नहीं है। तेरी तमाम हरकतों को मैं माफ़ भी कर दूँगा, और यही नहीं तेरे ऊपर का तमाम कर्ज़ भी चुकता करवा दूँगा... अगर तू शर्त माने और मुझे अपनी बीवी बस एक दिन के लिए दे दे।"

कर्ज़ और कानून के दोहरे खौफ के आगे उस आदमी ने हथियार डाल दिए कुछ देर सर थामा वो वैसे ही बैठा रहा उसके दोस्त उससे कानाफूसी करते रहे, "देख बड़ा आदमी है",..."पंगा हो जाएगा बॉस, ये साला मामूली बंदा नहीं है"......"यार लेकिन मेरी बीवी को!"......"देख कर्ज़ा तो माफ़ कर रहा है ना, सिर्फ यहाँ बेइज़्ज़ती नहीं होगी पुलिस तो अलग इज़्ज़त की किरकिरी करेगी और जेल अलग"........."कर्ज़दार क्या तेरी बीवी को छोड़ देंगे? साले खून कर देंगे तेरा तब तो"........दोस्तों की बातों को वो गौर से सुनता रहा फिर खुद भी कुछ नतीजा निकालने की नाकाम कोशिश करने लगा....वहीं दूसरी तरफ ये सब देखकर दीपक मंद-मंद उनकी हालत देख मुस्कुरा रहा था तभी वो उठा और लंबे डग भरता उसके करीब आया उसने हामी भर दी। दीपक ने मन ही मन एक विजेता की तरह चुटकी बजाई। उसने कहा, "अब बीवी को तैयार करना तेरा काम है। मैं यहीं हूँ, उसे सोते से जगा या खड़े पैर बुला। अगर वह नहीं मानी,तो आज के आज पैसा लेके आ वरना कल तो पुलिस तेरे दरवाज़े पर दस्तक देगी।"

उसने घबराकर कहा, "नहीं नहीं! ऐसा कुछ मत करना, मैं अपनी बीवी को मना लूँगा।"

कुछ घंटे बीत गए। दीपक वहीं बैठकर ड्रिंक करता रहा। उसका दिल खटक रहा था कि क्या वह अपनी बीवी को लाएगा? तभी वेटर ने उसे बाहर आने का बुलावा भेजा,दीपक जाम खत्म करके बाहर निकला। जब वो क्लब से बाहर आया तो उसे वह आदमी अकेले एक औरत के साथ क्लब के बाहर खड़ा दिखाई दिया,

उसने उस औरत का बारीक मुआयना किया, जैसे अपनी आँखों से उसके कपड़ों के भीतर झाँक रहा हो। वह साधारण, संस्कारी घरेलू गृहिणी लग रही थी।

पति ने सिर झुकाकर कहा, "साहब, ये मेरी बीवी मेघना है।"
मेघना के चेहरे पर गहरा दुख और लाचारी थी। सामने खड़े सूट-बूट पहने अधेड़ उम्र के रौबदार दीपक को देखकर वह थोड़ा घबराई, पर खुद को नॉर्मल किया। दीपक ने कहा, "हूँ... बहुत अच्छी है। आपसे मिलके बहुत अच्छा लगा, तो क्या अब हम चलें?"

उसका पति अपनी ही बीवी को मुजरिम नज़रों से देख रहा था। मेघना ने एक बार अपने पति को आँख तरेर कर देखा, जैसे वह उसे वहीं भस्म कर देगी, पर फिर हार मानकर सिर झुका लिया।

दीपक ने कहा, "मैं इन्हें अपने साथ ले जा रहा हूँ। परसों सुबह तक मेघना सही-सलामत बाहिफाज़त तुम्हारे घर पहुँच जाएगी।"

पति ने चौंककर कहा, "परसों?"

दीपक ने गंदी मुस्कुराहट के साथ मेघना को देखते हुए कहा, "शायद तुम भूल रहे हो, आज रात गुज़रने में कुछ ही वक्त बचा है, और कल का पूरा दिन हमारा है।" मेघना शर्म और बेइज्जती से सिमट गई। दीपक ने कहा, "तुम अब जा सकते हो। चले मेघना?"

इतना कहकर दीपक ने पूरी हिम्मत के साथ मेघना की कमर में हाथ डाला और उसे अपनी साथ खींचते हुए गाड़ी की तरफ ले गया। उसका पति एक हारे हुए इंसान की तरह दोनों को जाते देखता रहा, जबकि मेघना ने पीछे मुड़कर रोती हुई, भावहीन नज़रों से उसे देखा। दीपक ने खुद गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर उसे बिठाया और खुद ड्राइविंग सीट पर आ बैठा। उसने बाहर खड़े मजबूर पति पर एक उड़ती हुई नज़र डाली और गाड़ी सीधे रास्ते पर बढ़ा दी।

पूरे रास्ते दीपक बस मेघना को घूर-घूर कर देख रहा था। साड़ी में छुपा उसका यौवन और तराशा हुआ जिस्म बेजोड़ था।

दीपक ने सन्नाटा तोड़ते हुए कहा, "तुम्हारा पति बहुत किस्मतवाला है जो तुम जैसी खूबसूरत बीवी उसे मिली।"

मेघना गुमसुम, खामोश बैठी थी, जैसे उसके भीतर की आत्मा मर चुकी हो। दीपक ने आगे कहा, "मैं जानता हूँ, पर फिक्र मत करो। शुरुआत में थोड़ा अजीब लगता है पर देखना, तुम खुद चाहोगी कि तुम मेरे साथ हमेशा रहो। तुम बदकिस्मत नहीं हो, बल्कि किस्मत की मारी हो और अब तुम्हारी किस्मत बदलने वाली है। क्योंकि मैं तुम्हें वो सब दूँगा जो तुम्हारा पति तुम्हें न दे सका। तुम चाहो तो बिना पति को छोड़े भी मेरे साथ हमेशा ऐसा रिश्ता रख सकती हो, या मेरी हमसफ़र तक बन सकती हो।"

मेघना ने एक खोखली और बेजान आवाज़ में पूछा, "क्या कोई और रास्ता नहीं?"

दीपक ने अपनी उंगली से कुछ ही दूरी पर स्थित अपने वीरान और आलीशान मैंशन की तरफ इशारा करते हुए कहा, "सारे रास्ते एक ही तरफ खुलते हैं...और वो है उस तरफ।"

वह एक विशाल, सुनसान बंगला था जहाँ दीपक अकेला रहता था और जिसके भारी दरवाज़े इस वक्त बंद थे। दीपक ने गाड़ी रोककर हॉर्न बजाया। द्वार खुला, गाड़ी अंदर दाखिल हुई और मेन गेट के पास आकर रुक गई।
वे दोनों गाड़ी से बाहर निकले। दीपक ने दोबारा मेघना के कंधे पर अपना हाथ रखा और बड़े झूठे प्यार से बोला, "आओ, अंदर चलें..."
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«Reply #2 on: November 01, 2026, 12:20:19 AM »
Chapter 2

दरवाजा चरचराते हुए खुल गया, दोनों की कदमो की साफ़ भारी आवाज़ ऊचे बंद चार दीवारी में गूंजने लगी, बादलो में गर्जन शुरू हो चुकी थी, कंधे पे दीपक का हाथ अब धीरे धीरे सरकता हुआ मेघना के कमर से खुले पेट पर आ चूका था, वो थोड़ी कसमसाई उसे अपमान में लज्जित देख दीपक हँसा फिर उसने उसके कान के पास चेहरा लाते हुए नज़ाकत से कहा

"होता है, पति के सिवाह कभी किसी और ने शायद तुम्हे ऐसे हाथ नहीं लगाया हो, आज रात मुझे अपना पति मानो काबिल पति".....उसने इतना कहते हुए मेघना के पेट को और कस्कर अपने हाथो से दबोच लिया

मेघना सिसक उठी, तभी उसे बिजली का तेज कड़कड़ाहट भरा आवाज़ सुनाई दिया, लापरवाही से दीपक ने बाहर की तरफ देखा खिड़की से बाहर बिजलिया चमकती हुयी और पेड़ लहराते हुए उसे दिखे, "इस शहर का मौसम भी बड़ा बेवफा है, एक तूफान बाहर लगी है, और एक घर के अंदर आओ अंदर कमरे में चलते है"...वो उसे वैसे ही कमर और पेट में हाथ रखकर भीतर अपने लिविंग हॉल नुमा बड़े से बैडरूम में ले आया,

मेघना एक सोफे पे बैठ गयी, दीपक पास रखके फायरप्लेस में लकड़िया डालने लगा, फिर उसने अंगीठी जलाई धु धु कर उसमे आग जलने लगी, तभी लाइट चली गयी, फ़ौरन आटोमेटिक इन्वर्टर से वहां पे जगह जगह रखखी लैंप रोशनदान हुयी जिससे कमरे में हलकी रोशनियाँ थी, वो आग की लपटों को देखता हुआ फायरप्लेस के ऊपर बने शेल्फ से जाम और एक बोतल ले आया, "मैं शराब नहीं पीती"....उसका दो टूक जवाब तमक से पाकर दीपक का हाथ में थमा बोतल और खाली गिलास वैसे ही ठहर गए,

"डेट'स अमेजिंग".....उसने फिर अपना खाली गिलास भरा और एक ही सास में अपने हलक में उतार लिया

उसे शराब पीता देख मेघना उसे विचलित नज़रो से देखने लगी, वो चाहके भी वहां से भाग नहीं सकती थी, गिलास ख़ाली करके उसे साइड में रखते हुए दीपक गुलाबी आँखों  से उसे घूरने लगा, तभी बिजली कड़की और मेघना उसे बेहद घबराये देखने लगी,

"अब सव्र नहीं होता साड़ी उतारो"

"प..पर"

"तुम खुद उतारो या कहो तो मैं!"

वो उठकर झिझकते हुए अपना साड़ी उतारने लगी, उसे बड़े चाव से दीपक देखने लगा, धीरे धीरे करके उसने अपने सारे पहनावे उतार दिए और अपमानित मन से अपने छातियों और अपने टांगों के बीच हाथ रखकर दीवार सट गयी, धीरे धीरे दीपक उत्साहित और वासना की आग में जलता अपने कपड़े उतारने लगा, "शर्मा काहे रही हो, आज तुम मेरी बीवी हो, अपने हाथ हटाओ मैं तुम्हारी खूबसूरती देखकर उस दिन को कोसता हूँ जब तुम मुझे तुम्हारे कुंवारी वक़्त में मिली होती, मैं तो खड़े पैर तुमसे शादी कर लेता"....अपमान से सर झुकाये मेघना वैसे ही हालत में खड़ी रही,

दीपक एक एक कदम चलता उसके पास आया और उसे लगभग खींचता हुआ अपने सीने से चिपकाए उसके बदन को बेतहाशा चूमने लगा, मेघना उससे खुद को घिन्ना से सिसकते हुए छुड़ाने लगी, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी, वो उसे अपने आलिंगन में बांधता बाहों में उठाये सीधा बिस्तर पे ला चूका था,

बादल तेज गरज बरस रहे थे, वो लरखरता शराब में धुत वही मेघना का पति था, जो इस वक़्त अपमान और अपनी बीवी से आँख न मिलाने की ताव न पाने पर खुद को कोसता दीपक को गाली देता उसके घर पहुँच चूका था, उसने लोहे के फाटक को हिला डाला पर वो बंद था, तभी उसे वॉचमन गार्ड आता दिखा वो अँधेरे की आड़ में एक तरफ चुप गया, गार्ड पहरा देता वापिस अपने केबिन में चला गया, वो सतर्क था, उसे अपनी बीवी को हरहाल में बचाना था, वो लगभग गिरता पड़ता मेन्शन के पिछवाड़े पंहुचा, बाउंड्री वाल इतनी ऊंची नहीं थी,

उसने पहले लड़खड़ाए अपने आस पास झाका, उसके रिहायश तक पहुंचना उसके लिए कठिन काम नहीं था, मामूली पूछताछ और उसके रसूख से ही वो वहा तक पहुंच चूका था, उसे आत्मग्लानि तभी से होने लगी जब उसने खुद अपने हाथो से अपनी बीवी मेघना का सौदा अपने दुश्वारियों को दूर करने खातिर उसे सोते से जगाकर पहले समझाए फिर डराए धमकाए आखिर उसे अपने साथ देर रात क्लब चलने और दीपक के सौदेबाज़ी के तहत अपने जान सांसद में फसे होने का दुहाई देकर उसे लाने में मज़बूर किया, बीवी की नज़र में तो पहले ही वो गिर चूका था, अब उसे ऐसे आदमी के हवाले कर वो खुद की नज़रो में गिर चूका था, अब चाहे कर्ज़ा चुकता की रकम मिले या न मिले, बीवी की अस्मत और इज़्ज़त तो दाँव पर लगाकर उसे अपनी भूल को किसी भी कीमत पे सुधारना था चाहे खतरा जान का भी मोल लेना हो, वो दीवार पर जैसे तैसे चढ़ा शराब के नशे में पीठ के बल दोबारा तिवारा सड़क पे आकर गिरा, लेकिन कोशिश बदस्तूर वो जारी रखा, तभी राहदारी से सटे एक पुराने पेड़ पर उसकी नज़र पड़ी, जिसकी खुशबू रात में ग़म-ग़म महक रही थी। बचपन से पेड़ पर चढ़ने का अभ्यस्त होने के कारण, वह फुर्ती से उसकी मोटी शाखा के सहारे बाउंड्री वॉल की कटीली बाड़ वाली छत पर चढ़ने में कामयाब हो गया। मौसम ख़राब था और शायद देर रात को शराब और बीड़ी के नशे में धुत्त guard का पहरा उतना खास नहीं था, वो दिवार पे ऊँची फेंस की तारो को अपने कटीले औज़ार से काटने में कामयाब रहा, यही औज़ार आगे चलकर उसका हथयार बनने वाला था,

वो रहधारी में कूदने में कामयाब रहा, वो कच्ची मिटटी भरी घासो से भरी ज़मीन थी, हवाएं तेज चल रही थी, वो आगे बढ़ा अब उसे घर के अंदर दाखिल होना था, वो पास के नाली के पाइप छूकर मुआना करने लगा, फिर उसने पाइप के रास्ते पे चढ़, ऊपर पहली मंज़िल तक पंहुचा, वो चबूतरे पे pipe से एक पाव उसपर रखकर बड़े एहतियात से पहली मंज़िल की खिड़की के सामने आ खड़ा हुआ, एक गलती और वो सीधा निचे गिरके अपनी हड्डी बेशक तुड़वा लेता और फौजदारी का केस तो उसपर दायर होता ही, क़िस्मत से खिड़की में कब्ज़ा नहीं था, वो कुछ कोशिशों में पीछे धकेलते ही चौखट से खुल गया, शायद लापरवाही से या खराबी से वो खिड़की लगती नहीं थी, वो अंदर एहतियात से घुसा, अपने पीछे हो हो करती हवाओ का शोर खिड़की के बदस्तूर लगते ही अंदर आना बंद हो गयी, वो पाव दबे दरवाजे के पास आकर उसने दरवाजा पूरी ताक़त से खोला पर दरवाजा खुला नहीं, मतलब कमरे में वो बंद हो चूका था, वापिस खिड़की के रास्ते पाइप का रास्ता तय कर उसपे नीचे उतरना आसान नहीं था, उसने दरवाजे के ऊपर बने वेंटिलेशन को जांचा जो खुला था और जिसका साइज भी औसतन ज़्यादा था, उसने पहले कमरे में रखका ऊंचा मेज़ लाया उसपे स्टूल चढ़ाया वो वेंटिलेशन के शीशे को और ऊपर फसाता बाहर की तरफ झाकने लगा फिर मारे हड़बड़ाहट में बाहर की तरफ वो और झुका वो अब वैसे आधा कमर लटक चूका था, उसने फुर्ती से अपने शरीर को और नीचे किया और अपनी बदन के छीलने या घिसने के परवाह किये बिना वो आहिस्ते आहिस्ते वेंटिलेशन क्रॉस से सीधा दरवाजा पे उल्टा फसा लगभग बाहर की तरफ गिरने को हुआ उसने फुर्ती से अपने दोनों हाथ सर और चेहरे को बचाते सीधा सामने रखके वो ज़मीन पे औंधे मुंह गिरा, पर गनीमत थी उसे ख़ास चोट नहीं आयी थी, वो अब अंदर था उसकी नज़रे चारो तरफ घूमी, वो वैसे ही दबे पाव चलता सामने के बैडरूम पंहुचा, जिसका दरवाज़ा सटा हुआ था, और अंदर से मर्द की आहें और औरत की सिसकियों की आवाज़ बाहर धीमी-धीमी सुनाई दे रही थी, वह हड़बड़ाता दरवाज़े से सटकर उसे हल्का धकेला अधखुला दरवाजा की झिरी से उसने अंदर अपनी बीवी को दीपक के साथ बिस्तर पर गुत्थमगुत्था होते पाया जो जानवरो की तरह उसका भोग ले रहा था, उसकी बीवी की दर्दभरी आहों और सुबकती सिसकियों को सुन जैसे बाहर की बिजली उसके मन में कड़क रही थी,

उसका सब्र टूट गया वो बेकाबू होता पागलो की तरह दरवाजे को एक लात मारकर अंदर दाखिल होता लगभग अपना कटीला औज़ार लिए उसके करीब आया, दीपक हड़बड़ाके मेघना के ऊपर से उठा उसे वहा उस आलम में देख सन्न रह गया वो भी नग्न हालत में पसीने पसीने हो रहा था, मेघना के बदन पर जब उस आदमी की नज़र उठी तो उसे उसके बदन खासकर स्तन के करीब और बाकि गले पे साफ़ तौर से दांतो के बने लाल सुर्ख निशान दिखे, अब तो उसका आपा खो गया, इससे पहले दीपक कुछ समझ पाता उसके माथे पे उसके पति ने औज़ार का करारा हमला किया वो ज़ोर से चीखा उसका सर फटा और बेतहाशा खून के छींटे उस आदमी और मेघना के नंगे बदन पे पड़े वो चिल्ला उठी, दीपक कापता दर्द से तड़पता लहूलुहान वही फर्श पर गिर पड़ा, उसका जिस्म एक बार धनुष की तरह तना फिर वो ज़मीन पे वैसे ही सीधा पड़ा रह गया, आँखे पथराई खुली रह गयी थी, बीच बीच में बिजली की चमक में उसका खून से लथपथ चेहरा दोनों के नज़रो में साफ़ दिख रहा था,

औज़ार फिसलकर उसके हाथ से गिर गया, उसका नशा फुर हो चूका था,"ये तुमने क्या किया?"....अपने बदन पे चादर लिपटी मेघना बिस्तर से उतरकर उसे झिंझोड़ने लगी,

"वही किया जो सही था"....वो जैसे खुद से बड़बड़ाता बोल रहा था 

"तुम जानते हो? तुमने क्या किया?"....मेघना उसे झंझोड़ते हुए चिल्लाई फिर उसने मारे खौफ से दबी आवाज़ में उससे कहा.."पागल हो गए हो वो मर चुका है"...वह तब भी बदस्तूर दीपक की लाश की तरफ देख रहा था, खून से सने चेहरे की पथराई आंखें छत की दीवार को एक टक जैसे देख रही थीं, रह-रहकर बिजली कड़क उठ रही थी, तभी भौखलाता वो आदमी अपनी बीवी मेघना की तरफ देखा जो चादर से अपने चेहरे पे लगे उसके खून को पोंछे जा रही थी,

"त...तुम फिकर मत करो मेरी बात सुनो, हम लाश को ठिकाने लगा देंगे"

"न..नहीं हम पुलिस के पास जाएंगे, ऐसे कैसे?, बाहर गार्ड ने मुझे इनके साथ आते देखा है, उसे कैसे संभालोगे?"

"पुलिस हमें ही कठघरे में खड़ा कर सीधा फांसी पे लटका देगी, ये जो कुछ मैंने किया वो सिर्फ तुम्हारे लिए किया, मैंने बहुत गलत किया तुम्हारे साथ, मैं खुद को आईने में देख नहीं पा रहा था"......वह कहते-कहते रोने लगा

"अब पछतावा कैसा? उसे जो करना था वो लगभग कर गुज़रा था"...उसने अपमानित होते अपनी लुटी इज़्ज़त का जैसे शोक मनाया

तभी उस आदमी को अपनी भूल का अहसास हुआ। वो झटके से उठा। डर की एक ठंडी लहर उसकी रीढ़ में दौड़ गई कि उसने गुस्से में क्या अनर्थ कर दिया था। उसने मेघना की तरफ देखा और हांफते हुए बोला, "तुम बिल्कुल फिक्र मत करो मेघना। अभी कोई देरी नहीं हुई है। मेरे यहाँ अंदर आने के बारे में किसी को पता नहीं है। रही बात उस गार्ड की, तो वो साला गेट पर नशे में बिल्कुल धुत पड़ा है। उसे पता भी नहीं चलेगा कि हम कब यहाँ से निकल गए। तुम बस एक काम करो... तुम्हें इस लाश को बाहर ले जाने में मेरा साथ देना होगा।"

मेघना ने खौफ से आँखें फाड़कर उसे देखा, "तुम पागल हो गए हो? क्या कह रहे हो तुम? कैसे ले जाएंगे इसे?"
उसने मेघना का हाथ पकड़ा, "गाड़ी के ज़रिए... दीपक की गाड़ी के ज़रिए।"

प्लान के मुताबिक, उसने फौरन सबूत मिटाने का काम शुरू किया। उसने अपने चेहरे पर एक कम्बल डाल लिया ताकि उसका अपना कोई निशान या बाल वहाँ न छूटे। उस आदमी की कद-काठी हूबहू दीपक जैसी ही थी। उसने अलमारी खोली और दीपक का एक कीमती सूट निकालकर खुद पहन लिया। लोड शेडिंग को ज़रिया बनाते जल्द ही एक दराज़ से टॉर्च हासिल कर लिया।
इसके बाद उसने पूरे कमरे का मुआयना किया। जहाँ-जहाँ फर्श और दीवारों पर खून के छींटे और दाग लगे थे, उसने बड़ी बारीकी से उन सबको पोछकर साफ़ कर दिया। फर्श चमकाने के बाद, उसे जहाँ भी लगा कि उसके हाथों के फिंगरप्रिंट्स निशान आए होंगे, उसने उन तमाम जगहों को रगड़-रगड़ कर साफ़ किया।

अब बारी लाश की थी। उसने लाश को उसी खून से सनी चादर और रजाई में लपेटा और कसकर एक पायी रस्सी से बांध दिया। वह दबे पाँव उस कमरे की तरफ गया जहाँ से वह खिड़की के रास्ते अंदर आया था। बाहर से लगे कुंडी का दरवाजा खोला अंदर गया उसने उस ऊंचे मेज़ और स्टूल को, जिसके सहारे वह वेंटिलेशन से कूदा था, बड़ी बारीकी से पोछकर वापस उनके यथास्थान पर रख दिया। कमरे के दरवाज़े को उसने बाहर से दोबारा केवल कुंडी लगा दी और खिड़की को बदस्तूर वैसा ही बंद कर दिया जैसा वह पहले थी।

वह वापस मेघना के पास आया। दीपक की गाड़ी की चाभी उसे मिल चुकी थी। चूँकि गाड़ी मुख्य राहदारी के पास ही खड़ी थी, इसलिए भारी बंधी लाश को घसीटकर डिब्बी तक ले जाना अंधेरे का फायदा उठाकर आसान रहा। उसने लाश को गाड़ी में डाल दिया। इसके बाद उसने अपनी आँखों पर दीपक का चश्मा चढ़ाया, गाड़ी के ग्लास को ऊपर तक पूरी तरह बंद किया और मेघना को साथ लेकर ड्राइविंग सीट पर आ बैठा।

गाड़ी गेट के पास पहुँची। चारों तरफ मूसलाधार बारिश हो रही थी। उसने तेज़ हॉर्न बजाया। गेट के केबिन में बैठा वॉचमैन शराब के नशे में पूरी तरह धुत्त था। उस आदमी ने गाड़ी की खिड़की को थोड़ा नीचे किया। उसकी कलाई पर दीपक की महंगी घड़ी बंधी थी। उसने बिजली की कौंध के बीच हाथ बाहर निकाला और घड़ी दिखाते हुए कड़े लहजे में उसकी आवाज़ की नक़ल दोहराता जल्दी दरवाज़ा खोलने का इशारा किया। गार्ड ने अपनी धुंधली आँखों से सिर्फ वो घड़ी और गाड़ी देखी। उसे लगा कि डॉक्टर साहब किसी काम से देर रात बाहर जा रहे हैं। उसने बिना कुछ सोचे गेट खोल दिया। वे दोनों उस खून से सनी चादर और रजाई में बंधी दीपक की लाश के सबूत को समेटे उस खौफनाक मैंशन की चहारदीवारी से बाहर निकलने में कामयाब हो गए।

तूफानी और सर्द बरसात की उस रात में उनकी गाड़ी शहर के छोर पर बने एक पुराने, बंद और वीरान कब्रिस्तान के सामने आकर रुकी। वहाँ सन्नाटा इस कदर गहरा था कि सिर्फ बादलों के गरजने और पत्तों के टकराने की आवाज़ें आ रही थीं। पति ने गाड़ी रोकी। मेघना भयभीत हुई, पर उसके पति ने उसे निश्चिंत किया, वो दोनों बाहर निकले उसने पास जाकर पहले फाटक का मुआयना किया, जैसा अपेक्षा था लापरवाही के कारण या वहां रखवाले की गैरमौजूदगी में रास्ता साफ था, उस घड़ी भीषण तूफानी सर्द और बरसाती रात में वहां किसी का होना लगभग नामुमकिन था, फाटक उसने ठेला जो हल्का आवाज करता अपनी जगह से खुल गया, वो अंदर कोहरे में चलता भीगता कहीं धुंध में गायब हुआ तो उधर गाड़ी में बैठी मेघना ने खौफ से बाहर बिगड़ते मौसम को देखा, उसका दिल उसे कानों तक सुनाई दे रहा था, तभी बिजली कड़की और वो सिहम उठी, लाश अब भी गाड़ी के डिक्की में थी, उसे ज़हन में आया कि कत्ल से पहले उस लाश के साथ वो हमबिस्तर थी, वो शर्मिंदगी में डूब गई, तभी उसे कुदाली लेके हाथ में, भागता उसका पति आता बाहर दिखा, वो गाड़ी के पास आके झुका वह कब्रिस्तान से ही पहले चोरी छिपे लाई गई एक कुदाली निकालकर लाया था।

"रास्ता साफ़ है, चलो जल्दी गाड़ी से उतरो और लाश को अंदर तक ले चलने में मेरी मदद करो, डरो नहीं यहाँ कोई नहीं है शायद यहाँ कोई रात गए पहरा नहीं देता"....घने अंधेरे और बारिश के बीच चलते एक तरफ कंबल ढकी बंधी लाश को उसका पति और मेघना दूसरे सिरे से उठाए जैसे तैसे एक कच्चे ज़मीन की तरफ आए, मेघना घबराए कभी लाश तो कभी चारों तरफ तो कभी अपने पति को देख रही थी, उसने एक जगह का निरीक्षण किया और वह पागलों की तरह ज़मीन खोदने लगा। कीचड़ और मिट्टी से सने हाथों से उसने जैसे-तैसे एक कबर जैसी जगह तैयार की। बंधी लाश पास में रखी हुई थी। उसे प्लास्टिक शीट से निकाल कर जब दोनों ने उठाया, तो दीपक की लाश...
वह बारिश की गीली मिट्टी से फिसलता मेघना के कमज़ोर हाथों की पकड़ से छूटता सीधा गड्ढे में जा गिरा, उन्होंने लाश को उस कब्र में ठीक से सीधा किया और हांफते हुए उस पर वापस ताज़ा मिट्टी भरने लगे।

अभी उन्होंने कब्र को मिट्टी से पूरी तरह ढका ही था कि अचानक अंधेरे को चीरती हुई एक तेज़ टॉर्च की रोशनी उनके चेहरों पर पड़ी। कोई आ रहा था! पकड़े जाने के डर और खौफ से दोनों के हलक सूख गए। उन्हें लगा कि शायद कब्रिस्तान का कोई रखवाला आ गया है। बिना एक पल गंवाए, वे दोनों कुदाली वहीं छोड़कर उल्टे पाँव भागे, कब्रिस्तान से बाहर निकले गाड़ी में बैठे और गाड़ी को उस वीराने से बहुत दूर की तरफ भगा ले गए।

लेकिन टॉर्च लेकर आने वाला वह शख्स कोई रखवाला नहीं था। वह ७० साल का एक बुजुर्गवार था। असल में, वह उस असली रखवाले को ढेर सारी शराब और पैसों का लालच देकर पहले ही चौकी पर नशे में धुत छोड़ आया था, ताकि वह आराम से यहाँ अपना काम कर सके। लेकिन जब वह कबरों की तरफ बढ़ रहा था, तो उसने दो सायों को गाड़ी में बैठकर भागते देखा। बुजुर्ग की नज़र उस कब्र पर पड़ी, जहाँ की मिट्टी बिल्कुल ताज़ी और उभरी हुई थी।

बुजुर्ग ने भागते हुए जोड़ों का पीछा करने की बजाय, अपनी कुदाली उठाई और उस ताज़ी कब्र को दोबारा खोदना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों की मशक्कत के बाद, मिट्टी के नीचे दबी कम्बल और रजाई में लिपटी वो लाश बाहर आ गई। बुजुर्ग ने जैसे ही उस गीले कम्बल को चेहरे से हटाया, आसमान में बिजली कड़की। उस तेज़ रोशनी में बारिश की बूंदों से भीगा, माथे पर गहरे घाव और खून से सना हुआ चेहरा साफ़ दिखाई दिया। उसकी पथराई हुई आँखें खुली की खुली थीं।

उस चेहरे को देखते ही बुजुर्गवार के पैरों तले ज़मीन नहीं खिसकी, बल्कि उसके चेहरे पर एक गहरी, शैतानी मुस्कान उभर आई। वह चेहरा किसी और का नहीं, बल्कि दीपक का था—वही दीपक जो उसका पुराना जानने वाला था!

बुजुर्ग ज़ोर से हँसा और बड़बड़ाया,"आख़िरकार... आख़िरकार मुझे एक ज़िंदा, ताज़ा लाश मिल ही गई! अब उस रखवाले को शक भी नहीं होने वाला कि देर रात गए मैंने यहाँ से कोई पुरानी लाश नहीं चुराई, बल्कि किसी ने मेरे काम को आसान करने के लिए यहाँ एक ताज़ा कत्ल की हुई लाश को ठिकाने लगाया था।"

उधर, गाड़ी में बैठे दोनों पति-पत्नी डर से बुरी तरह कांप रहे थे। गाड़ी शहर की सीमा लांघ चुकी थी। हताशा और रोते हुए मेघना ने अपने पति से पूछा, "अब हम क्या करेंगे? पुलिस को तो पता चल ही जाएगा ना? आखिर में तो हम पकड़े जाएंगे!"

पति ने स्टेयरिंग पर अपनी पकड़ मज़बूत की और गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाते हुए कहा, "तुम बिल्कुल फिक्र मत करो मेघना। हम इस शहर से कहीं बहुत दूर चले जाएंगे।"

"नहीं! पुलिस हमारे पीछे लग जाएगी," मेघना ने सिसकते हुए कहा, "तुमने कहा था कि तुम्हारे दोस्त तुम्हारा साथ देंगे। क्या तुम उन्हें ये बात बता दोगे कि हमने उसका कत्ल किया है? और वो गार्ड...वो तो पुलिस के सामने सारा शक मुझ पर ही डाल देगा।"

"हरगिज़ नहीं!" पति ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, "गार्ड ने मुझे खुद दीपक के तौर पर पहचाना है। वह पुलिस से यही कहेगा कि दीपक देर रात गए तुम्हें अपने साथ गाड़ी में लेकर खुद कहीं निकला था। उसे मेरे अंदर आने की भनक तक नहीं थी।"

"तो भी तो सारा शक मुझ पर ही आएगा ना कि गाड़ी इतने वक्त तक गायब कहाँ रही और वह वापस घर क्यों नहीं लौटा?" मेघना के सवाल वाजिब थे।

पति ने कुछ पल सोचा और गंभीर आवाज़ में कहा, "एक काम करते हैं...घर के तमाम सबूत हमने मिटा दिए हैं। मैंने गौर किया था कि मैंशन के सीसीटीवी कैमरे सिर्फ लिविंग हॉल और बाहरी राहदारी पर लगे थे। बेडरूम में क्या हुआ, इसकी कोई फुटेज नहीं है। वैसे भी देर रात के घने कोहरे, बारिश और लाइट न होने के चलते अंधेरे में कुछ भी साफ़ देखा नहीं जा सकता था। अगर आगे चलकर कोई फंसता भी है, तो सारा ज़िम्मा मैं अपने ऊपर ले लूँगा। लेकिन फिलहाल बेहतरी इसी में है कि हम ये शहर छोड़ दें।"

"और अगर तुम्हारे दोस्तों या क्लब के ही किसी आदमी ने आगे चलकर ये बयान दे दिया कि आखिरी बार उन्होंने दीपक को हम दोनों के साथ देखा था, और मामला क्या था वो भी बता दिया तो? भारी बेइज्जती और खून का इल्ज़ाम सीधा हम पर आयद होगा," मेघना का डर कम नहीं हो रहा था।

"मैंने कहा ना... सब कुछ मुझ पर छोड़ दो। प्लीज मेघना," उसने गाड़ी चलाते हुए एक हाथ से मेघना के चेहरे को छुआ और उसे दुलारा। मेघना ने उसकी आँखों में देखा। वह समझ चुकी थी कि उसका पति अब पहले जैसा स्वार्थी या पैसों के लालच में उसका सौदा करने वाला घिनौना इंसान नहीं रहा था, बल्कि अब उसकी हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान दांव पर लगाने को तैयार था। वह रोते हुए उसके गले लग गई।

पति ने कहा, "हम आज ही शहर छोड़ देंगे। यहाँ से कोसों दूर चले जाएंगे, जहाँ किसी को हमारी भनक तक नहीं लगेगी। वैसे भी इस शहर में हमारा अपना था ही क्या? और वैसे भी...मरे हुए मुर्दे कभी बोलते नहीं। उसकी लाश को हमने ऐसे गुमनाम कब्रिस्तान में ठिकाने लगाया है जहाँ पुलिस ये सुराग कभी नहीं निकाल पाएगी। अच्छा ही हुआ कि हम उस रखवाले की नज़रों में आने से पहले फरार होने में कामयाब रहे।"

बाहर भीषण बरसात अब एक खौफनाक तूफान का रूप ले चुकी थी। तेज़ हवाओं के थपेड़ों से लंबे-लंबे पेड़ आपस में टकराकर टूट रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो इस रात की कोई सुबह ही नहीं होने वाली थी।

उसी तूफान के बीच, वह ७० साल का बुजुर्गवार दीपक की लाश को अपनी गाड़ी की डिक्की में डालकर शहर की आबादी से दूर एक वीरान और सुनसान कॉटेज पर ले आया। वह उसका सीक्रेट अड्डा था। उसने भारी लाश को डिक्की से निकाला और घसीटते हुए अंदर अपनी गुप्त लैब में ले आया। बड़ी मुश्किल से उसने दीपक के भारी शरीर को एक ठंडी, पथरीली मेज़ पर पटका।

बुजुर्ग ने उसके शरीर से खून और कीचड़ से सने कम्बल और चादर को नोंच-नोंच कर अलग फेंक दिया। दीपक के माथे से खून अब भी टपक रहा था, जो टिक-टिक करके लैब के फर्श पर गिर रहा था।

लैब का नज़ारा खौफनाक था। एक तरफ एक बड़े बीकर में नीला रंग का कोई रासायनिक तरल पदार्थ उबल रहा था, जिससे गाढ़ा धुआं निकल रहा था। बुजुर्ग ने बर्नर की आंच को धीमा किया और लैब के उपकरणों को देखा। फिर वह धीरे-धीरे कोने में रखी अपनी एक खास दराज़ की तरफ बढ़ा।

उसने दराज़ खोली और अपने कांपते पर मजबूत हाथों में एक टेस्ट ट्यूब निकाली। उस टेस्ट ट्यूब के भीतर वही हरा वायरस जगमगा रहा था, जिसे ५६ साल पहले, साल १९७० में उसने रूस के उस गुप्त माइनिंग मिशन के दौरान सबकी नज़रों से बचाकर अपनी जेब में छुपाया था! वह कोई और नहीं, बल्कि वही सोवियत संघ का भारतीय वैज्ञानिक था, जो अपने वतन लौटकर इतने सालों से गुमनाम जिंदगी जी रहा था और इस वायरस पर अकेले काम कर रहा था।

उसने कोने में रखे एक पिंजरे की तरफ देखा। पिंजरे के अंदर एक चूहा मौजूद था, जो अपने आँखों से बुजुर्ग को एकटक देख रहा था। वह चूहा कोई आम चूहा नहीं था—वह इसी संशोधित वायरस का इकलौता, कामयाब और जीता-जागता नतीजा था, जिसे बुजुर्ग ने दोबारा ज़िंदा किया था।

बुजुर्ग की आँखें जुनून से चमक उठीं। वह हँसते हुए खुद से बोला, "जो विलायत के बड़े-बड़े महान वैज्ञानिक करने से पीछे हट गए... उस वायरस की ताकत को सिर्फ मैंने पहचाना! इतने सालों तक इस पर अकेले काम किया, इसकी कमियों को दूर किया और नए केमिकल्स मिलाकर आखिरकार यह नया फार्मूला तैयार कर ही लिया! मरे हुए को दोबारा ज़िंदा करने का चमत्कार!"

उसने टेस्ट ट्यूब को रोशनी के सामने लहराया, "इस इकलौते बचे हुए वायरस सैंपल का आखरी परीक्षण एक इंसान के मुर्दे पर करना बाकी रह गया था... जो आज रात पूरा होगा!"

तभी बाहर एक ज़ोरदार बिजली कड़की। उसकी नीली और भयानक रोशनी लैब की खिड़की से सीधे अंदर दाखिल हुई, जिससे मेज़ पर पड़ी दीपक की खून से लथपथ बेजान लाश पल भर के लिए पूरी तरह रोशन हो उठी...
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«Reply #3 on: November 01, 2026, 12:23:24 AM »
Chapter 3

अगली रात...

वह शहर का एक बेहद नामचीन होटल कम नाइट बार था, जहाँ एक तरफ स्टेज पर जैज़ की रोमांटिक धुन बज रही थी, तो वहीं दूसरी तरफ देर रात गए शहर की जवान नस्ल पूरी तरह नशे में डूबी हुई थी। लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के साथ नाच-गा रहे थे, और सोफों पर बैठे कपल्स शराब और एक-दूसरे की सोहबत का मज़ा ले रहे थे। वेटर ट्रे संभाले इधर-उधर अपना धंधा देखने में मशगूल थे।

वहीं बार काउंटर पर, एक खूबसूरत और कीमती साड़ी पहने 36 बरस की एक महिला बैठी थी। उसका नाम मधु था। वह बार-बार जाम पे जाम पिए जा रही थी, लेकिन उसकी निगाहों का मरकज़ बार काउंटर से दूर, तन्हाई में सोफा-चेयर पर बैठा एक अकेला शख्स था। वह आदमी बिना किसी औरत की तलब के, अकेले बैठा सिगरेट का कश ले रहा था और बीयर पी रहा था। मधु जानती थी कि वह कोई औरतखोर नहीं है, बस यहाँ नशा करने और शराब पीने के लहजे से ही हमेशा आया करता था। उसने मुस्कुराया।

मधु दिखने में किसी नवविवाहित जैसी लगती थी, लेकिन हकीकत कुछ और थी। वह हाल ही में नाइट क्लब में 'होस्टेस' बनी थी। पैसों की कंगाली, पति द्वारा दिए गए तलाक और अकेले अपनी ज़िम्मेदारी उठाने की नाकामी ने उसे इस गुमनाम धंधे में धकेल दिया था। वह जानती थी कि समाज और क्लब के मर्द उस जैसी औरतों को किस गंदी नज़र से देखते हैं। कुछ शराबी तो इतने क्रूर होते थे कि जलती हुई सिगरेट तक ऐसी औरतों के जिस्म पर बुझा देते थे। हालांकि, अब तक उसे जो एक-आध क्लाइंट मिले थे, वे उसकी बेपनाह खूबसूरती और हाई-प्रोफाइल कॉल गर्ल से अलग, एक पढ़ी-लिखी अमीर घराने की इज़्ज़तदार महिला जैसी बातचीत देखकर उससे तमीज़ से पेश आए थे।

मधु एक बेहद स्वाभिमानी और आत्मसम्मान से भरी महिला थी। हालांकि उसने मजबूरी के चलते इस गुमनाम पेशे को चुना था, लेकिन उसके भीतर का ज़मीर अभी भी ज़िंदा था। किसी की 'रखैल' का ओहदा लेना उसे मानसिक रूप से नागवार गुज़र रहा था। अतीत में उसे एक बुजुर्ग क्लाइंट मिला था, जो उसे अपनी रखैल बनाकर सारी धन-दौलत और जायदाद उसके नाम करने को तैयार था। वह चाहता था कि मधु सिर्फ उसी की होकर रहे और किसी और मर्द के साथ सोने के वो सख्त खिलाफ था। वह उसे बार-बार समझाता था। लेकिन मधु जानती थी कि उस बुजुर्ग का एक जवान बेटा था। उसे डर था कि अगर वह हामी भरती है, तो वह जवान बेटा समाज में उसकी और भारी बेइज्जती करेगा, साथ ही वह मधु की जान का दुश्मन भी बन सकता था। अपने आत्मसम्मान और इस खौफ के कारण उसने उस बुजुर्ग का प्रस्ताव ठुकरा दिया और उससे कांटेक्ट तोड़ लिया। नतीजा यह हुआ कि उसे वैसा कद्रदान क्लाइंट दोबारा नहीं मिला, आमदनी घट गई, और वह आर्थिक रूप से परेशान रहने लगी।

तभी सोचते हुए मधु के कंधे पर किसी ने भारी हाथ रखा। एक मूंछों वाला शराबी आदमी उसे देखकर हँस रहा था। उसके बदन से तेज़ शराब की गंध आ रही थी, उसने जैकेट पहन रखी थी और उसके उंगलियों में सोने की अंगूठियां जगमगा रही थीं। "मधु... यही नाम है तुम्हारा?"...उसने पूछा, क्लब के ही किसी वेटर या कर्मचारी ने शायद मधु के बारे में उसे बताया था।

मधु ने झटके से उसका हाथ अपने कंधे से हटाया, "आप शायद होश में नहीं हैं। मैं कोई मधु नहीं हूँ। मैं यहाँ सिर्फ अपने पति के साथ ड्रिंक के लिए आई थी।"

"हाहाहा... पति?" शराबी ज़ोर से हँसा, "मैं तो होश में हूँ पर मदहोश होना चाहता हूँ। इतनी रात गए तुम जैसी पतिव्रता औरत का यहाँ होना और ड्रिंक की ख्वाहिश... ये तो रास नहीं आता। वैसे, तुम्हारे पतिदेव कहीं नज़र नहीं आ रहे, कहीं तुम्हें छोड़कर किसी और जवान लड़की के चक्कर में तो नहीं चले गए...जैसे इस वक्त मैं आया हूँ!"

"माइंड योर टंग मिस्टर! क्या बड़े घर की औरतें क्लबिंग नहीं करतीं? यहाँ से फुट लीजिए, वरना अगर उन्होंने आपको देख लिया तो ठीक नहीं होगा," मधु ने पैर पटकते हुए कहा और आगे बढ़ने लगी।

उसे उस आदमी का साथ कतई बर्दाश्त नहीं हो रहा था। आज उसे कोई ढंग का क्लाइंट मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह सीधे क्लब से बाहर निकल गई। सीढ़ियाँ उतरकर, दूर गली में भौंकते कुत्तों की आवाज़ों के बीच वह तेज़ कदम बढ़ाती हुई ऑटो तलाशने लगी। रात काफी ज़्यादा होने के कारण ऑटो मिलना आसान नहीं था। तभी एक तेज़ गाड़ी उसके आगे आकर रुकी। वही मूंछों वाला शराबी गाड़ी से उतरा और उसके पास आया।

"अरे क्या हुआ मैडम? आपके पति तो वाकई आपको छोड़कर चले गए! कोई नहीं, हम हैं ना?" उसने इस बार कसकर मधु की चूड़ियों से भरी कलाई को थाम लिया,

"ज़्यादा नखरे मत करो। साला, जानता नहीं हूँ क्या कि तुम कौन हो? पैसे भी दुगने दूँगा और फुल ऐश कराऊँगा। हम तीन दोस्त हैं, दो साले पूरी तरह टुल होकर पास के होटल में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं कि कब मैं तुम्हारे जैसी माल लेकर आऊँ!"
 
"मिस्टर, आई सेड लीव माय हैंड, वरना मैं पुलिस बुला लूँगी!" मधु चिल्लाई।

"हूँ! पुलिस कब से धंधेवालियों की ड्यूटी करने लगी? ज़्यादा नखरे मत कर... ओहो, अब समझा! लगती है अभी नई-नई धंधे में उतरी है। शर्म और गहने उतारना मुझे अच्छी तरह आता है, चल मेरे साथ!"

मधु ने गुस्से में उसके हाथ को अपने नाखूनों से नोंच दिया, जैसे उसे कोई छूत की बीमारी लग गई हो। इससे पहले कि वह संभलता, मधु ने कसकर एक करारा थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया—"इतना ही आग बुझाने का शौक है अपने दोस्तों का और खुद का, तो अपनी बीवी या बहन को लेकर जा!"

थप्पड़ खाते ही शराबी का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। वह किसी भूखे बाघ की तरह मधु पर झपटा, "ठहर जा साली!"
वह मधु पर हाथ उठाने ही वाला था कि तभी अंधेरे में से एक मज़बूत मर्दाना हाथ ने हवा में ही उस शराबी का हाथ दबोच लिया। शराबी ने अपनी गुलाबी, नशेड़ी आँखों से उस शख्स को देखा। मधु ने फौरन पहचान लिया—यह वही बार काउंटर के पास अकेला बैठा रहने वाला शख्स था। उसे वहाँ देखकर मधु को बड़ी राहत मिली।

"ए, हाथ छोड़ मेरा!" शराबी ने ललकारते हुए धमकी दी।

"क्यों? मर्द नहीं है क्या जो खुद छुड़ा नहीं सकता? अभी तो एक औरत के पीछे बड़ा मर्द बन रहा था?" उस अकेले शख्स ने चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान लाते हुए कहा।

शराबी पूरी ताकत से अपनी कलाई छुड़ाने लगा, पर उस शख्स की पकड़ किसी फौलाद जैसी थी। शराबी ने फौरन अपना दूसरा मुक्का चलाया, पर उस शख्स ने गज़ब की फुर्ती दिखाई। उसने न सिर्फ मुक्के के वार को दूसरे हाथ से रोक लिया, बल्कि उसकी बांह को मरोड़ते हुए उसकी हथेली को घुमा दिया और पलक झपकते ही उसके पीछे जा खड़ा हुआ। शराबी का सारा नशा एक पल में हिरन हो गया। उस शख्स ने खींचकर एक प्रचंड घूंसा शराबी की कनपट्टी पर और फिर दो-तीन बार उसके मुँह पर बुरी तरह मारा। चौथा वार उसने अपने घुटने को मोड़ते हुए सीधे शराबी के पैरों के बीच (गुप्तांग पर) किया।

शराबी आदमी उकडू होकर बैठ गया, उसकी आँखें पीड़ा से बाहर आने को हो गईं। वह जींस के ऊपर से ही अपने गुप्तांग को थामे दर्द से दोहरा हो गया।

उस शख्स ने अपनी जैकेट की आस्तीन को ऊपर किया और एक चमचमाता हुआ पहचान पत्र उसके मुँह के आगे कर दिया—"inspector diler from crime branch special unit officer"।

शराबी होश खोने ही वाला था कि दिलेर का परिचय देखकर बुरी तरह घबरा गया। दिलेर ने उसे पैर से एक ज़ोरदार ठोकर मारी, "ए, उठ! उठ साले!"

शराबी का नशा और गुस्सा अब सिर्फ गिड़गिड़ाहट में बदल चुका था। वह हाथ जोड़ने लगा। दिलेर ने गुर्राते हुए कहा, "अगर इस क्लब के या इस औरत के आस-पास दोबारा दिखा, तो सोच लेना।"

"मा... मालूम नहीं था कि ये आपके साथ हैं। मा... माफ़ कर दीजिए," शराबी हकलाया।

"दफा हो यहाँ से, वरना ऐसा अंदर करूँगा कि दोबारा बाहर की हवा नहीं देख पाएगा! दिखना मत आगे से यहाँ!" दिलेर ने हड़काया।

दिलेर के धमकाते ही वह शराबी गिरता-पड़ता, लंगड़ाते हुए किसी तरह अपनी गाड़ी में बैठा और गाड़ी को ऐसे भगा ले गया कि यह जा वो जा।

दिलेर ने शांत होकर अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली। उसने अपना लाइटर जलाना चाहा पर वह काम नहीं कर रहा था। तभी मधु ने आगे बढ़कर अपना लाइटर जलाकर उसकी सिगरेट की तरफ बढ़ाया। दिलेर सिगरेट मुँह में दबाए मधु को घूरता रहा, फिर कश खींचते हुए सिगरेट जला ली।

मधु ने सन्नाटा तोड़ा, "बहुत देर से नोटिस कर रही थी... आज ना दुआ, ना सलाम, बस एक कोने में बैठे थे।"

दिलेर ने धुएं का छल्ला छोड़ते हुए कहा, "तुम्हें भी तो नोटिस किया। दस दफा समझाया है, पर सब इस भेजे के ऊपर से निकल जाता है। मना किया था ना कि इतनी रात गए यहाँ आना अच्छे घर की औरतों का काम नहीं है।"

"मैं और अच्छी औरत? गाली दे रहे हो मुझे? क्या तुम नहीं जानते कि मैं क्या हूँ?" मधु ने आहत होकर कहा।

"अभी भी वक्त है मधु, इस पेशे से खुद को दरकिनार कर लो, वरना आगे सिर्फ तकलीफें हैं। ये ऐसा घिनौना पेशा है कि औरतें अपने ज़ख्मों की असीम जलन को बर्दाश्त करने के लिए अपने प्राइवेट पार्ट पर शराब तक उड़ेल देती हैं," दिलेर की आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था।

मधु उदास हो गई, वह गुमसुम खड़ी रही। दिलेर ने दो-तीन कश और लिए और आगे बढ़कर मधु का हाथ थाम लिया। मधु ने कोई विरोध नहीं किया। वे दोनों दिलेर की पुलिस जीप में सवार हुए और दिलेर ने गाड़ी को मुख्य सड़क पर दौड़ा दिया।

मधु ने गाड़ी चलाते दिलेर को देखा और पूछा, "तुम शादी क्यों नहीं कर लेते? कब तक यूँ रात गए ऐसे क्लबों में आकर शराब पियोगे? किसी दिन ज़्यादा पीकर गाड़ी चलाई तो एक्सीडेंट हो जाएगा।"

दिलेर ने ठंडी सांस ली, "मैंने अपनी परवाह करनी छोड़ दी है मधु। क्योंकि परवाह वो करते हैं जिनका कोई अपना होता है।"

मधु की मुलाकात दिलेर से पहले भी कई दफा हो चुकी थी। दिलेर उसे बाकी मर्दों से बिल्कुल अलग लगा था। वह उसके साथ हमेशा एक सच्चे दोस्त की तरह पेश आता था। उसने कभी अपनी पुलिसिया ताकत का या मधु की मजबूरी का नाजायज फायदा नहीं उठाया था। वह हमेशा उसे यह धंधा छोड़ने को कहता था। उधर, दिलेर को शराब की भयंकर लत थी। जितना मधु उसके बारे में जान पाई थी, कहानी बेहद दर्दनाक थी। दिलेर एक बेहद निष्ठावान और ईमानदार पुलिस अफसर था जिसने कई बड़े मुज़रिमों को सलाखों के पीछे भेजा था। ऐसे ही एक खूंखार मुज़रिम को एनकाउंटर में मार गिराने के चलते, उस मुज़रिम के सगे भाई ने बदला लेने के लिए एक सोची-समझी साज़िश रची और एक भयानक ट्रक एक्सीडेंट में दिलेर की बीवी और उसके छोटे बच्चे को मार डाला था। जज़्बात के सैलाब में बहकर दिलेर ने कानून अपने हाथ में लिया, उस हत्यारे को ढूँढा और सरेआम गोली मार दी। इसके बाद उसे सस्पेंड कर दिया गया था। वह नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं कर पाता था, इसलिए दो-तीन बार पहले भी सस्पेंड हो चुका था। लेकिन जब भी महकमे को किसी उलझे हुए मर्डर के केस को सुलझाना होता, वे दिलेर को वापस 'फ्लाइंग स्क्वाड दस्ते' की स्पेशल मर्डर यूनिट में रीहायर कर लेते थे। आजकल उसके पास ज़्यादा काम नहीं था, इसलिए वह अकसर ऐसे बार और क्लबों में पाया जाता था। वह मधु की मजबूरी को दिल से समझता था।

मधु ने दुखी होकर कहा, "मैं चाहकर भी यह धंधा नहीं छोड़ पाई दिलेर। अगर अच्छी नौकरी तलाश करने गई भी, तो या तो मिली नहीं, और अगर मिली... तो वहाँ बैठे इज़्ज़तदार लोग भी इन क्लब के अय्याशों की तरह मेरा फायदा उठाना चाहते थे।"

"हमेशा जवान तो नहीं रहोगी मधु, तब क्या करोगी?" दिलेर ने पूछा।....मधु ने आँखें तरेरकर दिलेर को देखा,

"तब की तब देखूँगी, या फिर हुआ तो तुम्हारी बातों पर अमल करूँगी।"

 "वैसे... आज भी कोई क्लब में नहीं मिला?"
 
दिलेर सामने देखते हुए ड्राइविंग करता रहा। मधु मुस्कुराई, "तुम मुझ पर नज़र रख रहे थे? ओहो, मैं भूल गई थी... तुम तो 'सुराग-ए-सानी' हो।"

"जानती हो, तुम्हें कोई मिलता क्यों नहीं?"....वो सीधा ड्राइविंग करता हुआ गंभीर आवाज़ में बोला।

"क्यों? क्या मैं बूढ़ी लगती हूँ या खूबसूरत नहीं हूँ?" मधु ने खिड़की से बाहर देखते हुए उदास लहजे में पूछा।

"क्योंकि तुम वैसी चाल-चलन वाली धंधेबाज़ औरत नहीं, बल्कि एक शरीफ घराने की औरत लगती हो," दिलेर ने स्टेयरिंग घुमाते हुए कहा, "नापाक मर्द हमेशा नापाक औरत ढूँढता है, तुम जैसी शरीफ औरत मिलना तो उसके लिए सौभाग्य की बात है।"

"मैं भी तो नापाक हूँ दिलेर..." मधु के स्वर में आत्मग्लानि थी।

"नापाक तुम्हारी किस्मत तुम्हें बना रही है, तुम खुद हो नहीं। वरना अभी मुझसे झगड़कर तुम उस शराबी के साथ किसी होटल के कमरे में होती। उस जैसे अब तक न जाने कितने नशेड़ी, शराबी और गंदे मिजाज़ के लोगों को पटाकर तुम अपना काम निकाल रही होतीं।"

"मैं इतनी गिरी हुई नहीं हूँ इंस्पेक्टर, जो किसी की भी दिलजोई का सामान बन जाऊँ," मधु ने तमककर कहा। उसका स्वाभिमान इस घिनौने पेशे में भी पूरी तरह ज़िंदा था। वह मजबूरी में यहाँ ज़रूर थी, पर किसी की 'रखैल' या खिलौना बनना उसके ज़मीर को कतई गँवारा नहीं था।

"हाहाहा..." दिलेर हल्की आवाज़ में हँसा, "तभी तो कहा कि तुम नापाक नहीं हो और न ही इस पेशे की औरत लगती हो। जो अब तक किया, वो सिर्फ एक मजबूरी थी। चाहो तो अब भी खुद को बदल सकती हो। फिर कहोगी कि कोई नौकरी नहीं मिलती... पर एक वजह और भी है। तुम अकेली हो, किसी अच्छे इंसान को देखकर उससे शादी क्यों नहीं कर लेती?"

"मुझसे कौन शादी करेगा? अब तो और नहीं... पहले विधवा और अब धंधेवाली! कौन हाथ थामेगा मेरा? अच्छा, मुझे इतना कुछ समझा रहे हो, तो तुमने खुद क्यों नहीं किया?" मधु ने पलटकर दिलेर की आँखों में झांका।

दिलेर पहले मुस्कुराया। वह देर रात की अंधेरी, सुनसान सड़कों पर देखते हुए गाड़ी चलाता रहा, फिर उसने भारी आवाज़ में कहा, "नहीं कर सका... इतना आसान नहीं था मेरे लिए।"

"तो वैसे मेरे लिए भी तो आसान नहीं है। मैं अपने मरे हुए पति के सिवा किसी और को इस दिल में जगह नहीं दे सकती, चाहे मैं कितनी ही तन्हा रहूँ। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई और मर्द मेरी जिंदगी में नहीं आ सकता... कितने ही आए और गए, पर तुम भी तो रहे, कभी गए नहीं।"

दिलेर ने चौंककर उसकी तरफ देखा। मधु का चेहरा लज्जा और शर्म से लाल हो गया, उसे अहसास हुआ कि जज़्बात में बहकर उसने कुछ ज़्यादा ही कह दिया था। दिलेर मुस्कुराया और बात का रुख मोड़ते हुए बोला, "कहो, कहाँ छोड़ूँ तुम्हें?"

"अब मैं लाउंज नहीं जा सकती। वहाँ की मालकिन इतनी रात गए दरवाज़ा नहीं खोलेगी, और जाऊँगी तो सौ सवाल करेगी। मुझे मेरी एक सहेली के यहाँ छोड़ दो, वो भी मेरी तरह अकेली रहती है।"

दिलेर ने गाड़ी की रफ़्तार थोड़ी धीमी की, "पता है मधु... मैंने हमेशा तुम्हें एक दोस्त की तरह माना। लेकिन सच कहूँ तो तुम्हारे अक्स में मुझे उसकी याद आती है, जो कभी मेरे दूधमुंहे बच्चे की माँ थी और मेरा हमेशा ख्याल रखती थी।"

मधु उसे एकटक देखती रही, "कभी कहा नहीं तुमने यह बात।"

"मैं कोई दूध का धुला नहीं हूँ मधु। मुझमें भी बहुत सी खामियाँ हैं, कई औरतों के साथ सोया हूँ...पर ईमानदारी से कहूँ तो तुम्हें देखकर कभी हवस नहीं जागी। तुम मुझे आज भी वही मासूम दिखती हो, जो अभी नई-नई विधवा हुई हो... ये लो।"

उसने अपनी जेब से नोटों से भरा एक लिफाफा मधु की तरफ बढ़ा दिया।

मधु ने चिढ़कर कहा, "फिर से? मैंने तुम्हें मना किया था ना? क्या तुम मुझ पर फिर से तरस खाकर ये सब दे रहे हो?"

"तरस खाता तो इससे बड़ी रक़म नज़र के तौर पर देता," दिलेर ने उसे टोकते हुए कहा, "लेकिन मैं वो नहीं हूँ। ना ही मैं तुम्हारे साथ हमबिस्तर होने की कोई फीस भर रहा हूँ। ऐसा गंदा सवाल अपने दिल में भी मत लाना। यह एक मुश्किल घड़ी में, एक दोस्त की तरफ से अपनी खास दोस्त के लिए महज़ एक मदद है... कोई कर्ज़ा नहीं, कोई अहसान नहीं।"

हर बार की तरह दिलेर के पास मधु को लाज़वाब करने का हुनर था। मधु ने बिना खोले वो लिफाफा अपने पर्स में रख लिया और पूछा, "आजकल क्या कर रहे हो?"

"कुछ खास नहीं... छोड़ो वो बदमज़ा किस्सा," दिलेर ने अपनी सस्पेंशन और महकमे की बात टालनी चाही।

"तुम मुझे बदलना चाहते हो, मुझे अपनी बीवी का दर्ज़ा देते हो, यह जानते हुए भी कि मैं एक धंधेवाली हूँ!" मधु ने भावुक होकर कहा।

दिलेर ने झटके से जीप रोकी और अपनी उंगली मधु के होठों पर रख दी। मधु उसे कड़ाके की ठंड में फटी आँखों से देखने लगी। दिलेर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "शशश... मुझे बर्दाश्त नहीं होगा अगर तुम खुद को वो कहो, जो मैं अपनी बीवी के मुँह से कतई सुनना बर्दाश्त नहीं करता था।"

मधु का सिर झुक गया। जब दिलेर ने कुछ और नहीं कहा, तो मधु ने धीरे से अपना हाथ दिलेर की जांघ पर रख दिया। सन्नाटे में उसकी चूड़ियों की खनक गूंज उठी। दिलेर और मधु, दोनों एक-दूसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। मधु जानती थी कि दिलेर चाहकर भी खुद पहल करने वालों में से नहीं था, और वह खुद भी नहीं चाहती थी कि दिलेर उसकी किसी हरकत को गलत समझे या सोचे कि वह पैसों के बदले उसे उकसा रही है। आज तक की मुलाकातों में वे कभी एक-दूसरे के इतने करीब नहीं आए थे, लेकिन आज वो हो रहा था जिसकी उम्मीद दोनों छोड़ चुके थे।

दिलेर आगे बढ़ा, उसने मधु के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरा और अपना चेहरा उसके करीब ले आया। मधु ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं। पलक झपकते ही मधु की ज़ुल्फ़ों ने जैसे दिलेर के चेहरे को ढक लिया। रात के उस सुनसान इलाके में, उस जीप के भीतर वे दोनों एक-दूसरे के होठों से इस कदर जुड़े कि वक्त जैसे ठहर गया। काफी समय बाद जब वे अलग हुए, तो मधु की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं, और दिलेर की आँखों में गुलाबी डोरे खिंच आए थे। मधु खुद को नॉर्मल करने की कोशिश करने लगी।

सुबह की चिड़ियों की चहचहाहट से जब मधु की नींद टूटी, तो उसने खुद को बिस्तर पर पाया। पास ही सोफे पर बैठा दिलेर जागकर अंगड़ाई ले रहा था। उसने मुस्कुराकर मधु की तरफ देखा, फिर उठा और दो कप गरमा-गरम कॉफी बनाकर ले आया।

"अभी सवेरा पूरी तरह नहीं हुआ है।खैर... मुझे अपना फोन दो," दिलेर ने बात का रुख मोड़ा।

मधु ने अपना फोन उसे सौंप दिया। दिलेर कुछ देर फोन की स्क्रीन पर उंगलियां चलाता रहा, फिर उसने एक खास एप्लीकेशन खोलकर मधु को दिखाया।

"यह एक बेहद गोपनीय ऐप है, इसके बारे में सबको नहीं पता होता। सरकारी महकमे के चलते इसकी अवेयरनेस मैंने कई दफा सुनी थी। इसमें मेरा कांटेक्ट पहले नंबर पर सेव है। जब भी तुम किसी मुसीबत में हो, तो बस इस ऑप्शन के 'ग्रीन डॉट' को दबा देना। यह एक SOS सिग्नल की तरह मेरे फोन पर रिंग देगा। तुम जहाँ भी होगी, मैं आसानी से तुम्हारी लोकेशन ट्रैक करके वहाँ पहुँच जाऊँगा। गॉट इट?"

दिलेर ने जैसे ही फोन वापस किया, उसकी नज़र गैलरी के एक फोल्डर पर पड़ी जिसमें मोहित (मधु के स्वर्गीय पति) की तस्वीर थी।

मधु ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "शादी के वक्त की तस्वीर है... किसे पता था कि साथ इतना कम होगा?"

फिर उसने झिझकते हुए मधु की आँखों में देखा, "क्या कल जो कुछ भी हुआ...उसके लिए तुम्हें कोई दुःख तो नहीं है?"

मधु का चेहरा लज्जा से लाल हो गया। उसने फौरन फोन बंद किया और खामोशी से दिलेर को देखने लगी।

मधु ने गंभीर होकर कहा, "तुम्हारा इरादा अगर मेरा फायदा उठाना होता, तो शायद अब तक हम एक ही पलंग पर होते, और न ही मैंने तुम्हें रोका होता। लेकिन कल जो कुछ हुआ, उसमें सिर्फ मेरी नहीं, तुम्हारी भी रज़ामंदी थी। मैं सिर्फ इतना जानना चाहती हूँ... कि क्या मैं वाकई इस प्यार की हक़दार हूँ?"

"मुझे उस दिन का इंतज़ार रहेगा जब तुम ये सब कुछ छोड़कर, अपनी तमाम संकीर्ण सोच को दरकिनार करोगी और मुझसे आकर खुद कहोगी कि 'दिलेर, मैं वाकई बदलना चाहती हूँ'।"

"मैं डरती हूँ दिलेर...कि कहीं तुम अपना इरादा न बदल दो?" मधु की आवाज़ कांपी।

"आई एम द मैन ऑफ माय वर्ड। अगर वक्त चाहिए, तो ले लो," दिलेर ने दृढ़ता से कहा।

मधु बिना कुछ कहे मुस्कुराई और वहाँ से विदा हो गई। पीछे दिलेर असमंजस में खड़ा उसे देखता रहा।

रास्ते पर चलते हुए मधु ने मन ही मन खुद से कहा, "दिलेर... तुम चाहे मुझे जितना भी हक़ दे दो, मैं इस काबिल नहीं हूँ। पहल तो मर्द करता है, मैं भी इंतज़ार करूँगी कि तुम एक दिन खुद कह दो कि 'मैं तुम्हारे साथ हमेशा के लिए रहना चाहता हूँ।' पर मुझे ऐसा लगता है कि वो दिन शायद कभी नहीं आएगा। मैं तुम्हारी बची-कुची जिंदगी खराब नहीं करना चाहती थी कि लोग कहें कि तुमने एक धंधेवाली से शादी कर ली। पर अगर वाकई तुम मुझसे वैसा ही सच्चा प्यार करते हो जैसा मैं तुमसे...तो उस दिन मैं सब कुछ भूलकर तुम्हारी हो जाऊँगी।"

रात का घना अंधेरा एक बार फिर उस वीरान कॉटेज पर छा चुका था। पिछले २४ घंटों से वह ७० साल का बुजुर्ग वैज्ञानिक—प्रोफेसर रोड्रिगेज—बिना पलक झपकाए उस खौफनाक मिशन में जुटा हुआ था। उसने दीपक की लाश के माथे के उस गहरे घाव को टांके लगाकर सिल दिया था। लाश को सड़ने से बचाने के लिए उसने उसे बर्फ में प्रिजर्व करके रखा था।

अब दीपक का नग्न शरीर उस ठंडी, पथरीली मेज़ पर सीधा लेटा हुआ था। पास ही एक कार्डियक मॉनिटर रखा था, जिसकी तारें दीपक की बेजान उंगलियों से जुड़ी थीं। लोहे के एक ऊंचे हैंगर पर खून का एक पाउच लटक रहा था, जिससे निकली नली दीपक की सूखी नसों में इंजेक्ट हो रही थी। मॉनिटर की स्क्रीन पर दिल की धड़कन (Heart Rate) बिल्कुल गायब थी और पल्स कब की बंद हो चुकी थी। प्रोफेसर ने दीपक की उन पथराई, डरावनी आँखों को अपने हाथों से बंद किया।

उसने कांपते हाथों से उस हरे वायरस के सैंपल को निकाला और उसमें एक खास रासायनिक यौगिक 'पॉलीमायोसिन-बी' का मिश्रण तैयार किया। जैसे ही वह केमिकल वायरस में मिला, पास के पिंजरे में बंद वह चूहा खौफ से किलबिलाने और उछलने लगा।

बूढ़ा प्रोफेसर शैतानी मुस्कान के साथ बड़बड़ाया, "कई साल गुज़ारे हैं मैंने... इस बदलते दौर में नए-नए फॉर्मूलों को ईजाद होते देखा है। और आखिरकार, इस 'पॉलीमायोसिन' केमिकल का असर इस सुसुप्त वायरस पर हो ही गया! यह कोई आम वायरस नहीं है...यह एक जीता-जागता ऐसा सूक्ष्म जीव है जो मरे हुए इंसान के रुके हुए दिल और दिमाग की कोशिकाओं को दोबारा सक्रिय कर सकता है, उसे जीवनदान दे सकता है! उन सोवियत डॉक्टरों ने बेवकूफी की थी जो १९७० में सीधा इंसानी शव पर अनियंत्रित प्रयोग कर बैठे। मैंने इतने दशकों तक इस वायरस के अवशेषों को थोड़ा-थोड़ा कर बचाया, और आज... आज यह सफल होगा।"

इतना कहकर, प्रोफेसर ने उस चमकीले हरे सिरिंज को उठाया और उसकी सूई को बेजान पड़े दीपक की गर्दन की मुख्य नस (Jugular Vein) में धीरे-धीरे चुभा दिया। उसने पूरा लिक्विड दीपक के भीतर इंजेक्ट कर दिया।

वैक्सीन देने के बाद प्रोफेसर सांस रोककर किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा। लेकिन एक मिनट बीता, दो मिनट बीते...शरीर में कोई हलचल नहीं हुई। लाश वैसी ही ठंडी और बेजान पड़ी रही। प्रोफेसर हड़बड़ा गया, उसका संयम टूटने लगा।

वह लाश के ऊपर झुककर उसे झकझोरने लगा, "उठिए दीपक साहब! डॉक्टर दीपक मखिजा...जागिए!" उसने उसे ऐसे आवाज़ दी मानो वह किसी गहरी नींद में हो।
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«Reply #4 on: November 01, 2026, 12:25:34 AM »
Chapter 4

यह एक अजीब इत्तफाक था। दीपक उसी प्रतिष्ठित सरकारी रिसर्च लैब का मुख्य ट्रस्टी था जहाँ प्रोफेसर रोड्रिगेज कभी सीनियर फैकल्टी के तौर पर काम करते थे। प्रोफेसर जिस सीक्रेट प्रोजेक्ट पर सालों से छिपकर काम कर रहे थे, आज उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा एक ताज़ा लाश के रूप में खुद दीपक बनने जा रहा था।

जब मॉनिटर पर हार्ट रीडिंग में कोई उतार-चढ़ाव नहीं दिखा, सीधी लकीर बदस्तूर चलती रही, और न ही उस ब्लड पाउच से खून दीपक की नसों में प्रवेश कर पाया, तो प्रोफेसर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह नाकामी और पागलपन में चिल्लाने लगा। उसने लैब में रखी कांच की बोतलों, बीकर्स और केमिकल्स को उठा-उठाकर फर्श पर पटकना शुरू कर दिया।

"नहीं! नहीं! नहीं! इतने सालों की मेहनत, इतना वक्त और इतना सारा पैसा खर्च करने के बाद यह नाकाम नहीं हो सकता! इंसानों पर इसका असर कैसे नहीं होगा? यह सरासर मेरी हार है...मेरी नाकामी है...नहीं!!!"

वह पागलों की तरह चीख उठा। उसकी बरसों की हिम्मत जवाब दे रही थी। वह बौखलाया हुआ कभी दीपक की लाश को देखता, तो कभी उस खामोश मॉनिटर की स्क्रीन को। उसने भागकर पास रखे कंप्यूटर की स्क्रीन ऑन की। डेटा शीट पर साफ़ दिख रहा था कि वायरस तेजी से दिमाग और कलेजे में घर कर रहा था, पर बाहर से लाश बिल्कुल सुन्न थी। प्रोफेसर ने अपना सिर थाम लिया और वहीं फर्श पर बैठ गया। तभी उसके दिमाग में आया कि शायद उसकी पुरानी थ्योरी नोट्स में कोई कमी रह गई थी। वह तुरंत लैब से बाहर निकला और कुछ और नोट्स की स्टडी करने के लिए कॉटेज के ऊपरी हिस्से की तरफ भागा।

अब लैब में पूरी तरह सन्नाटा पसरा था। केवल बीकर में उबलते नीले तरल पदार्थ की सुड़सुड़ाहट की आवाज़ आ रही थी।

तभी...अचानक उस सन्नाटे को चीरती हुई मॉनिटर की 'बीप... बीप... बीप...' की तेज़ आवाज़ गूंज उठी! कंप्यूटर स्क्रीन पर ग्राफ तेजी से ऊपर-नीचे होने लगा। वह वायरस दीपक के पूरे नर्वस सिस्टम में फैल चुका था। यद्यपि हार्ट रीडिंग अभी भी एक सीधी लकीर में ही थी, क्योंकि उसका दिल धड़क नहीं रहा था... लेकिन लाश के भीतर एक भयानक हलचल शुरू हो चुकी थी।

अचानक... मेज़ पर पड़ी वह लाश झटके से सीधे पीठ के बल उठ बैठी!

दीपक की आँखें पूरी तरह खुल चुकी थीं। वे आँखें डरावनी, सुर्ख लाल थीं, जिनमें से आँख की पुतलियां पूरी तरह गायब हो चुकी थीं—सिर्फ एक खौफनाक अंधापन था। उसने अपनी गर्दन को एक झटके से दाएँ-बाएँ घुमाया, मानो वह जायज़ा ले रहा हो कि वह कहाँ है। उसका पूरा बदन बर्फ की तरह सफेद पड़ चुका था, और उसके नग्न शरीर की चमड़ी के नीचे काली-नीली नसें किसी केंचुए की तरह भयानक तरीके से कुलबुलाती और उभरती हुई पूरे बदन पर दौड़ रही थीं।

वह पथरीली मेज़ से नीचे उतरा और उसने अपना एक-एक पैर फर्श पर रखा। तभी उसकी रीढ़ की हड्डी से कड़कड़ाने की आवाज़ आई। उसकी वे सुर्ख लाल आँखें पास ही पिंजरे में कैद उस चूहे पर जाकर टिक गईं, जो डर के मारे पिंजरे की सलाखों से चिपका हुआ था। वह चूहा उस भयानक जीव को इंसानी रूप में साक्षात मौत की तरह देख रहा था।

दीपक का जबड़ा धीरे से खुला और एक हिंसक घुरघुराहट लैब में गूंज उठी। उसकी वे सुर्ख-सफेद आँखें और ज़्यादा भयानक होने लगीं, और देखते ही देखते, उसकी आँखों के कोनों से गाढ़ा, काला खून रिस-रिसकर उसके गालों पर बहने लगा...रात गहराने के साथ ही बाहर का तूफ़ानी मौसम और ज़्यादा विकराल रूप ले चुका था। वीरान कॉटेज के चारों तरफ़ भूखे आवारा कुत्तों के एक साथ रोने की खौफनाक आवाज़ें गूंज रही थीं, जिसने माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा और खौफ भर दिया था।

प्रोफेसर रोड्रिगेज अपनी लाइब्रेरी में बैठे थे। टेबल लैंप की मद्धम पीली रोशनी के आगे वे एक पुरानी किताब के पन्नों को बार-बार पलट रहे थे। उनके दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी। उनके कैलकुलेशन के मुताबिक सब कुछ बिल्कुल सटीक था। उन्होंने एक्यूरेट फॉर्मूले और साइबेरियाई वायरस का मिलाप किया था, तो फिर कहीं कोई कमी या गलती की गुंजाइश नहीं थी। तो क्या इसका मतलब यह था कि यह वायरस इंसानों पर कारगर साबित नहीं हो सकता?

विज्ञान के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण थे जहाँ कुछ वायरस केवल जानवरों के कांटेक्ट पर उन्हें प्रभावित करते हैं, लेकिन इंसानों पर उनका कोई असर नहीं पड़ता। इंसानों के अंदर का डीएनए संरचनात्मक रूप से इतना जटिल और सक्षम होता है कि वह ऐसे बाहरी हमलों से लड़कर उन्हें बेअसर कर देता है। प्रोफेसर को लगा कि शायद करोड़ों साल पुराना यह वायरस, तमाम मॉडिफिकेशन्स के बावजूद, इंसानी सेल्स को एक्टिवेट करने में नाकाम रहा था। इसका सीधा सा मतलब था कि उनके जीवन के इतने सालों का गुप्त प्रोजेक्ट अब एक झटके में पूरी तरह बर्बाद हो चुका था।

वे इस बात को कतई बर्दाश्त और स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उनका ईगो और जुनून उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। वे अपनी कुर्सी से उठे और कॉटेज से बाहर निकल आए। बाहर बर्फीला, सर्द कोहरा चारों तरफ फैला हुआ था। वातावरण में एक अजीब सी भारीपन थी।

प्रोफेसर दबे पाँव धीरे-धीरे अपनी अंडरग्राउंड लैब की तरफ बढ़े। जैसे ही वे लैब के लोहे के दरवाज़े के करीब पहुँचे, उन्हें अंदर से कुछ असामान्य सी आवाज़ें सुनाई दीं। कांच के बर्तनों के टूटने और कंक्रीट पर किसी भारी चीज़ के घिसटने की आवाज़ें आ रही थीं। प्रोफेसर का दिल अचानक ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वे अपनी सांसें रोककर, दीवार की आड़ लेकर चोरी-छिपे अंदर की तरफ झांकने लगे।

जो कुछ उनकी आँखों के सामने था, उसे देखकर मानो उनका कलेजा मुँह को आने लगा।

मेज़ पर पड़ी लाश वहाँ नहीं थी। डॉ. दीपक मखिजा का नग्न शरीर फर्श पर खड़ा था और वह पागलों की तरह लैब की महँगी मशीनों, बीकर्स और टेस्ट ट्यूब्स को तोड़-फोड़ रहा था। उसके गले से एक बेहद खौफनाक दहाड़ निकल रही थी। उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई इंसान सदियों की एक लंबी और गहरी मौत की नींद से अचानक होश-ओ-हवास में जागा हो, और खुद को इस हाल में पाकर पूरी तरह बौखला रहा हो।

लेकिन, वह दीपक कहीं से भी नहीं लग रहा था। ना ही उसका व्यवहार नॉर्मल था। उसकी आँखें पूरी तरह सुर्ख सफेद हो चुकी थीं—मानो आँखों की पुतलियाँ और काले घेरे गायब होकर केवल मांस का एक उबला हुआ सफ़ेद हिस्सा रह गए हों। उसके पूरे नग्न शरीर की सफेद पड़ चुकी चमड़ी के नीचे काली-नीली नसें केंचुए की तरह भयानक तरीके से कुलबुलाती और उभरती हुई दौड़ रही थीं।

यह बिल्कुल वैसा ही खौफनाक नज़ारा था, जैसा ५६ साल पहले, साल १९७० में रूस की उस गुप्त लैब के पहले एक्सपेरिमेंट में प्रोफेसर ने अपनी आँखों से देखा था, जब उस मृत चूहे के शरीर पर नीली नसें उभरी थीं और खुद उन्होंने उसे एसिड डालकर जलाया था।

इसका सीधा सा मतलब था कि वायरस ने इंसानी शरीर पर अपना असर दिखा दिया था। इसके बावजूद कि प्रोफेसर ने इसमें अपना नया रासायनिक फॉर्मूला मिक्स किया था ताकि वह नियंत्रण में रहे, वह जीव नॉर्मल नहीं था। लेकिन वह किसी आम ज़ोंबी की तरह सुस्त भी नहीं था। वह एक ताकतवर, खूंखार हैवान बन चुका था।

दीपक ने अपनी सुर्ख सफेद आँखों से चारों तरफ देखा। फिर उसने अपने फौलाद जैसे मजबूत हाथों को उठाया और लैब की मोटी कांच वाली खिड़की पर दे मारा। एक ही झटके में खिड़की का भारी पल्ला चौखट से उखड़कर बाहर फर्श की तरफ जा गिरा। वह उस टूटी हुई खिड़की के रास्ते लैब से बाहर निकल गया। वह नग्न हालत में ही घने अंधेरे और मूसलाधार बारिश के बीच कॉटेज के भारी लोहे के फाटक को एक हाथ से ठेलता हुआ मुख्य हाईवे की सूनी सड़क की तरफ बढ़ गया।

प्रोफेसर का शरीर डर से कांप रहा था, लेकिन उनका वैज्ञानिक कौतूहल और डर दोनों उन्हें मजबूर कर रहे थे। वे दबे पाँव, अंधेरे का फायदा उठाते हुए दीपक के पीछे-पीछे चलने लगे। वे उसके बहुत करीब नहीं जाना चाहते थे ताकि उसकी नज़रों में आने से बच सकें।

दीपक सड़क के ठीक बीचों-बीच पहुँच चुका था। तभी सामने से आ रही एक पीली टैक्सी की तेज़ हेडलाइट्स की रोशनी सीधे उसके नग्न शरीर पर पड़ी। ड्राइवर ने अचानक ब्रेक मारा। गाड़ी चीखती हुई ठीक दीपक के आगे आकर रुक गई। रास्ता बिल्कुल सुनसान था और रात की उस घड़ी में दूर-दूर तक कोई तीसरा साया नहीं था।

टैक्सी ड्राइवर ने खिड़की से मुँह बाहर निकाला और गुस्से में चिल्लाया, "हे! कौन है तू साले? बीच सड़क पर रात गए नंगा होकर, शराब पीकर घूम रहा है? शर्म नहीं आती? मेरे रास्ते से हट!"

लेकिन दीपक अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। जब वह सड़क से नहीं हटा, तो ड्राइवर का गुस्सा बढ़ गया। वह गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला और दीपक के करीब आया। लेकिन जैसे ही उसने दीपक को करीब से देखा, उसे लकवा मार गया।

दीपक का नग्न, बर्फ जैसा सफेद शरीर, उसकी पुतली-विहीन सुर्ख सफेद आँखें और उसके मुँह से निकलती 'गर-गर' की दोहरी, भयानक आवाज़ को सुनकर ड्राइवर खौफ से पीला पड़ गया। वह अपनी जान बचाने के लिए पीछे की ओर भागा।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दीपक ने पलक झपकते ही एक शेर की तरह छलांग लगाई और अपने मजबूत हाथों की गिरफ्त में ड्राइवर को दबोच लिया।

पीछे झाड़ियों में छिपे प्रोफेसर रोड्रिगेज की आँखों को अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह एक ऐसा दिल दहला देने वाला दृश्य था जो किसी के भी होश उड़ा दे।
दीपक ने अपनी उंगलियों के नाखूनों को ड्राइवर के ज़िंदा जिस्म के भीतर गहरे गाड़ दिया। उसने ड्राइवर की गर्दन को अपने दाँतों से ऐसे काटा, जैसे कोई भूखा जंगली जानवर मांस के लोथड़े को नोच रहा हो। देखते ही देखते, एक खौफनाक आवाज के साथ ड्राइवर का शरीर छटपटाने लगा। वह हैवान या उसके शरीर के भीतर मौजूद वह वायरस, उस ज़िंदा ड्राइवर की मांसपेशियों और मांस को अंदर ही अंदर सोख रहा था। कुछ ही सेकंड्स के भीतर, वह पूरा का पूरा इंसान एक सूखे, बदरंग कंकाल में तब्दील हो गया और बेजान होकर सड़क के कीचड़ में ढेर हो गया।

जैसे ही दीपक ने उस इंसानी मांस और मांसपेशियों को पूरी तरह सोखा, चमत्कार हुआ। उसके शरीर में एक त्वरित बदलाव आया। उसकी त्वचा का सफेदपन गायब होने लगा, नीली कुलबुलाती नसें चमड़ी के नीचे वापस शांत हो गईं। उसकी सुर्ख सफेद आँखों में काली पुतलियाँ वापस लौट आईं। देखते ही देखते, वह हैवान दोबारा से एक सामान्य इंसान यानी असली 'डॉ. दीपक मखिजा' के रूप में तब्दील हो गया।

दीपक ने अपनी सामान्य हो चुकी अजीब-ओ-गरीब नज़रों से ज़मीन पर पड़े उस कंकाल को देखा। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह आगे बढ़ा, टैक्सी का दरवाज़ा खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। उसने गाड़ी स्टार्ट की और उसे हाईवे पर इतनी सहजता से ड्राइव करता हुआ ले गया, मानो कुछ हुआ ही न हो और वह एक आम इंसान हो।

पीछे खड़े प्रोफेसर सन्न थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। उनका यह खतरनाक एक्सपेरिमेंट आखिरकार विज्ञान के किस खौफनाक छोर पर जा पहुँचा था? वह वायरस मांस की भूख से संचालित हो रहा था। प्रोफेसर अब चाहकर भी दीपक का पीछा नहीं कर सकते थे और न ही उससे दोबारा मुलाकात करने की हिम्मत रख सकते थे, क्योंकि अब उन्हें खुद अपनी जान का सीधा खतरा महसूस हो रहा था।

इसलिए, प्रोफेसर रोड्रिगेज ने इस खौफनाक राज पर हमेशा-हमेशा के लिए गहरी चुप्पी साध लेने का ही निश्चय किया।

अगली सुबह का वक्त था।

लोकल थाने का माहौल हमेशा की तरह व्यस्त था, तभी डॉ. दीपक का वही पर्सनल गार्ड  बदहवास हालत में वहाँ रिपोर्ट दर्ज कराने पहुँचा। थाने का एसएचओ अपनी कुर्सी पर बैठा कुछ कागज़ात देख रहा था। उसने गार्ड को ऊपर से नीचे तक देखा और कड़े लहजे में पूछा, "हाँ तो... यह बताओ कि डॉक्टर साहब कब से गायब हैं?"

गार्ड ने हाथ जोड़ते हुए कहा, "साहब, कल पूरी रात से गायब हैं। वो कल सुबह के गए ३:०० बजे के लगभग अपनी गाड़ी से बंगले से बाहर निकले थे। उन्होंने खिड़की से अपनी घड़ी वाला हाथ दिखाकर मुझे जल्दी गेट खोलने का इशारा भी किया था, लेकिन कुछ कहे नहीं साहब। पर जब वे रात को आए थे, तो बिल्कुल शराब में डूबे हुए थे। उनके साथ गाड़ी में एक औरत भी थी।"

SHO ने अपनी मूँछों पर ताव देते हुए एक गहरी हुंकार भरी, "हूँ... तो तुम यह बता सकते हो कि उस औरत का हुलिया कैसा था?"

गार्ड ने थोड़ा सोचते हुए, मेघना का सविस्तार (बारीकी से) हुलिया बताना शुरू किया—उसका रंग, उसकी साड़ी और उसकी कद-काठी। SHO चुपचाप अपने पेन से एक डायरी पर नोट करता रहा और उसकी बातें सुनता रहा।

बयान पूरा होने पर SHO ने लापरवाही से मुस्कुराते हुए उससे कहा, "ठीक है, हम जांच-पड़ताल करेंगे। हो सकता है कि डॉक्टर साहब का मूड बदल गया हो और वह उस औरत के साथ कहीं लंबी लॉन्ग-ड्राइव पे निकल गए हों। रईस लोगों के ऐसे शौक होते हैं।"

"नहीं साहब!" गार्ड ने डरते हुए अपनी आशंका ज़ाहिर की, "मैं इतने साल से उनके यहाँ नौकरी कर रहा हूँ। मानता हूँ कि... कहना तो नहीं चाहिए साहब, लेकिन डॉक्टर साहब औरतों को कपड़ों की तरह बदलते हैं। हर रात रोज़ एक नई लड़की उनके बिस्तर पर होती है। लेकिन इस बार कुछ अजीब हुआ है साहब। ना तो वो वापस आए, ना ही उन्होंने कोई फोन कॉल किया...और साहब, अब तो दोपहर होने को आई है। मुझे तो कुछ बड़ी गड़बड़ लगती है।"

SHO का चेहरा अब थोड़ा गंभीर हुआ। उसने कागज़ात साइड में रखे और कहा, "ठीक है, हम तफ्तीश करेंगे। वैसे भी वो कोई आम शख्सियत नहीं हैं, इस शहर के जाने-माने रसूखदार डॉ. दीपक मखिजा हैं। हालांकि, उनके बारे में मैं भी अच्छे से जानता हूँ। तुम फिक्र मत करो, अपने काबिल दोस्त को ढूँढने का ज़िम्मा अब मेरा है।"

SHO के आदेश पर पुलिस की कार्रवाई बेहद तेज़ हो गई। दिन ढलने को आया, लेकिन दीपक का कोई सुराग नहीं मिला। पुलिस की टीमें उसके दफ़्तर, उसके पुराने क्लिनिक् और उन तमाम जगहों पर पहुँचीं जहाँ अमूमन उसका उठना-बैठना था।

जांच-पड़ताल के दौरान एक टीम उसी आलीशान नाइट क्लब में पहुँची। वहाँ के बारमैन से जब कड़ाई से पूछताछ की गई, तो उसने एक बड़ा सुराग उगल दिया। बारमैन ने बताया कि लापता होने वाली रात दीपक को तीन लोगों की एक टोली के साथ देखा गया था, जिनके साथ उसकी पैसों को लेकर भारी बहसबाज़ी हुई थी। बाद में, उन्हीं में से एक शख्स की बीवी के साथ दीपक अपनी गाड़ी में बैठकर निकला था, जबकि वह पति वहीं क्लब के बाहर पीछे ही रह गया था।

इस सुराग ने पुलिस के कान खड़े कर दिए। क्लब के रिकॉर्ड्स और पूछताछ की मदद से पुलिस ने उन तीनों दोस्तों के बारे में सारी मालूमात (जानकारी) निकाल ली। पुलिस की फ्लाइंग स्क्वाड ने फौरन दबिश देकर उन दो दोस्तों को धर-दबोचा जो उस रात क्लब में मौजूद थे।
थाने के बंद कमरे में जब उनसे कड़ाई से पूछताछ की गई और पुलिस का डंडा चला, तो वे डर के मारे कांप उठे। उन्होंने रोते हुए वह सब कुछ उगल दिया जो उस रात जुए की बाज़ी और बीवी के सौदे को लेकर दीपक और उनके दोस्त के बीच हुआ था।

अब यह बात शीशे की तरह साफ़ हो चुकी थी कि यह कोई साधारण गुमशुदगी का मामला नहीं था, बल्कि यह केस किसी बहुत बड़े और संगीन जुर्म की तरफ साफ़ दस्तक दे रहा था। पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया, क्योंकि वे जानते थे कि डॉ. दीपक के गायब होने या उन्हें कुछ होने पर, उनके ऊंचे ओहदों पर बैठे रसूखदार दोस्त पुलिस प्रशासन पर भारी दबाव बना सकते थे।

आगे की तफ्तीश में पुलिस को मालूम चला कि वह औरत, जिसका नाम मेघना था, और उसका पति—दोनों अपने घर से गायब थे। हालांकि, पुलिस का रुख अभी तक डॉ. दीपक के आलीशान मैंशन के अंदरूनी बेडरूम की तरफ नहीं हुआ था, क्योंकि वहाँ के सारे सबूत और खून के धब्बे तो मेघना के पति ने पहले ही पूरी तरह मिटा दिए थे। फिर भी, अगर पुलिस को वहाँ कोई छोटा सा भी सुराग मिल जाता, तो मेघना और उसके पति की पूरी करतूत का भंडाफोड़ हो जाता।

उन्हें जल्द ही शहर से बाहर कुछ फ़ासले दूर रेलवे फाटक के पास दीपक की गाड़ी खाली लावारिस हालत में मिली, सुराग कुछ हासिल न हुआ, न डिक्की में दीपक की बंधी लाश का कोई निशान मिला, क्योंकि वो मोटे रजाई और आखिर इतनी रात गए इतने दूर शहर के पास ऐसी लावारिस गाड़ी छोड़कर आखिर चला कहाँ गया था, और वो औरत कहाँ गायब हुई थी? जिसका अब पति भी गायब था... यह वही गाड़ी थी जिसमें उस रात मेघना और उसका पति जो दीपक के भेष में उसके गार्ड को चकमा देकर उसकी लाश डिक्की में डालकर मैंशन से भागने में कामयाब रहा था।

पर शायद, होनी को कुछ और ही मंज़ूर था।

शहर से कहीं कोसों दूर...

हाईवे के किनारे एक बेहद वीरान और सुनसान इलाका था। वहाँ पास ही एक छोटा सा ढाबा पड़ता था। रात के अंधेरे में, गाड़ी आधी राह में ठिकाने लगाने के बाद पूरे दिन सरकारी परिवहन निगम बस के धक्के खाते और भाड़ा करके किराये की गाड़ी के ज़रिए शहर से काफी मील दूर निकल आ चुके थे, रात का वक़्त था मेघना और उसका पति उसी ढाबे पर अपना सादा डिनर खत्म कर रहे थे। वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि अंधेरे की आड़ में कोई भयानक साया उन पर अपनी खूनी निगाहें गड़ाए बैठा था।
डिनर खत्म करके वे दोनों बाहर निकले। अचानक मेघना ठिठक गई और उसने हाईवे की सूनी सड़क की तरफ देखा।

उसके पति ने उसके कंधे पर हाथ रखा, "क्या देख रही हो मेघना?"

मेघना ने अंधेरे में सरसराती गाड़ियों को देखते हुए डर से ना में सर हिलाया, "कुछ नहीं... चलिए।"

वे दोनों पास ही बने एक छोटे से मोटल की तरफ बढ़े। वह ऑफ-सीज़न का वक्त था, इसलिए मोटल में काम करने वाले कर्मचारी और कस्टमर्स ना के बराबर थे। वह एक छोटा और थोड़ा बदनाम सा मोटल था, जहाँ पारिवारिक लोगों की आवाजाही बिल्कुल नहीं होती थी।

कमरे के भीतर पहुँचकर मेघना की फिक्र और बढ़ गई। उसने खिड़की के पर्दे गिराए और अपने पति से पूछा, "हमें और कितने दिन यहाँ छिपकर ठहरना होगा? पुलिस तो अब तक हमारे बारे में सब कुछ मालूम कर चुकी होगी। क्या पता दीपक के गायब होने की वजह वो हमें ही मानें? क्योंकि आखिरी बार क्लब में उसके साथ हमें किसी ने तो ज़रूर देखा होगा।"

पति ने आगे बढ़कर मेघना को ढांढस बंधाया, "तुम फिक्र मत करो मेघना। वो चाहकर भी हमारे खिलाफ कोई सुराग नहीं निकाल पाएंगे। अच्छा ही हुआ जो हमने आधे रास्ते में ही उसकी गाड़ी को ठिकाने लगा दिया। वैसे भी, जब तक पुलिस को यह शक होगा कि उसकी गुमशुदगी में हमारा हाथ है, तब तक हम इस शहर से कई सौ मील दूर निकल चुके होंगे। कल सुबह ही हमें यहाँ से दूसरे राज्य के लिए ट्रेन पकड़नी है, और वहाँ से बाय-रोड आगे का सफर तय करेंगे। कुछ साल हमें ऐसे ही छिपकर गुज़ारने होंगे ताकि यह मामला पूरी तरह ठंडा हो जाए। वैसे भी, जब कोई सबूत ही नहीं होगा, तो गवाही किस काम की? जब तक उन लोगों को उसकी लाश ही नसीब नहीं होगी, वे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।"

"पर मेरा मन अजीब सी आशंका से बैठा जा रहा है..." मेघना ने रोते हुए कहा।

"डरो नहीं, हम यहाँ पूरी तरह सुरक्षित हैं। अब सब कुछ भूल जाओ... तुम्हारे बदन को छूने वाले उस दरिंदे को मैंने खुद अपने हाथों से जहन्नुम रसीद कर दिया है। और मैं तुमसे वादा करता हूँ मेघना, आज के बाद मैं जुए को कभी हाथ तक नहीं लगाऊँगा। खुदा ना खस्ता कल को कुछ हुआ तो मैं सारा जिम्मा अपने ऊपर ले लूंगा। हम एक ही बात पे अड़े रहेंगे कि हमें जान का खतरा था और कई कर्जदारों से बचने के लिए हमें यूँ भागना पड़ा। वैसे भी लाश के बिना पुलिस हमारे खिलाफ क्या सबूत जुटा सकती है? सिवाय शक के! और उसके गार्ड को तो मैंने खुद बेवकूफ बनाया है कि मैं यानी उसका मालिक दीपक तुम्हें लेके रात गए निकल गया। रही बात तुमपर संदेह की... तो मैं हूँ ना।"

पति की ये बातें सुनकर मेघना की आँखों से आँसू छलक पड़े और वह तसल्ली से उसके सीने से, उसकी बाँहों में आ गई।

रात धीरे-धीरे बीतने लगी। लेकिन उसी रात, बाहर का तूफ़ान एक बार फिर बिगड़ने लगा था। मूसलाधार बारिश की मोटी बूंदें मोटल की टिन की छतों पर ढोल की तरह बजने लगी थीं।

तभी... गीली मिट्टी और कीचड़ पर चलते हुए किसी के भारी कदमों की आहट उस कमरे के दरवाज़े की तरफ बढ़ी। वह खौफनाक साया दरवाज़े के ठीक बाहर आकर ठहर गया। चारों तरफ घाघ अंधेरा था और रह-रहकर कड़कती बिजली का शोर दिल दहला रहा था।

उस साये ने कमरे की दाईं तरफ की खिड़की के शीशे से अंदर झांका। अंदर मद्धम रोशनी में मेघना और उसका पति एक रजाई के भीतर एक-दूसरे के आगोश में डूबे सो रहे थे। खिड़की के बाहर खड़े उस जीव के गले से अचानक 'ग्रर्र... ग्रर्र...' की दोहरी, डरावनी आवाज़ निकलने लगी।

तभी... दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई।

उस आवाज़ से मेघना की नींद अचानक टूट गई। उसने घबराकर अपने पति को जगाया और चादर को अपने बदन पर लपेटती हुई बौखलाई नज़रों से दरवाज़े की तरफ देखने लगी। बाहर इतना बिगड़ा मौसम था कि खिड़की से कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था।

"इतनी रात गए... इस तूफ़ान में कौन हो सकता है?" फिक्रमंद मेघना ने कांपती आवाज़ में अपने पति से कहा। पति का मिज़ाज भी उस वक्त खौफ से भर गया था।
उसने खुद को संभाला, "डरो मत मेघना, हो सकता है मोटल का कोई कर्मचारी हो। तुम बिस्तर से बाहर मत निकलना।"

वह एहतियात बरतता हुआ दबे पाँव दरवाज़े के पास आया। उसने पहले अंदर से आवाज़ दी, "कौन है बाहर?"
लेकिन आवाज़ के जवाब में कोई शब्द नहीं आया, बल्कि दरवाज़े पर दोबारा और तेज़ दस्तक हुई।

मेघना का पति दरवाज़ा खोलने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा ही रहा था कि किसी अनहोनी और घोर अनिष्ट की आशंका से मेघना बिस्तर से चिल्लाई, "नहीं! दरवाज़ा मत खोलना! रुक जाओ!"

अपनी बीवी की चीख सुनकर पति का हाथ हवा में ही ठहर गया। वह डरकर दरवाज़े से कुछ मीटर पीछे हटकर खड़ा हो गया। कमरे में सिर्फ उनकी सांसों की आवाज़ आ रही थी। दरवाज़े पर फिर ज़ोरदार दस्तक हुई, लेकिन उन्होंने अंदर से कोई जवाब नहीं दिया। फिर अचानक... दस्तक आनी बंद हो गई।

सवाल यही था कि आखिर दरवाज़े के उस पार कौन खड़ा था?
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«Reply #5 on: November 01, 2026, 12:27:40 AM »
कुछ ही घड़ियाँ बीती थीं कि अचानक पूरे कमरे का माहौल एक खौफनाक चीख से दहल उठा। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते,भयानक आवाज़ के साथ मोटल का वह मजबूत लकड़ी का दरवाज़ा अपनी चौखट से पूरी तरह टूटकर सीधे कमरे के फर्श पर आ गिरा।

दरवाज़े को एक ही झटके में उखाड़ देने वाली उस असीम, राक्षसी ताकत को देख उन दोनों के होश उड़ गए।
सामने कटी हुई खिड़की के मुहाने पर डॉ. दीपक मखिजा खड़ा था। लेकिन वह दीपक नहीं था। उसका पूरा नग्न शरीर बर्फ जैसा सफेद था, उसकी आँखें सुर्ख सफेद थीं और उसकी त्वचा के नीचे काली-नीली नसें केंचुए की तरह भयानक रूप से उभरकर कुलबुला रही थीं।

वह एक भूखे भेड़िये की तरह अंदर झपटा और सीधे मेघना के पति पर टूट पड़ा। मेघना ज़ोर से चिल्लाई, "बचाओ!!!"

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हैवान दीपक ने मेघना के पति को दबोचा और अपने नुकीले दाँतों से उसकी गर्दन को सीधे काट के फाड़ दिया। वह पागलों की तरह उसके ज़िंदा जिस्म के मांस और रक्त को अंदर ही अंदर सोखने लगा। पति के गले से खून का एक तेज़ फव्वारा छूटा और पूरा फर्श लाल खून से सन गया।

मेघना इस अजीब और रोंगटे खड़े कर देने वाले खौफनाक नज़ारे को देखकर पूरी तरह सुन्न हो गई। वह बिस्तर से उतरी और बदहवास हालत में नग्न बदन ही कमरे के दूसरे कोने की तरफ भागने लगी। लेकिन दीपक ने अपने शिकार को छोड़ दिया। उसने मेघना के कांपते और अधमरे हो चुके पति को फर्श पर पटका और एक झटके में मेघना की तरफ झपटा।

उसने मेघना को हवा में उठाया और सीधे बिस्तर पर पटक दिया। वह पागलों की तरह उसकी गर्दन पर अपने दाँत गड़ाने की कोशिश करने लगा। मेघना दर्द और डर से चिल्ला रही थी, पुकार रही थी, और अपने दोनों हाथों से उस हैवान को खुद से दूर धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

लेकिन दीपक की पकड़ किसी शिकंजे जैसी थी। उसने मेघना के दोनों बाज़ुओं को उसकी छाती से अलग करके बिस्तर पर दबोच दिया और उसकी गर्दन और छाती पर बेतहाशा पागलों की तरह काटते हुए, अपनी उंगलियों को उसके पेट के भीतर बुरी तरह धंसा दिया।

फर्श पर पड़ा उसका पति अपनी आँखों के सामने अपनी बीवी को तड़पते और दम तोड़ते देख रहा था। मेघना दर्द के मारे बिस्तर पर अपने पैर पटक रही थी। दीपक किसी राक्षस की तरह उसके ज़िंदा जिस्म को खा रहा था, उसकी मांसपेशियों को सोख रहा था। मेघना के गर्म खून के छींटे उड़कर फर्श पर पड़े उसके पति के चेहरे पर पड़ रहे थे।

कुछ ही पलों में, जब दीपक मेघना के जिस्म से ऊपर उठा, तो मेघना का हिलना-डुलना बंद हो चुका था। वह हैवान न सिर्फ उसका बेरहमी से बलात्कार कर चुका था, बल्कि उसके शरीर का सारा मांस और मांसपेशियां भी सोख चुका था। मेघना का सुंदर बदन धीरे-धीरे एक सड़े हुए, सूखे कंकाल में तब्दील हो गया।

दीपक ने पलटकर देखा। फर्श पर पड़ा उसका पति भी अपनी पथराई आँखों से अपनी बीवी का यह हश्र देख चुका था और अब उसकी अपनी साँसें भी टूटने की कगार पर थीं। दीपक एक भूखे बाघ की तरह उसके मरते हुए जिस्म पर आ सवार हुआ। उसने अपनी उंगलियों को उसकी गर्दन के भीतर धंसा दिया, और जैसे ही उसने उसके बचे-कुचे मांस को सोखा, दीपक को अपने शरीर की नसों के भीतर उन कीड़ों और वायरस को अजीब तरीके से कुलबुलाते हुए महसूस हुआ। दोनों पति-पत्नी की तड़प हमेशा के लिए शांत हो गई।
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«Reply #6 on: November 01, 2026, 12:28:43 AM »
Chapter 5

कुछ ही मिनटों के भीतर, मोटल में ठहरे चंद अन्य लोग और कर्मचारी दरवाज़ा टूटने की व किसी मर्द और औरत की चीख-पुकार की आवाज़ सुनकर दौड़ते-भागते उस कमरे की तरफ पहुँचे। लेकिन जैसे ही उन्होंने अंदर का नज़ारा देखा, उनकी चीखें निकल गईं।

कमरे के भीतर दो सड़ी हुई, पुरानी दिखने वाली कंकाल जैसी लाशें पड़ी थीं—एक बिस्तर पर और दूसरी खून से सने फर्श पर। चारों तरफ केवल लाल गाढ़ा खून बिखरा हुआ था। मोटल में भारी चीख-पुकार और भगदड़ मच गई। मैनेजर ने कांपते हाथों से तुरंत फोन उठाकर पुलिस विभाग को इस वारदात की इत्तिला दी।

लेकिन उन सब की नज़रों से बहुत दूर... वह खौफनाक साया मोटल की सीमा लांघकर हाईवे के घने अंधेरे में विलीन हो चुका था। दो और ज़िंदा इंसानों का मांस सोखने के बाद, दीपक के शरीर में कुलबुलाती वे नीली काली नसें अपने आप गायब हो गईं, उसकी सुर्ख सफेद आँखें वापस सामान्य हो गईं, और वह एक बार फिर एक संभ्रांत, आलीशान दिखने वाले डॉ. दीपक मखिजा के रूप में तब्दील होकर आगे बढ़ गया।

अगले दिन...

यह क्राइम ब्रांच का मुख्य मुख्यालय था, जहाँ एक बंद केबिन के भीतर चीफ के सामने इंस्पेक्टर दिलेर बैठा हुआ था। चीफ का चेहरा इस वक्त बेहद संजीदा और परेशान था। उसने सिगरेट का धुआं छोड़ते हुए दिलेर के सामने मेज़ पर एक बड़ी फॉरेंसिक तस्वीर रखी।

वह तस्वीर उसी अभागे टैक्सी ड्राइवर की थी, जो दो रात पहले शहर के नामचीन इलाके पर जिसकी लाश बुरी हालत में पायी गयी थी,

इन्स्पेक्टर दिलेर ने जैसे ही उस तस्वीर को करीब से देखा, उसके चेहरे पर घृणा और अचरज के भाव एक साथ उभर आए। तस्वीर में दिख रहा पूरा जिस्म पूरी तरह मांस-विहीन होकर एक सूखा कंकाल बन चुका था। दिलेर ने चीफ की तरफ देखते हुए कहा, "यह बहुत अजीब है सर... इस लाश को देखकर ऐसा लगता है मानो यह सदियों पुरानी हो और आज ही किसी पुरानी कबर से खोदकर निकाली गई हो। लेकिन यह मर्डर तो दो दिन पुराना है ना?"

चीफ ने अपनी कुर्सी पर पीछे होते हुए कहा, "हाँ दिलेर। शहर में कुछ बेहद अजीब और खौफनाक घटनाएँ घट रही हैं। और यही नहीं, सबसे अजीब बात तो यह है कि आखिर ऐसे दर्दनाक और नामुमकिन मर्डर के पीछे किस सनकी खूनी का हाथ हो सकता है?"

दिलेर ने थोड़ा सोचते हुए कहा, "हो सकता है सर कि यह किसी खास किस्म की कोई दुर्लभ जेनेटिक बीमारी या कोई अज्ञात मेडिकल इन्फेक्शन हो?"

"हरगिज़ नहीं दिलेर!" चीफ ने उसकी बात को सिरे से खारिज किया, "फॉरेंसिक रिपोर्ट और चश्मदीदों के मुताबिक, वारदात के वक्त लोगों ने उस सुनसान सड़क पर एक खौफनाक, राक्षसी चीख की आवाज़ सुनी थी। जब आसपास के लोग मौके-ए-वारदात पर पहुँचे, तो उस ड्राइवर की लाश इस कदर कंकाल बनी हुई पाई गई। पर टैक्सी गायब थी बहुत दूर जाकर एक गुमनाम रास्ते पे वो लावारिस खड़ी मिली शिनाख्त पर मालूम चला वो चोरी की टैक्सी उसी कत्ल हुए ड्राइवर की थी डीएनए मैच कर रहे हैं, वह उसी ड्राइवर की लाश है। अब तुम ही बताओ दिलेर, कोई किसी की हत्या तो कर सकता है, पर इस तरीके से? यह तो किसी बेहद खतरनाक रसायनिक केमिकल रिएक्शन से ही किया जाने वाला वारदात लगता है। हालांकि, मेडिकल साइंस में ऐसा कोई भी केमिकल आज की तारीख में वजूद में ही नहीं है जो पल भर में मांस को सोख ले।"

"क्यों नहीं हो सकता सर?" दिलेर ने अपनी थ्योरी रखी, "हो सकता है जैसे कोई बेहद खौलता हुआ, गाढ़ा तेज़ाब किसी इंसान पर इस तरह डाला जाए कि उसकी हड्डियाँ तक पिघलने से पहले मांस गल जाए?"

Chief अभी दिलेर की बात पर हामी भरते हुए कुछ और कहना ही चाह रहे थे कि तभी उनकी मेज़ पर रखा हुआ इंटरकॉम फोन ज़ोर से बज उठा।

Chief ने फोन उठाया, "हूँ... हाँ, बोलो। क्या?... ठीक है।"
उन्होंने फोन वापस रखा और दिलेर की तरफ एक गहरी नज़र से देखा।

"दरअसल, मेरे एक पुराने दोस्त का फोन था, जो लोकल इलाके का एसएचओ है। हमारे एक जाने-माने और बेहद रसूखदार डॉ. दीपक मखिजा... क्या कहूँ उसके बारे में, एक नंबर का अय्याश और घटिया आदमी है। वह पिछले कुछ दिनों से संदेहास्पद तरीके से लापता था, उसके गार्ड ने रिपोर्ट भी कराई थी। पर अभी-अभी एसएचओ का फोन आया कि डॉक्टर साहब बिल्कुल सही-सलामत अपने घर वापस लौट आए हैं।"

इंस्पेक्टर दिलेर चुपचाप सुनता रहा। उसने डॉ. दीपक के वापस लौटने की खबर में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई, क्योंकि वह रईसों के ऐसे गायब होने और वापस आने के किस्सों से वाकिफ था। वह शांत बैठा रहा।

तभी...चीफ की मेज़ पर लगा फोन एक बार फिर पूरी ताकत से बज उठा।

Chief ने दोबारा फोन कान से लगाया। जैसे-जैसे वह फोन पर सामने वाले की बात सुनता गया, दिलेर ने नोटिस किया कि चीफ के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ चुका था। उनके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं। चीफ ने बिना कुछ बोले फोन वापस क्रैडल पर रख दिया। इस बार उनका चेहरा पहले से कहीं ज़्यादा संजीदा और खौफज़दा था।

इन्स्पेक्टर दिलेर ने अपनी कुर्सी पर आगे होते हुए पूछा, "क्या बात है सर? सब ठीक तो है ना?"

लाश की तस्वीरें फ़ौरन चीफ़ के कंप्यूटर डेस्क के मॉनिटर पर आईं, जिसका बारीक मुआयना दिलेर ने भी किया।

Chief ने कांपती आवाज़ में कहा, "दिलेर... वैसी ही दो और लाशें मिली हैं। शहर की सीमा से कोसों दूर, हाईवे के पास बने एक गुमनाम मोटल के कमरा नंबर ४०४ से। लाशें इस वक्त फॉरेंसिक वैन से सीधे शहर की तरफ लाई जा रही हैं। उनका भी बिल्कुल वैसा ही हाल है दिलेर... पूरा शरीर बिल्कुल सूखा कंकाल बन चुका है। ऐसा लगता है जैसे किसी एक ही भयानक चीज़ या हथियार से उन दोनों को भी मारा गया हो।"

इन्स्पेक्टर दिलेर की आँखें तंग हो गईं। उसने गंभीर होकर कहा, "सर, जिस तरह से इन लाशों की हालत देखी गई है, पहली नज़र में तो ऐसा लगता है जैसे मारने से पहले किसी ने उन्हें किसी भट्टी में ज़िंदा जलाया हो... लेकिन कपड़ों और हड्डियों पर जलने के कोई निशान नहीं हैं। यह वाकई नामुमकिन है। यकीनन सर, यह किसी बेहद शातिर और खूंखार 'सीरियल किलर' का मामला है जो शहर में खुलेआम घूम रहा है।"

Chief ने हामी भरी, "हाँ दिलेर। मैं भी यही सोच रहा हूँ।"

"वैसे सर... क्या आपने उन दोनों नई लाशों की शिनाख्त की? वे दोनों कौन थे?" दिलेर ने पूछा।

Chief ने मेज़ पर हाथ मारते हुए कहा, "अभी शुरुआती जांच-पड़ताल जारी है दिलेर। मोटल के रजिस्टर से मिले नामों की पुष्टि की जा रही है। बहुत जल्द ही उनकी असली पहचान सामने आ जाएगी।"

इन्स्पेक्टर दिलेर अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ, उसने अपनी जैकेट की आस्तीन को ठीक किया, वह इस रहस्यमयी और खौफनाक सीरियल किलर के केस पर काम करने के लिए अब पूरी तरह से तैयार था। उसे इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि यह केस उसे कहाँ ले जाने वाला था...

                           --------

रात का दूसरा पहर शुरू हो चुका था।

बाहर की सर्द हवाएँ अब कड़ाके की ठंड में तब्दील हो चुकी थीं। सुनसान रास्तों पर आवारा कुत्तों के एक साथ 'हाऊ-हाऊ' करके रोने की भयानक आवाज़ें गूंज रही थीं, जो वातावरण के सन्नाटे को और ज़्यादा खौफनाक बना रही थीं। डॉ. दीपक मखिजा के आलीशान मैंशन में चारों तरफ घाघ अंधेरा पसरा था। बेडरूम के बड़े बिस्तर पर दीपक लेटा हुआ था। उसका जिस्म पसीने से तर था और वह गहरी बेचेनी में बार-बार अपने पहलू बदल रहा था।
नींद की आगोश में उसे एक भयानक दुःस्वप्न दिखाई दे रहा था।

उस ख़्वाब में उसने देखा कि एक तरफ मेघना खड़ी थी और दूसरी तरफ उसकी अपनी मरी हुई बीवी—दोनों बिल्कुल नग्न हालत में उसकी तरफ देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थीं। उनकी हँसी में एक अजीब सा पागलपन था। तभी अचानक, देखते ही देखते उन दोनों के नग्न शरीरों की त्वचा फटने लगी और उनके जिस्मों के भीतर से वही चमकीले हरे, नीले केंचुए जैसे वायरस निकलकर उनके पूरे शरीर पर कुलबुलाने लगे। उन दोनों का मांस सड़ने लगा और उनकी आँखों और मुँह से हज़ारों मैगॉट्स (सफेद कीड़े) उबल-उबल कर बाहर गिरने लगे।

"नहीं!!!" दीपक एक भयानक चीख के साथ झटके से बिस्तर पर उठ बैठा। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं।
होश में आते ही, अचानक उसे अपनी मांसपेशियों और नसों के भीतर एक अजीब, असहनीय कुलबुलाहट का अहसास हुआ। ऐसा लग रहा था मानो चमड़ी के नीचे हज़ारों सुइयां एक साथ चुभ रही हों। वह अपने सिर को पकड़कर हांफने लगा। ना जाने उसके साथ यह क्या हो रहा था। उसे तो अपने अतीत की बस आखिरी इतनी बात याद थी कि जब उस बेडरूम में मेघना के पति ने उसके माथे पर भारी औज़ार से वार किया था, तो वह दर्द के मारे ज़मीन पर औंधे मुँह गिर गया था।

उसके बाद जब उसकी आँख खुली, तो उसे होश ही नहीं था कि वह कहाँ था। वह केवल नंगे हालत में अंधाधुंध ड्राइविंग कर रहा था। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वह विज्ञान के किस भयानक मोड़ पर खड़ा था। लेकिन इस खौफ के बीच, जैसे ही उसके दिमाग में मेघना और उसके पति को तड़पा-तड़पा कर मारने का ख्याल आया, उसके होठों पर एक क्रूर मुस्कान तैर गई। उन दोनों के ज़िंदा मांस को चबाने और उनका खून सोखने की याद ने उसे अंदर से एक असीम, अमानवीय मज़ा दिया था। वह अंधेरे कमरे में अकेले ही ज़ोर से हँस पड़ा।

खुद को शांत करने के लिए उसने सोचा कि वह एक गरम पानी का शावर ले ले। वह लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम की तरफ बढ़ा। उसने बत्ती ऑन की, अपने कपड़े उतारे और शावर के नीचे खड़ा हो गया। जैसे ही उसने हॉट वॉटर के नॉब को घुमाया और उबलता हुआ गर्म पानी उसके शरीर पर गिरा... पल भर में एक चीख बाथरूम की दीवारों से टकराई।

वह गर्म पानी नहीं था... दीपक को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके पूरे शरीर पर खौलता हुआ तेज़ाब उड़ेल दिया हो। वह भयानक जलन से दहाड़ता हुआ सीधा बाथरूम के गीले फर्श पर औंधे मुँह गिर पड़ा। उसका पूरा नग्न शरीर, जो गर्म पानी से तर था, उस पर देखते ही देखते बड़े-बड़े, खौफनाक घाव और फफोले उभर आए, जिनमें से पीला मवाद रिसने लगा।

वह घबराहट और पागलपन में बौखलाता हुआ वापस बेडरूम की तरफ भागा। उसने अलमारी का बड़ा आईना साफ़ किया और अपनी जांघ, अपनी पीठ और अपने पूरे बदन का मुआयना करने लगा। आईने में खुद को देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसका चेहरा एक अजीब, विकृत हैरत में डूब चुका था। उसकी जीभ अपने आप मुँह से बाहर लटक रही थी, और उसकी ज़ुबान के किनारों से गाढ़ा, काला तरल पदार्थ लार की तरह टपक रहा था। लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि इतने बड़े घाव होने और मुँह से काला लार गिरने के बावजूद, उसे कोई शारीरिक कमज़ोरी महसूस नहीं हो रही थी। तभी उसे एक खौफनाक सच का अहसास हुआ। जैसे-जैसे रात बढ़ रही थी, उसके भीतर की भूख एक बार फिर जाग रही थी।

उसने खिड़की के बाहर देखा। सर्द हवाओं के बीच चांदनी रात और उज्जवल होती जा रही थी। आज रात उसे फिर बाहर निकलना था। उसे पता था कि आज की पूरी रात उसे नींद नहीं आने वाली थी। उसके भीतर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, और उसके नसों के कीड़े चिल्ला-चिल्लाकर एक ही चीज़ मांग रहे थे—ताज़ा इंसानी गोश्त, उनका मांस और उनका गर्म खून! अगर उसने जल्द ही किसी ज़िंदा इंसान का शिकार नहीं किया, तो उसके शरीर के भीतर कुलबुलाते ये सूक्ष्म शैतान अंदर ही अंदर उसकी अपनी मांसपेशियों को खाना शुरू कर देंगे।

वह आधी रात को चुपचाप अपने सूने घर से बाहर निकल गया। लेकिन वह अकेला नहीं था। जैसे ही उसने मैंशन का गेट पार किया, घने कोहरे और अंधेरे की आड़ में छिपी दो आँखें उस पर गड़ी हुई थीं। वह कोई और नहीं, बल्कि प्रोफेसर रोड्रिगेज था, जो अपनी इस खौफनाक ईजाद पर छिपकर नज़र रख रहा था।

दीपक हाईवे की सड़कों पर अपनी गाड़ी दौड़ा रहा था। इस बार वह किसी राह चलते ड्राइवर का शिकार नहीं चाहता था। उसे एक ऐसी औरत की तलाश थी जो जवान हो, और जिसका जिस्म पूरी तरह तर-ओ-ताज़ा हो। वह अपनी इस नई, असीमित ताकत की अनुभूति को अपनी नसों में महसूस कर सकता था। उसे पता था कि रात के इस पहर में ऐसा शिकार कहाँ मिलना सबसे आसान था।

उसने गाड़ी का रुख मोड़ा और सीधे 'नरीम पॉइंट' के उसी नामचीन नाइट क्लब के बाहर आकर ब्रेक मारा।

वह अंदर दाखिल हुआ। क्लब में हमेशा की तरह जैज़ म्यूज़िक, रंगीन रोशनियाँ और शराब का दौर जारी था। दीपक को देखते ही पुराने वेटर ने सिर झुकाकर उसका स्वागत किया, "वेलकम बैक, डॉक्टर साहब।"

लेकिन बार काउंटर पर खड़े बारटेंडर ने उसे एक अजीब, संदेहास्पद नज़र से देखा। आखिर देखता भी क्यों न, दिन में ही पुलिस की स्पेशल टीम डॉ. दीपक की गुमशुदगी की बाबत पूछताछ करने वहाँ आई थी। बारटेंडर ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "साहब, आप ठीक हैं? आप कहाँ चले गए थे? पुलिस भी आई थी।"

दीपक ने अपनी पुतलियों को घुमाया और एक ठंडी, बेजान नज़र उस पर डाली। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था, "मैं किसी निजी काम से शहर से बाहर गया था। मुझे मेरी ड्रिंक सर्व करो।"

बारटेंडर ने फौरन उसका पसंदीदा जाम बनाकर उसके आगे रख दिया। सामने रखी तेज़ शराब को दीपक ने बिना रुके एक ही घूँट में अपने हलक के नीचे उतार लिया।

तभी उसकी पैनी निगाहें बार काउंटर से घूमकर सोफों की तरफ गईं, और उसकी नज़र मोना पर ठहर गई। मोना, जो और कोई नहीं बल्कि मधु की पक्की दोस्त और उसी की तरह क्लब में काम करने वाली हम-पेशा होस्टेस थी। जब दीपक ने एक बार आँख भरकर मोना की बेपनाह खूबसूरती को देखा, तो जैसे उसका हैवान उस पर पूरी तरह निहाल हो गया। मोना का यौवन और उसका तर-ओ-ताज़ा शरीर ठीक वैसा ही था जिसकी तलाश दीपक को थी।

वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ मोना के सोफे के करीब पहुँचा। उस वक्त मोना अकेले नहीं थी, उसके पास एक रईस उम्रदराज ग्राहक बैठा था जो उसे अपनी बातों से पटाने की पूरी कोशिश कर रहा था। वह ग्राहक मोना को हाथ पकड़कर डांस फ्लोर पर चलने का ऑफर दे रहा था। मोना असहज थी और उसने उसके साथ जाने से साफ़ मना कर दिया। जब बात नहीं बनी, तो वह ग्राहक बड़बड़ाता हुआ वहाँ से चला गया।

मोना सोफे पर अकेली रह गई। क्लब की कई अन्य लड़कियाँ भी बार काउंटर से दीपक को कातिल अदाओं से देख रही थीं, क्योंकि उसका अमीर रसूख सब जानते थे। लेकिन आज दीपक की आँखों में सिर्फ मोना का अक्स था।

कुछ ही घड़ियाँ बीती थीं कि वह ग्राहक अपने दो-तीन दोस्तों के साथ वापस मोना के पास आया और उस पर अकेले नहीं, बल्कि अपने पूरे ग्रुप के साथ रात गुज़ारने और 'इन्जॉय' करने का गंदा प्रस्ताव रखने लगा। मोना का स्वाभिमान जाग उठा। उसने गुस्से में अपना पैर फर्श पर पटका और उन बदतमीज़ों को खरी-खोटी सुनाती हुई वहाँ से उठकर तन्हाई में पड़े एक कोने वाले सोफे पर जाकर बैठ गई।

दीपक ने यही सही मौका समझा। वह हौले-हौले चलता हुआ मोना के सोफे के पास पहुँचा और उसके ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। उसने मुस्कुराते हुए वेटर को इशारा किया। वेटर ने फौरन आकर मेज़ पर दो महँगे जाम रख दिए।

दीपक ने मोना की उदास आँखों में देखते हुए बेहद मखमली आवाज़ में कहा, "ऐसे दो-कौड़ी के लोगों की संगति में बैठना ही क्यों मोना, जो इंसान की मजबूरी का फायदा उठाना चाहते हों? तुम जैसी खूबसूरत लेडी यहाँ तन्हाई में अच्छी नहीं लगती।"

मोना ने आँखें उठाकर सामने बैठे शख्स को देखा। महंगे सूट, हाथ में महँगी घड़ी और रौबदार चेहरे वाले दीपक को देखकर उसे समझ आ गया कि यह कोई मामूली आदमी नहीं, बल्कि शहर का कोई बड़ा रईस है। मोना के दिमाग में आया कि अगर इस अमीर आदमी से बात बन जाए, तो उसकी तंगी दूर हो सकती है और एक मोटी रक़म हाथ आ सकती है। वैसे भी वह इस अकेलेपन से थक चुकी थी और उसे किसी ऐसे मर्द का साथ चाहिए था जिसके साथ वह खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। दीपक के रौब को देखकर मोना को कुछ ऐसा ही अहसास हो रहा था।

मोना ने अपनी साड़ी को ठीक किया और मुस्कुराते हुए कहा, "क्यों न हम यह शोर-शराबा छोड़कर कहीं और चलें?"

दीपक की सुर्ख आँखों में एक चमक कौंधी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बिल्कुल, जैसा तुम चाहो।"

कुछ ही समय बाद, दीपक की गाड़ी शहर के एक बेहद शांत और आलीशान रेस्टोरेंट के बाहर रुकी। वे अंदर गए। दीपक ने मोना की पसंद पूछते हुए उसके लिए लजीज तंदूरी चिकन और कई शानदार डिशेज़ ऑर्डर दीं।

खाना मेज़ पर सज चुका था। मोना बड़े चाव से खाने लगी, लेकिन उसने नोटिस किया कि सामने बैठा दीपक एक भी निवाले को हाथ तक नहीं लगा रहा था। वह बस एकटक उसकी गर्दन और उसके होठों को घूरे जा रहा था।

मोना ने हैरान होकर चम्मच प्लेट पर रखा, "अरे! कुछ तो खाओ। ऐसे क्यों चुपचाप भूखे बैठे मुझे देख रहे हो? क्या तुम्हें भूख नहीं है?"
दीपक ने अपनी बेजान आँखों से उसकी सुंदर गर्दन, खुले गले से उसके ब्लाउज से उभरते छातियों को देखा और दबी घुरघुराहट के साथ कहा, "मैं खाऊँगा...तुम्हें खाऊँगा..."

मोना उसकी इस बात को एक रोमांटिक मज़ाक समझकर ज़ोर से हँस पड़ी, "ओहो! बड़े रोमांटिक मिज़ाज के हो।"

मोना का दिल रखने के लिए दीपक ने ज़बरदस्ती तंदूरी चिकन का एक छोटा सा निवाला उठाया और अपने मुँह में रख लिया। लेकिन जैसे ही उसने उस मांस को चबाया, उसके शरीर के भीतर एक भयानक विस्फोट हुआ।

अचानक... दीपक के हाथ से चम्मच छूटकर प्लेट पर गिरा। उसकी आँखें खौफनाक तरीके से उबलकर बाहर आने को हुईं, और उसका गला पूरी तरह रुंध गया। मोना उसकी यह अचानक बदली हरकत देखकर बुरी तरह घबरा गई, "क्या हुआ? आप ठीक तो हैं?"

दीपक हाथ से इशारा करता हुआ बिना बोले वॉशरूम की तरफ भागा। उसने टॉयलेट का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और कमोड पर झुककर भयानक उल्टियाँ करने लगा।
नमक! उस खाने में नमक था।

नमक का केमिकल रिएक्शन उस वायरस के लिए किसी जानलेवा तेज़ाब जैसा था। दीपक के मुँह से खून की जगह काले रंग का गाढ़ा थक्केदार लार और अजीब सा तरल फर्श पर गिरने लगा। उसका दम घुट रहा था और उसकी नसें फटने को हो रही थीं। उसने किसी तरह पानी से अपना मुँह साफ़ किया, गहरी सांसें लीं और खुद को पूरी तरह नॉर्मल करके वापस टेबल पर आया।

मोना ने फिक्रमंदी से उसका हाथ छूना चाहा, "तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना? क्या हुआ अचानक?"

दीपक ने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाते हुए कहा, "हाँ, मैं...मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मेरी फिक्र मत करो। क्यों न हम अब यहाँ से चलें?"

"लेकिन इतना सारा खाना?" मोना ने टेबल की तरफ देखा।

"तुम चाहो तो अपना डिनर खत्म कर सकती हो, पर मेरी तबीयत थोड़ी सी नासाज़ है, मुझे फ्रेश एयर की ज़रूरत है।" दीपक ने कहा।

मोना को उसके प्रति गहरी सहानुभूति महसूस हुई। उसने जल्दी-जल्दी कुछ और निवाले खाए, पर उसका मन भी अब खाने में नहीं लगा। उसने अपना पर्स उठाया, "चलिए, चलते हैं।"

दीपक ने आगे बढ़कर बड़ी शिद्दत से मोना की बाँहों में अपनी बाँह डाली और वे रेस्टोरेंट से बाहर आ गए।

गाड़ी स्टार्ट हुई। आधे रास्ते तक गाड़ी की बंद खिड़कियों के बीच उन दोनों ने एक-दूसरे से कोई बात नहीं की।

ड्राइविंग करते हुए धीरे-धीरे दीपक को अहसास हुआ कि जैसे-जैसे रेस्टोरेंट का वो नमक उसके सिस्टम से बाहर हो रहा था, वह खुद के भीतर दोबारा एक असीम और खौफनाक ताकत महसूस कर रहा था। अचानक उसे अपने गले और जबड़े के पास उभरती हुई नीली नसें महसूस हुईं। उसने तुरंत अपने एक हाथ से अपनी गर्दन को कसकर दबाया ताकि नसें बाहर न दिखें, और ड्राइविंग सीट से मुड़कर मोना की तरफ देख एक ठंडी मुस्कान दी।

लेकिन बेखबर मोना को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आगे उस आलीशान मैंशन में उसके साथ क्या होने वाला था।

दीपक की महँगी गाड़ी उस वीरान इलाके में स्थित उसके विशाल मैंशन के लोहे के फाटक के सामने आकर रुकी। केबिन में सोया हुआ गार्ड हड़बड़ाकर जागा। उसने देखा कि डॉक्टर साहब के साथ आज फिर गाड़ी में एक नई औरत बैठी थी। नींद में धुत होने के कारण उसने बिना कुछ सोचे जल्दी से गेट खोल दिया और वापस अपने केबिन में जाकर सो गया।

दीपक ने गाड़ी को लंबी राहदारी (पैसेज) में पार्क किया। वे दोनों गाड़ी से बाहर निकले। मोना ने रात के सन्नाटे में खड़े उस आलीशान, वीरान मैंशन को एक बार हैरत और प्रशंसा से देखा।

दीपक ने पीछे से आकर उसके करीब होते हुए हल्की हँसी के साथ पूछा, "कैसा लगा यह छोटा सा गरीबखाना?"

मोना सम्मोहित सी बोली, "बहुत ही खूबसूरत है। वैसे... आप पेशे से क्या करते हैं? आपने बातों-बातों में मुझे अपने बारे में ज़्यादा कुछ बताया नहीं, बस अपना नाम ही बताया है।"

दीपक उसके और करीब आया। उसकी सांसें ठंडी थीं। उसने मोना की कमर पर हाथ रखते हुए कहा, "अभी तो पूरी रात अपनी है मोना... सिर्फ नाम ही क्यों? मैं तुम्हें बड़ी तफ़्सील से अपने और अपने काम के बारे में सब कुछ अंदर बताऊंगा।"

मोना ने उसकी आँखों में देखा, "क्लब में इतनी सारी औरतें थीं जो आपकी तरफ कातिल इशारे कर रही थीं। यह जानते हुए भी कि वे मुझसे कहीं ज़्यादा खूबसूरत थीं, आपने सिर्फ मुझे ही क्यों चुना?"

तभी दीपक ने अपनी एक उंगली मोना के होठों पर रख दी, "शशश... जो लेडी स्पेशल होती है ना, मैं उसे ही अपने दिल में जगह देता हूँ।" उसने मोना का हाथ पकड़ा, "यकीन न हो, तो हाथ रखो मेरे दिल पर..."

मोना ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ दीपक के कीमती सूट के नीचे, उसके सीने पर रख दिया।

लेकिन... हाथ रखते ही मोना का चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ गया। उसने एक झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसके चेहरे पर खौफ और हैरत के भाव थे। दीपक को तुरंत अपनी भयानक भूल का अहसास हुआ कि उसने जज़्बात में आकर क्या कर दिया था। उसने झट से मोना की कलाई पकड़ी और उसके हाथ को अपने सीने से पूरी तरह अलग कर दिया।
वह जबरन हँसते हुए बोला, "क्या बात है मोना? ऐसे क्यों चौंक गईं?"
मोना ने थरथराते हुए कहा, "हैरत की बात है... तुम्हारा दिल...तुम्हारा दिल धड़क नहीं रहा दीपक! सीना बिल्कुल शांत है!"

दीपक ने एक पल के लिए अपनी आँखों की पुतलियों को कड़ा किया, फिर बात को मज़ाक में उड़ाते हुए ज़ोर से हँसा, "हाहाहा! अरे तुम भी ना... मेडिकल साइंस में ऐसा होता है मोना। दुनिया में कई ऐसे इंसान होते हैं जिनका दिल बाईं तरफ न होकर दाईं तरफ होता है, या थोड़ा पीछे हटा होता है। मेरी धड़कन बहुत मद्धम है।"

मोना ने एक गहरी सांस ली और इस बात को महज़ एक मज़ाक और अपना वहम समझकर हंसते हुए टाल दिया। बात आगे नहीं बढ़ी।

लेकिन अब दीपक पूरी तरह संजीदा हो चुका था। उसके भीतर की भूख अब नियंत्रण से बाहर हो रही थी। उसने कड़े हाथों से मोना की कमर को जकड़ा, मैंशन के भारी दरवाज़े का लॉक खोला और उसे सीढ़ियों से तय कराता हुआ भीतर लेकर आया। जैसे ही वे अंदर दाखिल हुए, हॉल की बत्तियाँ अपने आप जल उठी और दीपक ने पीछे मुड़कर मुख्य दरवाज़े को पूरी ताकत से बंद कर दिया।

कुछ घंटे गुज़र गए।

रात का तीसरा पहर बीत रहा था। बाहर तूफ़ान और भयानक रूप ले चुका था। मूसलाधार बारिश की बूंदों के बीच, मैंशन के बाहर आवारा कुत्तों के एक साथ रोने की आवाज़ें इतनी तेज़ और डरावनी हो चुकी थीं कि पूरा वीराना दहल उठा था।

और ठीक तभी... रात के उस सन्नाटे को चीरती हुई एक बेहद होलनाक, दर्दभरी और तीव्र ज़नाना चीख गूंजी, जो पूरे मैंशन की दीवारों को हिलाती हुई बाहर तक आई।

वह चीख इतनी भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाली थी कि गेट के केबिन में सो रहा गार्ड झटके से जाग बैठा। उसके माथे पर पसीना आ गया। वह बदहवास हालत में अपने केबिन से बाहर निकला और हाथ में टॉर्च लेकर चारों तरफ देखने लगा। लेकिन फिर से वही गहरा,डरावना सन्नाटा छा सा गया।

गार्ड को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह आवाज़ किसकी थी। वह डरते-डरते मुख्य मैंशन की बड़ी खिड़कियों की तरफ बढ़ा। अंदर मद्धम पीली रोशनियाँ जल रही थीं। गार्ड को पक्का यकीन था कि उसने किसी औरत की चीख सुनी थी, और वह आवाज़ मैंशन के अंदर से ही आई थी। वह निश्चित रूप से उसी औरत की चीख थी जो रात को डॉक्टर साहब के साथ आई थी।
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«Reply #7 on: November 01, 2026, 12:33:27 AM »
Chapter 6

किसी घोर अनिष्ट और अनहोनी की आशंका से गार्ड का दिल बैठने लगा। वह मुख्य दरवाज़े के पास गया और उसे ज़ोर-ज़ोर से भड़भड़ाने लगा, "साहब! डॉक्टर साहब! सब ठीक तो है ना?"

लेकिन अंदर से मालिक दीपक की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी। गार्ड ने सोचा कि क्या पता वे गहरी नींद में सो रहे हों, लेकिन वह चीख इतनी साफ़ थी कि उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। वह दरवाज़े से पीछे हटा। मैंशन का मुख्य द्वार अंदर से लॉक था। वह भागकर मैंशन के पिछले हिस्से की तरफ गया, जहाँ एक छोटा गुप्त दरवाज़ा था। किस्मत से वह दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं था।

गार्ड दबे पाँव, थरथराते हाथों से अपनी टॉर्च जलाकर घोर अंधेरे के बीच मैंशन के भीतर दाखिल हो गया।

अंदर का सन्नाटा जानलेवा था। कहीं दूर किसी नल से पानी गिरने की 'टप... टप...आवाज़ आ रही थी, जो सन्नाटे में गूंज रही थी। गार्ड टॉर्च की रोशनी को फर्श पर डालता हुआ धीरे-धीरे ऊपर की मंजिलों की तरफ बढ़ा। वह दाईं ओर बने मुख्य बेडरूम की तरफ जा ही रहा था कि अचानक लिविंग हॉल की सीढ़ियों के करीब पहुँचते ही उसके कदम वहीं ठिठक गए।

हॉल की छत पर लटके विशाल कांच के झूमर (फ़ानूस) की मद्धम रोशनी के ठीक नीचे, फर्श पर एक ऐसा भयावह और रोंगटे खड़े कर देने वाला नज़ारा था जिसे देखकर गार्ड की चीख उसके हलक में ही फंस गई।

सामने फर्श पर उस अभागी औरत—मोना—की कटी-फटी, क्षत-विक्षत नंगी लाश पड़ी थी। उसका कत्ल काफी समय पहले ही हो चुका था, और उसी की वह आखिरी होलनाक चीख बाहर गूंजी थी। और उस लाश के ऊपर से...दीपक  का नग्न शरीर धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था।

दीपक का पूरा बदन बेतहाशा लाल खून से सना हुआ था। उसके नग्न शरीर की सफेद चमड़ी के नीचे नीली-काली नसें किसी ज़हरीले केंचुए की तरह भयानक रूप से उभरकर कुलबुला रही थीं, और उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी—वे पूरी तरह सुर्ख सफेद थीं जो अंधेरे में चमक रही थीं।

गार्ड खौफ के मारे पूरी तरह कांप रहा था। उसके हाथ से टॉर्च छूटकर फर्श पर गिर गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी आँखों के सामने खड़ा यह जीव उसका मालिक डॉ. दीपक था या कोई हैवान? उसने अपनी आँखों से दीपक को किसी जंगली जानवर की तरह मोना के नग्न जिस्म के मांस और मांसपेशियों को नोचते और सोखते हुए साक्षात देख लिया था।

जैसे ही दीपक ने मोना के शरीर का आखिरी हिस्सा सोखा, मोना का सुंदर बदन एक सड़े हुए, सूखे कंकाल में तब्दील हो गया।

हैवान दीपक ने अपनी पुतली-विहीन सुर्ख सफेद आँखें घुमाईं और सीढ़ियों पर खड़े उस गार्ड को देख लिया। वह एक भूखे बाघ की तरह ज़ोरदार दहाड़ मारता हुआ आंगन और सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।

गार्ड को अहसास हो गया कि इस खौफनाक लाश और हैवान के असली रूप को देख लेना ही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी भूल थी। वह पागलों की तरह पीछे मुड़ा और पूरे दम से चिल्लाता हुआ—"खून! खून! बचाओ!!!"—फाटक की तरफ भागने लगा।

वह भागता हुआ लगभग मुख्य फाटक तक पहुँच ही चुका था कि अचानक... घने कोहरे को चीरता हुआ एक भयानक काला साया बिजली की फुर्ती से उसके ठीक आगे आकर खड़ा हो गया।

गार्ड डरकर गमले की ठोकर खाता गिरा। सामने वही हैवान दीपक खड़ा था, जिसकी सुर्ख सफेद आँखें बिना पुतलियों के उसे घूर रही थीं और उसके मुँह से काला गाढ़ा लार टपक रहा था।

गार्ड उसे सामने देख वापस पीछे की तरफ, मैंशन की लंबी राहदारी की तरफ दौड़ा। लेकिन दीपक ने एक ही छलांग में उसे हवा में दबोच लिया।

रात के उस घने अंधेरे और मूसलाधार बारिश के बीच, उस सूने हाईवे के किनारे बने मैंशन से एक बेहद दर्दनाक, अंतिम चीख गूंजी...और फिर, सब कुछ हमेशा के लिए पूरी तरह से वीरान और खामोश हो गया।

                    ---------

प्रोफेसर रोड्रिगेज अपनी लैब में बैठे कंप्यूटर की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए थे। उनके कांपते हाथ माउस पर थे और वे पिछले कई दशकों से उस साइबेरियाई वायरस पर किए गए अपने परीक्षणों के तमाम डिजिटल नोट्स और दस्तावेजों को पागलों की तरह खंगाल रहे थे।

तभी स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए उन्होंने उन ताज़ा अखबारों की स्कैन की हुई डिजिटल तस्वीरों को देखा, जिसने उनके रोंगटे खड़े कर दिए। स्क्रीन पर शहर के बाहर मोटल में मिली मेघना और उसके पति की वह वीभत्स, पूरी तरह सड़ चुकी कंकाल जैसी लाश छपी थी। ठीक उसी के बगल में उस बदनसीब टैक्सी ड्राइवर की लाश वाली भयानक तस्वीर भी मौजूद थी, जिसका मांस और मांसपेशियां पूरी तरह गायब हो चुकी थीं।

उन तस्वीरों को देखते ही प्रोफेसर के दिमाग में एक बेहद खौफनाक कड़ी जुड़ी और उन्होंने एक डायरी पर तेज़ी से एक बात नोट की।

"जैसे एक कोमोडो ड्रैगन जैसा खूंखार मांसाहारी और जहरीला जीव अपने शिकार को एक बार काट लेता है, तो उसके शरीर से निकलने वाली खून और सड़न की महक को सूंघता हुआ उसका पीछा कभी नहीं छोड़ता—जब तक कि वह उस तक पहुँचकर उसे पूरी तरह खत्म न कर दे—ठीक वैसे ही यह वायरस भी काम कर रहा था!"

इसका सीधा सा मतलब था कि हाईवे के मोटल में मिली वे दो लाशें (मेघना और उसका पति) कहीं न कहीं दीपक के कत्ल से सीधा ताल्लुक रखती थीं। प्रोफेसर को फौरन याद आया कि उस तूफ़ानी रात कब्रिस्तान में जो दो साए लाश को मिट्टी में दबाकर भागे थे, वे भी एक मर्द और एक औरत ही थे।

प्रोफेसर का माथा ठनका और वे पसीने से तर हो गए। एक भयानक वैज्ञानिक सच उनके सामने आ चुका था। यह वायरस न सिर्फ मरे हुए इंसान (Host) को दोबारा जिंदा करता है, बल्कि उसके दिमाग में मौजूद तमाम पुरानी यादों  को भी पूरी तरह खंगाल कर उस पर हावी हो जाता है। दिमाग पर कब्जा करते ही, वह हैवान उस इंसान के अतीत में जाता है। अतीत में कभी भी उस औरत (मेघना) के साथ हुए उसके शारीरिक संबंधों के कारण... उस मैंशन के कमरे में छूटे हुए उसके Semen, थूक या खून की बारीक से बारीक महक को यह वायरस सूंघ सकता था। वह हैवान महज़ उस जैविक महक का पीछा करते हुए, रास्ता ढूंढते हुए सीधा उस मोटल के कमरा नंबर ४०४ तक पहुँच गया था!

यह खौफनाक सच जानकर प्रोफेसर जैसे आसमान से गिरे। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इस खौफनाक और अमानवीय बायोलॉजिकल सच को जानने के बाद, अब आगे कुछ भी और जानने की इच्छा उनके भीतर कतई बाकी न बची थी।

उनकी आँखें डर से फैल गईं क्योंकि उन्हें अहसास हो चुका था कि मांस और खून का यह भूखा हैवान आज फिर एक और नया शिकार करने वाला था... या फिर शायद, शहर के किसी कोने में वह पहले ही इसे अंजाम दे चुका था!

                       ------

अगली सुबह का सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था कि शहर के बाहरी छोर पर बने एक सुनसान हाईवे के किनारे हड़कंप मच गया। घास और कीचड़ के बीच एक और वीभत्स लाश लावारिस हालत में पड़ी मिली थी। गाँव के कुछ लोग जब सुबह वहाँ से गुज़र रहे थे, तो उनकी नज़र उस भयावह मंज़र पर पड़ी और उन्होंने तुरंत पुलिस को इत्तिला दी।

वारदात की खबर मिलते ही पुलिस का पूरा अमला और फॉरेंसिक टीम वहाँ पहुँच गई। कुछ ही देर में, लंबे डग भरता हुआ इंस्पेक्टर दिलेर भी मौका-ए-वारदात पर पहुँचा। चारों तरफ पीली पुलिस टेप लगी थी। दिलेर ने पहले से मौजूद अधिकारियों से पूछताछ की और फिर उस कटी-फटी, वीभत्स लाश की तरफ देखा। लाश की हालत हूबहू पिछले तीन मर्डर्स जैसी ही थी—शरीर का सारा मांस और मांसपेशियां पूरी तरह नदारद थीं और वह महज़ एक सड़ा हुआ, सूखा कंकाल बनकर रह गया था। यह शहर की चौथी कंकाल बनी लाश थी।

वहाँ मौजूद डॉक्टर्स ने दिलेर को शुरुआती जांच में बताया कि यह कंकाल भी किसी औरत का ही था। दिलेर ने उस खौफनाक चेहरे पर एक सर्द नज़र डाली और असमंजस में अपनी आँखें फेर लीं। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस लावारिस लाश से वह मुँह मोड़ रहा है, वह असल में मधु की सहेली मोना की थी। दिलेर ने भारी सांस ली और लाश को फौरन एम्बुलेंस में रखवाने का निर्देश दिया। शहर में आख़िर कौन सा ऐसा हैवान घूम रहा था जो इंसानों को इस कदर कंकाल बना रहा था?

दिलेर ने तुरंत अपनी जेब से फोन निकाला और क्राइम ब्रांच के चीफ को कॉन्टैक्ट कर पूरी स्थिति बयां की। चीफ भी लाइन के उस पार गहरी चिंता में डूब गए। हत्यारे का अब तक कोई नामो-निशान या ठोस सबूत नहीं मिल पा रहा था। फॉरेंसिक लैब के एक्सपर्ट्स इन केसेस को सुलझाने में अपनी पूरी ताकत झोंक चुके थे।

चीफ ने फोन पर दिलेर को एक नया अपडेट दिया, "दिलेर, एक नया सुराग मिला है। हाईवे के उस सुनसान मोटल में जहाँ वे मियाँ-बीवी मरे थे, उन्होंने रजिस्टर में फर्जी नाम लिखवाया था। लेकिन होटल के Receptionist और दरबान से मिले हुलिए के आधार पर जब स्केच बनवाए गए, तो वे दो चेहरे अपने ही शहर के दो बाशिंदों के निकले। और इत्तेफाक देखो, वे दोनों—मेघना और उसका पति—कई वक्त से अपने घरों से गायब हैं। उनके करीबियों के पास कोई सुराग नहीं था। पर सबसे बड़ी बात जानते हो क्या है? डॉ. दीपक को आखिरी बार उन्हीं के साथ देखा गया था।"

"दीपक? ये वही डॉक्टर हैं न सर, जो आपके जानने वाले थे?" दिलेर की आँखें तंग हो गईं।

"हाँ वही," चीफ ने कहा, "क्लब के बारमैन से मालूम चला है कि इन दोनों को आखिरी बार दीपक के साथ ही देखा गया था। जुए के बाद दीपक सिर्फ उस लड़के की बीवी मेघना को अपनी गाड़ी में बिठाकर अपने साथ ले गया था। उसके बाद क्या हुआ, कोई नहीं जानता।"

दिलेर ने कड़े लहजे में कहा, "तब तो सर हमें बिना वक्त गंवाए डॉ. दीपक मखिजा को फौरन हिरासत में ले लेना चाहिए!"

"तुम्हारा दिमाग खराब है दिलेर!" चीफ फोन पर भड़क उठे, "मैं उसे बरसों से जानता हूँ। वह अय्याश ज़रूर है, दूसरों की बीवियों पर उसकी नीयत भी मैली हो सकती है, पर वह किसी का कत्ल नहीं कर सकता! और फिर, उसकी पहुँच और रसूख इतने ऊंचे हैं कि बिना पुख्ता सबूत के कोई उसके खिलाफ उँगली नहीं उठा सकता।"

"पर सर, हमारे शक का मरकज़ इकलौता वही है!" दिलेर ने अपनी दलील दी, "उसके मैंशन के गार्ड ने खुद पुलिस को बताया था कि उस रात डॉक्टर साहब एक औरत के साथ घर आए थे और फिर सुबह ३:०० बजे उसी औरत के साथ बाहर निकले थे। गार्ड ने जिस औरत का हुलिया बताया, वह मेघना का ही था! डॉ. दीपक को भी आखिरी बार उन्हीं के साथ देखा गया है। हो न हो, वह औरत जिसका कंकाल मोटल में मिला, वह मरने से पहले दीपक के पास ही थी!"

"लेकिन यह बात मत भूलो दिलेर," चीफ ने पलटकर वार किया, "शहर से सैकड़ों मील दूर उस वीरान मोटल में मेघना ने अपने पति के साथ अकेले चेक-इन किया था। वहाँ उनके साथ दीपक नहीं था, और न ही कत्ल के वक्त या उससे पहले किसी ने दीपक को उस मौका-ए-वारदात पर देखा था। कत्ल उस रात नहीं हुआ जब मेघना दीपक के साथ थी, बल्कि उसके अगले दिन की रात को हुआ है। और अगर दीपक को मारना भी होता, तो वह किसी को इस खौफनाक तरीके से कैसे मार सकता था? फॉरेंसिक डॉक्टर्स ने साफ़ कहा है कि यह कत्ल किसी दवा या तेज़ाब से नहीं हुआ है, इसका रहस्य अभी भी बना हुआ है।"

चीफ ने अपनी बात आगे बढ़ाई, "मेघना के पति के जुआरी दोस्तों ने साफ़ बताया कि वह लड़का बाज़ी हारा था और दीपक ने उसके सामने उसकी बीवी के साथ एक रात गुज़ारने का प्रस्ताव रखा था, जिसके बदले उसके सारे कर्ज़ माफ़ करने का वादा था। थोड़ी बहस के बाद वह लालची पति मान गया और अपनी बीवी का सौदा कर दिया। मेघना खुद वहाँ अपने पति के साथ आई थी और क्लब के दरबान ने साफ़ देखा था कि वह अपनी मर्ज़ी से दीपक के साथ गाड़ी में बैठी थी, दीपक कोई ज़बरदस्ती नहीं कर रहा था। फिर वे दीपक के मैंशन निकल गए और पति पीछे रह गया।"

"Nonsense!" दिलेर गुस्से से तमतमा उठा, "सर, आप उसके खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ खड़े लगते हैं! अगर मान भी लिया जाए कि इस हत्या में दीपक का कोई हाथ नहीं है, तो फिर उन दोनों को इस बेरहमी से किसने मारा? और वे दोनों इतनी दूर शहर से बाहर भाग कहाँ रहे थे?"

"पति भारी कर्ज़दार था और ऊपर से अपनी ही बीवी का सौदा कर चुका था। हो न हो, उन्होंने शहर में कोई ऐसा नया बखेड़ा खड़ा किया होगा जिसकी वजह से उन्हें खड़े पैर शहर छोड़कर भागना पड़ा," चीफ ने शांत होते हुए कहा, "खैर, यह बात भी गौर करो कि उन दोनों की तरह अब यह दो और लाशें मिल चुकी हैं। अब यह मत कहना कि इन मर्डर्स में भी दीपक का हाथ है। मैं तो अब भी यकीन नहीं करता कि दीपक रात गए लोगों का ऐसे नृशंस तौर पर कत्ल कर सकता है। खैर, तुम्हारे लिए बेहतर होगा कि तुम खुद जाके एक बार दीपक से मिल आओ, उससे अभी तक मेरी भी कोई मुलाकात नहीं हुई है।"

दिलेर ने गुस्से में फोन कट कर दिया। चीफ तो जैसे अपने दोस्त के हित में उसके खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। यह मामला वाकई बहुत पेचीदा था। चार लाशें ठीक एक जैसी खौफनाक हालत में मिल चुकी थीं। अगर मेघना और उसके पति का रिश्ता दीपक से जोड़ भी दिया जाए, तो बाकी की दो लाशों का दीपक से क्या ताल्लुक था, यह सोचना मुश्किल था।
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«Reply #8 on: November 01, 2026, 12:35:14 AM »
उधर मधु अपने घर में बैठी बेहद फिक्रमंद और बेचैन थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी पक्की दोस्त मोना उसका फोन क्यों नहीं उठा रही थी। मोना का फोन पिछले पूरे रोज़ से लगातार स्विच ऑफ जा रहा था। मोना कभी भी मधु को बिना बताए कहीं नहीं जाती थी, चाहे कोई भी बात हो। मधु के मन में अजीब-अजीब आशंकाएँ उठ रही थीं कि क्या मोना को कोई ऐसा बड़ा क्लाइंट मिल गया था जिसके साथ वह बिना बताए लंबे समय के लिए कहीं बाहर चली गई थी? लेकिन अमूमन मोना ऐसा कभी नहीं करती थी।

परेशान होकर मधु अपने घर से बाहर निकली। गली के मोड़ पर बनी एक चाय की दुकान के पास से गुज़रते हुए, उसकी नज़र वहाँ चल रहे टीवी पर पड़ी। टीवी पर हाल ही में हुए उन खौफनाक कंकाल वाले मर्डर्स की तफ्तीश दिखाई जा रही थी। न्यूज़ एंकर चिल्ला रहा था कि शहर के बाहर एक और अज्ञात महिला की चौथी लाश बेहद बुरी हालत में मिली है, जिसके बदन पर कोई कपड़ा नहीं है और चेहरा इस कदर कंकाल बन चुका है कि शिनाख्त करना नामुमकिन हो रहा है। फॉरेंसिक डॉक्टर्स के अनुसार वह एक औरत की लाश थी।

मधु खौफ के मारे उस वीभत्स दृश्य को स्क्रीन पर देख नहीं सकी। उसने डरकर अपनी आँखें बंद कीं और मुँह फेरते हुए तेज़ी से आगे बढ़ गई। काश...काश उसे उस वक्त यह पता होता कि जिस लावारिस लाश से वह मुँह फेर कर भाग रही है, वह उसकी अपनी सहेली मोना की ही थी! काश उसने इस फिक्र के बारे में दिलेर से बात की होती!

लेकिन उस रात दिलेर के साथ जीप में हुई उस घटना के बाद से मधु के मन में भारी उथल-पुथल मची हुई थी। उसे दिलेर को फोन करने में एक अजीब सी शर्म और झिझक महसूस हो रही थी। उसका स्वाभिमान कह रहा था कि वह खुद फोन न करे, बल्कि पहल खुद दिलेर की तरफ से हो। इसी कश्मकश में उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था। दिलेर ने उससे जो बातें कही थीं, वह बार-बार उसके दिमाग में गूंज रही थीं—'तुम शरीफ घराने की औरत हो मधु, इस धंधे को छोड़ दो।'

मधु ने मन ही मन फैसला किया, 'बस... अब और नहीं।' लेकिन उसकी माली हालत वक्त के साथ बद से बदतर होती जा रही थी, घर के खर्चे और मजबूरी का पहाड़ सामने खड़ा था। आज रात उसे फिर से अपने उसी गुमनाम धंधे पर निकलना था। लेकिन उसने अपने दिल में एक पक्का संकल्प ले लिया था कि यह उसका आखिरी बार होगा। वह आज रात के बाद यह धंधा हमेशा के लिए छोड़ देगी और दिलेर की बातों पर अमल करके उसे यह साबित करके दिखाएगी कि वह वाकई खुद को बदल सकती है।

उधर, इंस्पेक्टर दिलेर अपनी सरकारी जीप दौड़ाता हुआ डॉ. दीपक मखिजा के उस आलीशान और विशाल मैंशन के बाहर पहुँचा।

बाहर कड़ाके की ठंड थी और सर्द कोहरे की चादर फैली हुई थी, हालांकि आसमान से हल्की-हल्की धूप निकलने की कोशिश कर रही थी। दिलेर जीप से उतरा। उसने देखा कि मैंशन के मुख्य लोहे के फाटक का किवाड़ पूरा खुला पड़ा था, जबकि उसने तफ्तीश में सुना था कि अमूमन सुरक्षा के कारण यह गेट हमेशा बंद रखा जाता था। मैंशन के भीतर एक मरघट सा सन्नाटा पसरा था और पूरे माहौल में एक अजीब सी मुर्दानी और वीरानियत छाई हुई थी।

दिलेर ने फाटक पार किया और दाईं तरफ बने वॉचमैन के केबिन में झांका। केबिन पूरी तरह खाली था, वहाँ कोई गार्ड मौजूद नहीं था। दिलेर की खोजी आँखों ने उस खालीपन को नोट किया और वह आगे बढ़ गया। जैसे ही उसने मैंशन की मुख्य राहदारी को पार किया, उसकी नाक में एक अजीब सी, हल्की गंध टकराई। वह गंध बहुत अजीब थी—जैसे पेड़-पौधों या झाड़ियों के किसी जंगली फूल की महक हो।

दिलेर शांत कदमों से चलता हुआ मुख्य भारी दरवाज़े के पास पहुँचा। उसने दरवाज़े की कुंडी को हाथ में लिया और ज़ोर-ज़ोर से पीटना शुरू कर दिया।

अंदर से कोई जवाब नहीं आया। दिलेर ने कुछ पल इंतज़ार किया और दोबारा दरवाज़ा खटखटाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। अजीब बात थी, इतने बड़े मैंशन में नौकर-चाकर भी कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। दिलेर का शक अब धीरे-धीरे गहरा होने लगा था। उसने हार न मानते हुए दरवाज़े के बगल में लगी घंटी को लगातार कई दफ़ा बजाया।

तभी पीछे से किसी के आने की आहट हुई। दिलेर ने घूमकर देखा। वहाँ हाथ में दूध का डिब्बा लिए एक दूधवाला खड़ा था।

दूधवाले ने दिलेर की पुलिसिया वर्दी को देखा और धीरे से कहा, "साहब... आजकल डॉक्टर साहब बहुत बीमार रहते हैं।"

दिलेर ने अपनी पैनी निगाहें उस पर टिकाईं, "बीमार रहते हैं? तुम्हें कैसे पता?"

दूधवाला बोला, "साहब, कल ही वो मुझे यहाँ बाहर मिले थे। बहुत ज़्यादा बीमार और कमज़ोर लग रहे थे। उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि उनकी तबीयत खराब रहती है, इसलिए वे अब ज़्यादा बाहर नहीं निकलते और घर के अंदर ही रहते हैं।"

दूधवाले की बात सुनकर दिलेर का शक और गहरा हो गया। तभी... अचानक एक भारी आवाज़ के साथ मैंशन का मुख्य दरवाज़ा धीरे से खुला।

सामने डॉ. दीपक मखिजा खड़ा था। उसके चेहरे का रंग अजीब तरीके से उड़ा हुआ था और वह बहुत अजीब लग रहा था। उसने दिलेर की तरफ देखा और अपने होठों को खींचकर एक बेहद फीकी मुस्कान दी, "कहिए, क्या काम है?"

दिलेर ने अपना परिचय दिया, "मैं इंस्पेक्टर दिलेर, क्राइम ब्रांच से।"

दीपक ने उसे अंदर आने का इशारा किया। उसने आगे बढ़कर दूधवाले से दूध का डिब्बा लिया और अंदर चल पड़ा। दिलेर भी उसके पीछे-पीछे अंदर आया। मैंशन के भीतर का नज़ारा देखकर दिलेर हैरान रह गया। दिन के इस वक्त भी दीपक ने घर की एक भी बत्ती चालू नहीं की थी। पूरे लिविंग हॉल में एक गहरा, रहस्यमयी अंधेरा पसरा हुआ था। दीपक बिना लाइट जलाए ही, कोने में रखी एक सोफा-चेयर पर जाकर बैठ गया और फायरप्लेस की बुझी हुई आग को देखने लगा।

दिलेर हॉल के बीच में खड़ा हो गया और पूछा, "आप अकेले इतने बड़े मैंशन में रहते हैं डॉक्टर साहब। सुना है कि आप काफी रसूखदार हैं, पर आपके इस पूरे घर में मुझे एक भी नौकर-चाकर दिखाई नहीं दे रहा?"

दीपक ने सोफे पर बैठते हुए सूखी, भारी आवाज़ में कहा, "अब नहीं इंस्पेक्टर...अब मुझे पूरी तरह अकेले रहने की आदत हो गई है। नौकर-चाकर रखने का कोई फायदा नहीं होता। मेरी गैर-हाजिरी में ये लोग यहाँ गलत काम करते हैं...और रही बात चोरियों की, तो वो अलग। इसलिए मैंने सबको हटा दिया।"

दिलेर ने इस दलील पर कोई जवाब नहीं दिया। उसने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा, "अच्छा, आप एक बात बताइए। आप कई रोज़ पहले संदेहास्पद तरीके से गायब थे। उसके बाद खबर मिली कि आप वापस आ गए, लेकिन आपका वह गार्ड...वह भी अभी मुझे ढूँढे नहीं मिल रहा। आप बता सकते हैं कि आप इन दिनों कहाँ थे"

दीपक ने अंधेरे में अपनी आँखों को सामान्य रखने की कोशिश की। उसने दिलेर की तरफ एक उड़ती निगाह डाली और कड़े लहजे में कहा, "देखिए इंस्पेक्टर, आप यहाँ मेरे घर में इसलिए आए हैं क्योंकि मैंने आपको दरवाज़ा खोलकर अंदर आने दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपको मुझसे इतने निजी सवालात करने का कोई..."

"...इख्तियार है!" दिलेर ने उसे बीच में ही टोकते हुए कड़क आवाज़ में कहा, "मुझे पूरा इख्तियार है डॉक्टर साहब! शहर से दूर दो खौफनाक खून हो चुके हैं और साहब इसमें आपका नाम सीधा जुड़ा हुआ है! क्योंकि आखिरी बार मेघना और उसके पति को आपके साथ ही देखा गया था। मेघना को आप इसी हवेली में लेकर आए थे, और फिर उसे अपने साथ गाड़ी में ले गए थे। क्या यह सच है?"

जैसे ही दिलेर के मुँह से मेघना का नाम निकला, दीपक के दिमाग में उस रात मेघना के पति द्वारा किए गए जानलेवा हमले और मोटल में उन दोनों के वीभत्स भक्षण की तस्वीरें घूमने लगीं। वह खौफ और भूख के मिलाप से बेकाबू होकर अँधेरे में ही अजीब-अजीब चेहरा बनाने लगा, उसका जबड़ा हिलने लगा। दिलेर अँधेरे में उसका चेहरा गौर से देखने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी दीपक ने खुद को संभाला। उसका चेहरा वापस सामान्य हुआ और उसने दिलेर की तरफ मुड़कर एक शातिर मुस्कान दी।

उसने कहा, "अगर मैं आपको उस रात का पूरा सच बता दूँ इंस्पेक्टर... तो क्या आप मेरी रिपोर्ट लिखेंगे?"

दिलेर ने पूछा, "क्या रिपोर्ट?"

दीपक ने झूठ रचते हुए कहा, "रिपोर्ट इस बात की, कि उन दोनों ने मिलकर मेरे ऊपर इसी घर में एक जानलेवा हमला किया था! शायद आपको पता नहीं इंस्पेक्टर, हम पैसों का सट्टा खेले थे और उसका पति वह बाज़ी बुरी तरह हार गया था। सुना है वह बहुत बड़ा जुआरी था और उस पर लाखों का कर्ज़ था। यहाँ तक कि कई कर्ज़दार उसके खून के प्यासे हो चुके थे। यहाँ आने के बाद, उन दोनों ने लालच में मेरे सिर पर वार किया और मुझे मरा हुआ समझकर फर्श पर छोड़ दिया। उसके बाद, सबूत मिटाने के लिए उसके पति ने अलमारी से मेरा एक जोड़ी कीमती कपड़ा निकाला, उसे खुद पहना और वे दोनों मेरी ही गाड़ी चुराकर यहाँ से फरार हो गए! आप चाहें तो अभी मेरी अलमारी की तलाशी ले सकते हैं, मेरा एक जोड़ा कपड़ा गायब है।"

दीपक ने अपनी कहानी को इतनी चालाकी से पेश किया कि कोई भी धोखा खा जाए।

दिलेर ने पूछा, "तो आपने यह बात पुलिस को उसी वक्त क्यों नहीं बताई?"

दीपक ने लाचारी का नाटक किया, "मेरी तबीयत आजकल बहुत ज़्यादा खराब रह रही है इंस्पेक्टर। मुझमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि मैं खुद पुलिस स्टेशन जा पाऊँ या उन्हें यहाँ बुलाकर अपना बयान दे सकूँ। मैं बस बेहोश पड़ा रहा।"

दिलेर ने उसके पीले चेहरे को ताड़ते हुए पूछा, "आपको हुआ क्या है डॉक्टर साहब? आपके इस चेहरे और जिस्म को देखकर ऐसा लगता है जैसे आपको कोई भयानक बीमारी है।"

दीपक ने एक खोखली हँसी हँसते हुए कहा, "मैं एक बहुत लंबी बीमारी से गुज़र रहा हूँ इंस्पेक्टर...जो पूरी तरह से लाइलाज है।"

दीपक ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई, "खैर, वे दोनों यहाँ से फरार हो गए और मेरे गार्ड को लगा कि मैं गायब हो गया हूँ। आखिर मैं गायब नहीं हुआ था, मैं तो घर में ही था। जब मुझे होश आया तो मैंने जाकर गार्ड को हकीकत बताई, जिसके बाद ही उसने थाने जाकर रिपोर्ट की कि मैं वापस आ गया हूँ।"

दिलेर ने शक भरी निगाहों से देखते हुए पूछा, "तो आपके गार्ड ने थाने में यह क्यों नहीं बताया कि आपके ऊपर जानलेवा हमला हुआ था और आपकी गाड़ी चोरी हो गई थी?"

दीपक ने मरे हुए गार्ड पर इल्ज़ाम मढ़ते हुए कहा, "मैंने ही उसे पुलिसिया लफड़े से बचने के लिए मना किया था। वैसे भी, वह एक नंबर का गैर-जिम्मेदार इंसान था, उसी की लापरवाही के चलते इतना कुछ हुआ। इसलिए मैंने उसे आज सुबह ही खड़े पैर नौकरी से निकाल दिया और धक्के मारकर बाहर कर दिया। आप देख ही सकते हैं, अब मैं यहाँ अकेला हूँ।"

दीपक ने अपनी आँखें घुमाईं और सवालात भरी नज़रों से पूछा, "रही बात उन दोनों की... तो उनका कत्ल कैसे हुआ?"

दिलेर ने गंभीर होकर सविस्तार सब कुछ बयां किया कि शहर से दूर हाईवे के मोटल में क्या-क्या भयावह हुआ था और कैसे वे दोनों कंकाल बन चुके थे।

यह सुनकर दीपक ने कहा, "ओह! तो यह बात है। वे जाते-जाते मेरी गाड़ी भी चुराकर ले गए थे,"

दिलेर ने तुरंत उसकी आँखों में देखते हुए एक बड़ा खुलासा किया, "हैरानी की बात यह है डॉक्टर साहब, कि आपकी वह चोरी हुई गाड़ी हाईवे की सड़क पर कहीं दूर लावारिस हालत में बरामद की जा चुकी है, जो अब तक पुलिस के पास ज़ब्त है और आपके घर नहीं पहुँची है।"

दीपक के चेहरे पर एक ठंडी लकीर खिंची, पर वह मुस्कुराया।
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«Reply #9 on: November 01, 2026, 12:36:51 AM »
Chapter 7

दिलेर अपनी जगह से खड़ा हुआ और उसे कड़क चेतावनी दी, "ठीक है डॉ. दीपक, मैं आपकी यह रिपोर्ट लिख लेता हूँ। लेकिन याद रखिएगा...आप अभी इस डबल मर्डर के शक के दायरे से पूरी तरह बरी नहीं हुए। आप शहर छोड़कर कहीं मत जाइएगा और दोबारा गायब होने की कोशिश मत कीजिएगा।"

दीपक ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, "It's my honour to help you, Inspector...वैसे, जिस तरह से आपने उन लाशों की हालत बयां की है, इस तरह का कत्ल तो काफी साइंटिफिक लगता है?"

दिलेर ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा, "यही हम जांच कर रहे हैं डॉक्टर साहब, फॉरेंसिक लैब्स जुटी हुई हैं।"

दरवाज़े के पास पहुँचकर दिलेर ने मुड़कर अपना आखिरी सवाल दागा, "वैसे, कल रात आप कहाँ थे?"

दीपक ने अंधेरे से जवाब दिया, "मैं अपने घर पर ही था, हाँ...बस देर रात पहले एक क्लब गया वहाँ पर एक खूबसूरत!, फिर वहाँ से उसके साथ एक रेस्टोरेंट गया था,  अब क्या कहूँ आपसे।"

दिलेर ने दीपक की पुरानी अय्याश फितरत जानते हुए खुद बात पूरी की, "समझ गया...वहाँ भी किसी औरत की सोहबत में ही बैठे होंगे।"

"फिर उसके साथ यहाँ लौटा, आँख खुली सुबह तो बिना दुआ सलाम करे वो कम्बख्त!"

दीपक ने आगे जवाब नहीं दिया, वह बस अंधेरे में रहस्यमयी तरीके से मद्धम-मद्धम हँसने लगा। उसकी वह हँसी किसी शैतान जैसी लग रही थी।

दिलेर बिना कोई जवाब दिए वहाँ से लंबे-लंबे डग भरता हुआ बाहर निकल गया। लेकिन मैंशन से बाहर आते ही दिलेर को बहुत अजीब महसूस हो रहा था। पूरे घर में दिन के उजाले में भी कहीं कोई रोशनी नहीं थी, हर तरफ एक गहरा अंधेरा और एक अजीब सी मुर्दानी छाई हुई थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, वह गहरी सोच में डूबा अपनी जीप की तरफ बढ़ गया...

                        -------

सूरज ढल चुका था और शहर पर रात का स्याह साया मंडराने लगा था।

प्रोफेसर रोड्रिगेज अपने कॉटेज की गुप्त लैब में कंप्यूटर मॉनिटर की नीली रोशनी के आगे झुके हुए थे। उनके बूढ़े हाथ तेज़ी से कीबोर्ड पर चल रहे थे। वे पागलों की तरह उस वायरस के उन सीक्रेट डिटेल्स को खंगालने की कोशिश कर रहे थे, जिनकी खोज उन्होंने करीब १० साल पहले की थी। प्रोफेसर ने एक पल के लिए अपनी नजरें घुमाईं और कोने में रखे उस बड़े लोहे के पिंजरे की तरफ देखा, जहाँ वह चूहा फुदक रहा था।

वह चूहा भी तो इसी वायरस के म्यूटेशन का नतीजा था, लेकिन वह तो बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रहा था। फिर ऐसी क्या भयानक वजह थी कि उसी वायरस के रिएक्शन से दीपक बिल्कुल वैसा ही जानलेवा, खूंखार और हिंसक हैवान बन गया था? ठीक वैसा ही, जैसा ५६ साल पहले, रूस की उस सीक्रेट माइनिंग लैब में हुआ था, जब सोवियत वैज्ञानिकों ने बिना किसी सुरक्षात्मक केमिकल के वह वायरस सीधे एक मृत चूहे पर इंजेक्ट कर दिया था, जिसे बाद में खुद प्रोफेसर ने अपने हाथों से तेज़ाब डालकर नष्ट किया था।

तभी... कंप्यूटर की स्क्रीन पर अचानक एक पुरानी कोडिंग फाइल डिकोड हुई। एक ऐसा डेटा शीट सामने आया जिसे प्रोफेसर वक्त के साथ लगभग भूल ही चुके थे। उन्होंने चश्मा ठीक किया और स्क्रीन पर लिखी उन पंक्तियों को बड़ी बारीकी से पढ़ना शुरू किया।

नतीजे देखकर उनके माथे पर पसीना आ गया। वह करोड़ों साल पुराना वायरस जैविक रूप से इतना ज़्यादा अग्रेसिव था कि अगर कोई भी जीवित कोशिका—चाहे वह इंसानी जीव हो या कोई जानवर—इसके संपर्क में आकर दोबारा जीवित होती है, तो वह वायरस उस 'होस्ट' के पूरे नर्वस सिस्टम पर कब्ज़ा कर लेता है। लेकिन सबसे खौफनाक बात यह थी कि अगर उस वायरस को समय रहते उसकी मनचाही भूख की चीज़—यानी ताज़ा इंसानी मांस न मिले, तो वह शांत नहीं बैठता। वह अपनी भूख मिटाने के लिए खुद उस संक्रमित इंसानी जिस्म को ही अंदर से खाना शुरू कर देता है!

प्रोफेसर ने इस बात को अपनी डायरी में तुरंत नोट किया। वह वायरस इस कदर हिंसक हो जाता था कि यदि उसकी भयानक भूख न मिटे, तो वह जिस दिल और जिस दिमाग पर काबिज़ हुआ है, उसी जीव के अंगों के मांस को चट करने लगता था। इसलिए, उस होस्ट के लिए यह एक जैविक मजबूरी बन जाती थी कि वह जिंदा रहने के लिए जल्द से जल्द नया शिकार ढूँढे और उसका मांस सोखे।

अब जाकर बूढ़े डॉक्टर को पूरी गणित समझ में आई कि आखिर क्यों दीपक चुन-चुनकर ताज़ा और जवान औरतों का ही शिकार कर रहा था। वे औरतें उसके लिए सबसे आसान शिकार थीं। बंगाल के इस गुमनाम शहर में देर रात गए या तड़के सुबह कॉल गर्ल्स और होस्टेस मिलना बेहद आसान था। वैसे भी वह एक बेइंतहा रईस और रसूखदार आदमी था, वह अपने पैसों के लालच और जाल में ऐसी भोली-भाली औरतों को फंसाकर अपना आसान शिकार बना सकता था।

वह बदनसीब टैक्सी ड्राइवर उसके हत्थे सिर्फ इसलिए चढ़ गया क्योंकि वह गलती से रात के वक्त उसके रास्ते में आ गया था, और हाईवे के मोटल में मेघना के पति को उसने शायद इसलिए मारा क्योंकि उसके अवचेतन दिमाग में कत्ल के वक्त की बदले की भावना और मेघना के जिस्म को हासिल करने की तीव्र लालसा बची हुई थी। इसका मतलब साफ़ था कि वह मर्दों से ज़्यादा औरतों का शिकार करता था, लेकिन अपनी जान बचाने और भूख मिटाने के लिए वह आड़े आने वाले मर्दों को भी नहीं छोड़ता था।

इतने अटैक्स और अखबारों में छपी कंकालों की तस्वीरों के बावजूद प्रोफेसर ने सरकारी फॉरेंसिक लैब का सीनियर फैकल्टी होने के नाते एक और बात नोटिस की थी। चूँकि उन सभी लाशों से जुड़े केसेस की फाइल्स और फॉरेंसिक डिटेल्स उनके महकमे के ज़रिए उन तक आसानी से पहुँच रही थीं, उन्होंने देखा कि दीपक जिन भी औरतों का शिकार करता था, कंकाल बनाने से पहले वह उनके साथ शारीरिक संबंध ज़रूर बनाता था।

इसका सीधा सा वैज्ञानिक मतलब था कि अगर दीपक वक्त रहते नया शिकार न करे, तो वह वायरस उसके खुद के इस पुनर्जीवित मुर्दे जिस्म को खा जाएगा। वह सिर्फ और सिर्फ उस वायरस की दी हुई अमानवीय ताकत और इंसानी मांस के दम पर ज़िंदा खड़ा था।

                        --------

रात और गहरी हो चुकी थी।

सर्द और बर्फीली हवाओं के बीच आज फिर आसमान में काले-घने बादलों का घुमड़ शुरू हो चुका था। रह-रहकर आसमान में बिजलियाँ कड़क रही थीं और तेज़ हवाएँ खिड़कियों से टकरा रही थीं। शहर के बुज़ुर्ग कहते थे कि ऐसे भयानक मौसम में आकाशीय बिजली कहीं भी गिरकर तबाही मचा सकती थी।

उसी वक्त, उस वीरान और अंधेरे मैंशन के आलीशान बेडरूम में आज फिर कोई दर्द से बुरी तरह कराह रहा था। दीपक बिस्तर पर बिन पानी की मछली की तरह तड़प रहा था। उसका पूरा बदन पसीने और खौफ से कांप रहा था। उसके माथे, चेहरे और गर्दन पर वे नीली-काली नसें किसी ज़हरीले केंचुए की तरह भयानक रूप से कुलबुला रही थीं। उसने झटके से अपने ऊपर से कम्बल फेंका और बिस्तर से उठकर सीधे अलमारी के बड़े आईने के सामने आ खड़ा हुआ।

आईने में उसने देखा कि उसके गले पर उभरी हुई वे भयानक नसें इधर से उधर तेज़ी से गुज़र रही थीं। उसने पागलों की तरह अपने हाथों से अपनी चमड़ी को दबाकर उन नसों को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वे उसकी चमड़ी के बहुत नीचे थीं और हाथ में नहीं आ रही थीं। उसे भयानक घुटन महसूस होने लगी, जैसे उसका दम निकल रहा हो।

जैसे ही वह अपनी आँखें बंद करता, उसे साफ़ महसूस होता कि वह चमकीला हरा वायरस उसके फेफड़ों, उसके कलेजे और उसके पूरे ऑर्गन्स में रेंग रहा है और उसे अंदर से कुतर रहा है। उस भयावह दृश्य और असहनीय दर्द से तड़पता हुआ वह अपनी आँखें फाड़े आईने की तरफ देखने लगा। तभी बाहर एक ज़ोरदार बिजली कड़की। उस नीली रोशनी में उसे आईने में खुद का चेहरा किसी भयानक शैतान जैसा लगा। वह अपनी पुतलियों को संभाल नहीं पा रहा था। वह जानता था कि इस जानलेवा तड़प से बचने का केवल एक ही रास्ता था...आज फिर एक शिकार... फिर एक मौत!

कुछ ही देर बाद, दीपक अपनी गाड़ी से शहर के बिल्कुल दूसरी तरफ बने एक अनजान और गुमनाम नाइट क्लब के बाहर पहुँचा। यहाँ का माहौल अलग था और इस इलाके में उसे कोई जानता भी नहीं था।

वह अपनी कलाई पर महँगी घड़ी और एक कीमती सूट पहने गाड़ी से उतरा। उसने बड़ी मुश्किल से अपने शरीर और चेहरे के भीतर कुलबुलाते उन नीली-काली नसों वाले शैतान को छुपाया और एक गहरी सांस लेकर क्लब के भीतर दाखिल हुआ। अंदर हमेशा की तरह तेज़ म्यूज़िक, शोर-शराबा और लोगों का हुजूम था। वह सीधे बार काउंटर पर गया और एक व्हिस्की का ऑर्डर देकर उसे एक ही घूँट में गटक गया।

तभी अचानक उसकी नज़र बार काउंटर के किनारे बैठी एक लड़की पर पड़ी। वह लड़की भी बला की खूबसूरत और जवान थी, जिसके चेहरे पर भारी मेकअप था। दीपक की नसें तनी। वह यकीनन एक पेशेवर वेश्या थी जो किसी अमीर ग्राहक की तलाश में थी। दीपक ने अपनी रईसी का जाल फेंका, महँगी ड्रिंक्स ऑफर कीं और कुछ ही मिनटों की बातचीत के बाद वह लड़की दीपक के जाल में पूरी तरह फंस गई।

वे दोनों क्लब से बाहर निकले और दीपक की गाड़ी में सवार हो गए। दीपक ने गाड़ी स्टार्ट की और उसे शहर के बिल्कुल उलटे छोर पर बने एक वीरान इलाके की तरफ दौड़ा दिया।

सड़क पर स्ट्रीट लाइट्स गायब हो चुकी थीं और गाड़ी के हेडलाइट्स की रोशनी ही उस सूने रास्ते को दिखा रही थी। गाड़ी की रफ़्तार तेज़ थी।

बीच रास्ते में उस लड़की ने खिड़की से बाहर देखते हुए थोड़ा असहज होकर पूछा, "अरे... हम लोग कहाँ जा रहे हैं? यह रास्ता तो बड़ा सूना है।"

तभी आसमान में एक तेज़ बिजली कड़की। उस रोशनी में दीपक ने गाड़ी चलाते हुए घूमकर उस लड़की के चेहरे की तरफ देखा और अपने होठों पर एक ठंडी, कातिलाना मुस्कान लाते हुए कहा, "बस... अपने मुकाम के हम बेहद करीब हैं।"

लड़की ने थोड़ा इठलाते हुए और उसकी रईसी का फायदा उठाने की नीयत से कहा, "हूँ... तुम चाहते तो मुझे सीधे अपने घर या किसी अच्छे होटल में भी ले जा सकते थे। यहाँ जंगल की तरफ क्यों ला रहे हो?"

दीपक ने अपनी भारी आवाज़ में पूछा, "क्यों? क्या बाहर खुले आसमान के नीचे लुत्फ उठाने से तुम्हें कोई परहेज़ है?"

लड़की ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा, "एतराज तो नहीं है डॉक्टर साहब... वैसे भी, बंद गाड़ी में रोमांस करने का एक अलग ही मज़ा होता है।"

कुछ ही मिनटों में दीपक ने गाड़ी को मुख्य सड़क से नीचे उतारा और एक बेहद घने, वीरान जंगल के कच्चे रास्ते पर बढ़ा दिया। चारों तरफ केवल घने पेड़ और काली रात थी। कुछ दूर अंदर जाकर उसने गाड़ी के इंजन और हेडलाइट्स को पूरी तरह बंद कर दिया। चारों तरफ सन्नाटा पसर गया, केवल आसमान में बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी।
दीपक ने सीट बेल्ट खोली और भारी आवाज़ में कहा, "तो फिर... देर किस बात की?"

लड़की ने एक बार गाड़ी की खिड़की से चारों तरफ देखा। वह एक बिल्कुल वीरान और सुनसान जंगल था जहाँ दूर-दूर तक कोई इंसानी साया नहीं था। लेकिन जब उसने दीपक की तरफ देखा, तो उसकी आँखों में हवस और भूख की एक अजीब सी कड़क चमक थी। लड़की थोड़ा शर्माई और आगे बढ़कर उसने अपने होठ सीधे दीपक के होठों से जोड़ दिए।

वह अपने हाथों को दीपक के बालों पर फेर ही रही थी कि अचानक... उसे अपने मुँह के भीतर कुछ बेहद अजीब और खौफनाक महसूस हुआ।

पल भर में उस लड़की का पूरा शरीर तड़पने लगा। वह पागलों की तरह अपने हाथ-पाँव मारने लगी और दीपक की गिरफ्त से खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। लेकिन उसके मुँह से चीखने की कोई आवाज़ बाहर नहीं निकल पा रही थी, क्योंकि उसके होठ दीपक के होठों से बेहद मजबूती से जुड़े हुए थे। उसकी आँखें खौफ के मारे बड़ी-बड़ी हो गईं और उसका पूरा शरीर डर से सिहर उठा।
तभी दीपक ने एक झटके से उस लड़की को खुद से अलग किया।

खिड़की से आ रही चाँद की मद्धम रोशनी में उस लड़की को साक्षात मौत का वीभत्स रूप दिखाई दिया। सामने बैठे दीपक का पूरा चेहरा बर्फ जैसा सफेद हो चुका था, उसकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी—वे सुर्ख सफेद थीं। उसके पूरे चेहरे और गर्दन पर नीली-काली नसें किसी केंचुए की तरह भयानक रूप से कुलबुला रही थीं। उसके मुँह के कोनों से वही गाढ़ा, काला लार छूट रहा था... और इस बार उसके होठों पर उस लड़की का ताज़ा, लाल खून लगा हुआ था।
लड़की ने कांपते हाथों से अपने कटे हुए होठ को छुआ। वह खौफ के मारे भयानक तरीके से चीखती हुई गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर बाहर की तरफ भागी। लेकिन जैसे ही वह गाड़ी से बाहर उतरी, उसे भयानक उल्टियाँ शुरू हो गईं। उसके मुँह से लाल खून के साथ-साथ, रेंगते हुए अजीब से काले-काले कीड़े और वही चमकीला हरा पदार्थ बाहर ज़मीन पर गिरने लगा! वह वायरस थूक के ज़रिए उसके भीतर दाखिल हो चुका था।

तभी... दीपक ने गाड़ी से छलांग लगाई और एक खूंखार बाज़ की तरह पीछे से उस लड़की पर झपट्टा मारा। उसने उसे ज़मीन पर दबोच लिया। वह उसकी तरफ अपनी पुतली-विहीन आँखों से देखता हुआ अपने गले से 'ग्रर्र... ग्रर्र...' की भयानक राक्षसी आवाज़ें निकालने लगा। अचानक ना जाने उस हैवान दीपक को क्या सूझा, उसने अपना मुँह खोला और उस तड़पती हुई औरत के चेहरे पर कुछ उगलना शुरू कर दिया।

वह दृश्य अत्यंत घिनौना था। दीपक के मुँह से सैकड़ों जीवित नीले केंचुए जैसे कीड़े और वह गाढ़ा हरा तरल पदार्थ सीधे उस औरत के पूरे चेहरे और मुँह पर आकर गिरा। वह औरत खौफ और घृणा से पागल हो उठी। उसने अपनी बची-कुची पूरी ताकत लगाई और दीपक को एक ज़ोरदार धक्का देकर खुद से दूर किया। वह ज़मीन पर घिसटती हुई, अपने हाथ से अपने चेहरे पर लगे उस घिनौने हरे पदार्थ और कीड़ों को पोंछती हुई आगे की तरफ भागी।
लेकिन वह इस हैवान की ताकत के आगे कहाँ तक भाग पाती?

दीपक ने एक ही पल में अपने नुकीले नाखूनों वाले मजबूत हाथों से उसके जिस्म को दोबारा धर-दबोचा। उसने एक ही झटके में उसके सारे कपड़े फाड़ दिए और उसकी गूंजती हुई दर्दनाक चीखों की परवाह किए बिना, उसे बेरहमी से घसीटते हुए वापस गाड़ी के भीतर ले आया और दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।

उसके बाद... उस वीरान जंगल के सन्नाटे में केवल उस लड़की की वीभत्स और रोंगटे खड़े कर देने वाली चीखें ही गूंजती रहीं।

कुछ ही मिनटों बाद सब कुछ पूरी तरह ठहर गया।
जब गाड़ी का दरवाज़ा दोबारा खुला, तो अंदर से दीपक बाहर निकला। गाड़ी की सीट से फिसलकर एक खून से सनी हुई कलाई बाहर की तरफ लटकी और ज़मीन पर गिर गई। उन कलाइयों में काँच की रंगीन चूड़ियाँ थीं, जो खून से लाल हो चुकी थीं। दीपक ने गाड़ी के भीतर उस लड़की के नग्न, पूरी तरह से मांस-विहीन हो चुके कंकाल को देखा। लड़की की पथराई आँखें छत को देख रही थीं और उसकी त्वचा का हर एक हिस्सा पूरी तरह सोखा जा चुका था।

दीपक ने शांत होकर अपने होठों से लगा खून पोंछा, और अपने दाँतों के बीच अटके मांस के एक रेशे को उँगली से निकाला। वह नग्न बदन ही पास बनी एक छोटी सी झील  के पास गया। वहाँ के ठंडे पानी से उसने अपना चेहरा और बदन धोया। वापस लौटकर, उसने उस बदनसीब लड़की की सड़ी-गली कंकाल बन चुकी लाश को गाड़ी से बाहर घसीटा और कीचड़ में फेंक दिया।

मांस की भूख मिटते ही दीपक का रूप वापस एक सामान्य, संभ्रांत इंसान में बदल गया। उसने अपने कपड़े पहने, गाड़ी में सवार होते हुए स्टार्ट की और उस वीराने से शहर की तरफ वापस निकल गया।

लेकिन उसके वहाँ से जाते ही... अंधेरे झाड़ियों के पीछे से एक और साया निकलकर उस कंकाल के पास पहुँचा।
वह कोई और नहीं, बल्कि प्रोफेसर रोड्रिगेज था। वह दीपक की हर एक हरकत पर छिपकर नज़र रख रहा था। प्रोफेसर ने जैसे ही कीचड़ में पड़ी उस पूरी तरह से मांस-विहीन, डरावनी कंकाल बन चुकी लाश की तरफ देखा, तो एक बार के लिए उनके पेट में मरोड़ उठी और उन्हें उबकाई आ गई।

पर वे तुरंत सतर्क हुए। उन्होंने डरते हुए इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उन्हें देख तो नहीं रहा। प्रोफेसर ने बिना वक्त गंवाए अपनी जेब से तेज़ाब की एक बड़ी शीशी निकाली। उन्होंने उस शीशी का ढक्कन खोला और वह खौलता हुआ तेज़ तेज़ाब उस पूरी कंकाल लाश और ज़मीन पर बिखरे उस हरे पदार्थ पर उड़ेल दिया। तेज़ाब गिरते ही वह कंकाल धुएं के साथ पिघलने लगा।

प्रोफेसर का चेहरा खौफ से पीला था। वे तेज़ाब डालते हुए खुद से ही पागलपन में बड़बड़ाए, "जो खौफनाक हरकत आज इसने की है...अगर इसने ऐसी ही बाकी लाशों के साथ आगे चलकर ऐसा वीभत्स हरकत किया तो यह संक्रामक वायरस आगे चलकर इस पूरे के पूरे शहर में फैल जाएगा और हर एक इंसान (उन्होंने वाकया अधूरा छोड़ दिया) मुझे इसके सारे सबूत मिटाने होंगे..."

तेज़ाब से उस लाश को पूरी तरह गलाने के बाद, प्रोफेसर रोड्रिगेज जितने जल्दी हो सका वहां से निकल गए।

            --------

कुछ दिन गुज़र गए, आख़िर वह लाश शहरवासियों के सामने आई। फिर एक और ख़ून, इस बार लाश के अवशेष बुरी तरह जले हुए! कई वक़्तों से देर रात गए क्लब से लापता एक वेश्या शीतल की जाँच उस अवशेषों तक पुलिस को पहुँचा चुकी थी, क्योंकि अवशेषों की उंगली में फँसी वह अंगूठी क़ीमती थी। जल्द ही उसकी पहचान लापता शीतल के तौर पर की गई। अब शहर में तनाव पसरने लगा था। इससे पहले जो चौथी लाश मिली थी उसकी पहचान भी मोना नाम की लापता वेश्या के तौर पर हुई थी। गले में मिला उस नेकलेस को तफ़्तीश के दौरान क्लब्स में भटकते पुलिस वाले के दिखाए मधु और जानने वालों ने पहचाना। मधु तो टूट चुकी थी वह सदमे में चली गई, जबकि पुलिस ने यही नतीजा निकाला कि दो हत्याएं वेश्या की हुई थीं—ठीक वैसे ही! बात अख़बारों में आग पकड़ने लगी। शहर को अब औरतों के लिए ग़ैर-सुरक्षित ठहराया जाने लगा। पुलिस पे दबाव बनने लगा, हत्यारे का कोई सुराग अब तक सिफ़र था। बात बढ़ी तो मुख्यमंत्री ने साफ़ तौर पे शहरियों से एलान किया कि देर रात और शाम को औरतें बाहर न रहें ख़ासकर अकेले। पुलिस को कड़ाई से उस हत्यारे का पता लगाने का ज़िम्मा सौंपा गया था। अब धीरे-धीरे इसका आलम यह हुआ कि रात तक आवाजाही बिल्कुल कम होने लगी। कामकाजी महिला तो क्या वेश्यावृत्ति के धंधे में उतरी ऐसी औरतें भी अब किसी अनजान आदमी के साथ कहीं जाने से कतराने लगीं। रात तक शहर के कई हिस्सों में तो जैसे मौत का सन्नाटा पसरने लगा।
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«Reply #10 on: November 01, 2026, 12:38:35 AM »
Chapter 8

क्राइम ब्रांच मुख्यालय के मुख्य केबिन में तनाव इस कदर बढ़ चुका था कि हवा भारी लग रही थी। चीफ ने गुस्से से तमतमाते हुए अखबार टेबल पर दे पटका। अखबार के मुख्य पृष्ठ पर एक और वीभत्स, पूरी तरह सड़ चुकी कंकाल जैसी लावारिस लाश की तस्वीर छपी थी, जिसके इर्द-गिर्द स्थानीय लोगों और पुलिस का हुजूम खड़ा था।

चीफ के सामने इंस्पेक्टर दिलेर हाथ बांधे चुपचाप खड़ा था। हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था और केस की कोई भी ठोस लीड अब तक पुलिस के हाथ नहीं लगी थी। Chief ने चिल्लाकर कहा, "इस शहर में आख़िर हो क्या रहा है दिलेर? एक और खून? इस बार तो हद ही हो गई! वह लड़की बीपीओ की नाइट शिफ्ट में काम करती थी। उसकी लाश का हश्र भी ठीक वैसा ही हुआ है... वह तो गनीमत थी कि उसके पास से उसका कुछ सामान और आईडी बरामद हो गई, वरना इस सूखे कंकाल को पहचान पाना भी नामुमकिन था!"

दिलेर ने अपने चीफ की बात को बीच में ही टोकते हुए गंभीर आवाज़ में कहा, "माफ़ी चाहता हूँ सर। लेकिन यह जो कोई भी हत्यारा है, यह चाहता तो बड़ी आसानी से सबूत मिटा सकता था, लेकिन यह जिन लोगों का कत्ल कर रहा है, वे बिल्कुल अनजान लोग हैं जिनका आपस में कोई दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है। यहाँ तक कि उसे इस बात की भी परवाह नहीं है कि लाश के पास उसके खिलाफ पुलिस के लिए कोई सबूत छूट सकता है! वह जानबूझकर ध्यान नहीं देता। या तो वह बहुत दिलेरी और घमंड से कानून को चुनौती दे रहा है, या फिर लापरवाह है या फिर वह कोई मानसिक रूप से बीमार खूनी है, जो यह सब पूरी तरह बौखलाहट या एक अनस्टेबल दिमागी हालत में कर रहा है। और गौर करने वाली बात यह है सर, कि वह अब लगातार महिलाओं को ही अपना निशाना बना रहा है।"

"सच कहूँ दिलेर, तो मुझे यह मानसिक रोगी वाली बात बिल्कुल कोरी और बेबुनियाद लगती है,"...Chief ने सिगरेट का कश खींचते हुए कहा, "फॉरेंसिक लैब के डॉक्टर्स का साफ़ तौर पर कहना है कि इन लाशों पर किसी बहुत ही बुरे तरीके का रसायन या कोई ऐसी जैविक चीज़ डाली गई है, जो इनके मांस को पूरी तरह गलाते हुए खुद भी नष्ट हो गई! वह चीज़ आज तक विज्ञान के रिकॉर्ड्स में मौजूद किसी भी केमिकल सब्सटेंस, एसिड, या किसी ज्ञात ज़हरीले जानवर के Saliva से भी मैच नहीं खा रही है। फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने अपनी लाइफ में ऐसा कुछ कतई नहीं देखा! वे तो यहाँ तक कह रहे हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है मानो ऐसा कोई तत्व इस पूरी दुनिया में पाया ही नहीं जा सकता!"

"यानी... मेडिकल टीम ने भी हमारे आगे अपने हाथ खड़े कर दिए हैं?" दिलेर ने पूछा।

"दबाव ऊपर से बहुत ज़्यादा बढ़ता जा रहा है दिलेर। शहरवासियों के दिलों में खौफ ने घर कर लिया है, और ऊपर से हर दिन मिलती ये कंकाल बनी लाशें हमारी साख मिट्टी में मिला रही हैं। विदेश से भी कुछ नामी साइंटिस्ट्स इन लाशों के परीक्षण और इन्हें बारीकी से एग्जामिन करने के लिए यहाँ आ चुके हैं। हमारी सबसे काबिल मेडिकल फॉरेंसिक टीम भी रात-दिन उनके साथ जुटी हुई है" Chief ने एक भारी हुंकार भरते हुए पूछा, "बाकी तुम्हारी क्या रिपोर्ट है?"

दिलेर ने एक पल के लिए खुद को संभाला। जैसे ही औरतों के कत्ल की बात आई, उसके ज़हन में मधु का चेहरा कौंध गया और उसके दिल में मधु की सुरक्षा को लेकर भारी फिक्रमंदी जाग उठी। उसने तुरंत अपने जज़्बात पर काबू पाया और कहा, "सर, अब तक जितने भी कत्ल हुए हैं, वे औरतों के ही हो रहे हैं। खास तौर पर नाइट क्लबों से जुड़ी वेश्याओं के, जिनमें हाल ही में मिले दो नाम शीतल और मोना के हैं। ये लड़कियाँ पहले रहस्यमयी तरीके से लापता हुईं और कुछ रोज़ बाद इनकी लाशें कंकाल बनकर शहर के बाहर मिलीं। मोना की पहचान करने में तो हमें खासा वक्त लगा। साफ़ है सर कि ऐसी वेश्याएँ उस कातिल के लिए बहुत आसान शिकार थीं।"

"बिल्कुल, क्योंकि ऐसी औरतों का किसी भी अनजान रईस आदमी की सोहबत में पड़ना और उसकी गाड़ी में बैठ जाना बहुत आसान होता है,"...Chief ने हामी भरी।

इन्स्पेक्टर दिलेर ने कोई जवाब नहीं दिया, बस सिर झुकाकर चीफ की बात को स्वीकार किया।

Chief ने केबिन में पसरे सन्नाटे को तोड़ते हुए पूछा, "किसी पर कोई शक?"

"अब तक तो कोई पुख्ता सबूत नहीं है सर। इन लड़कियों को गायब होने से पहले कई आदमियों के साथ फ्लर्ट करते और बात करते देखा गया था। लेकिन उन संदिग्धों में एक नाम दीपक का भी जुड़ा है... आई मीन, आपके दोस्त डॉ. दीपक मखिजा।"

"हूँ... मैं सुन रहा हूँ"....Chief की आँखें तंग हुईं।

दिलेर ने आगे बताया, "लेकिन उन दोनों कत्ल के वक्त के बीच वह अपने आलीशान घर पर ही था। उसकी एलिबाई  बहुत टाइट है। वैसे भी आजकल वह काफी बीमार चल रहा है, लेकिन क्लब जाने की अपनी पुरानी फितरत उसने अभी तक नहीं छोड़ी है।"

Chief यह सुनकर हल्के से हँसा, "हाँ दिलेर, वह अपनी आदतों से मजबूर है। पर ऐसा नहीं है कि वह इन लड़कियों की सोहबत में नहीं था।"

"आखिरी बार मोना और शीतल को उसी के आस-पास देखा गया था। लेकिन कत्ल ऐसे वक्त में और ऐसी जगहों पर हुए हैं, जिसकी कोई भी शहादत या गवाही दीपक के खिलाफ नहीं दी जा सकती। मोना को तो आखिरी बार सीधे दीपक के साथ ही देखा गया था। मैं खुद सोच भी रहा था कि इस मामले में एक बार फिर निजी तौर पर उससे मिल लूँ। लेकिन अब, BPO वाली लड़की के इस नए मर्डर केस के चलते मेरा शक उस पर से थोड़ा हट ज़रूर गया है...पर वह अभी इस केस से पूरी तरह बरी नहीं हुआ है!, देर-सवेर मैं खुद मालूम कर लूंगा कि इन सारे कत्लों के पीछे आख़िर असली वजह क्या है।"

Chief ने एक बार फिर संजीदा होकर हुंकार भरी। दिलेर ने केबिन से जाने की इजाज़त ली और बाहर निकल गया। लेकिन जाते-जाते वह देख गया कि दीपक मखिजा को लेकर अब खुद चीफ भी नए सिरे से एक गहरी उलझन और कशमकश में पड़ चुके थे।

शाम तेज़ी से ढल रही थी और आसमान पर काले बादलों का पहरा फिर से बैठने लगा था। तभी दिलेर की जेब में रखा फोन बजा। जांच एजेंसी और फॉरेंसिक विभाग से एक अर्जेंट फोन था। क्योंकि इस रहस्यमयी सीरियल मर्डर केस में वो मुख्य इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर के तौर पर नियुक्त था, इसलिए कोई भी केस से जुड़ा मामला उसके सुपुर्द था।

बिना वक्त गंवाए, दिलेर सीधे शहर की मुख्य फॉरेंसिक लैब पहुँच गया। चारों तरफ सफेद कोट पहने डॉक्टर्स की चहल-पहल थी। वहाँ पहुँचते ही रिसेप्शनिस्ट ने दिलेर को देखते ही अंदर के एक विशेष रास्ते की तरफ जाने का इशारा किया।

दिलेर जैसे ही अंदर दाखिल हुआ, उसने पाया कि वह एक बहुत बड़ा, किसी लिविंग हॉल जैसा विशाल मॉर्ग रूम था, जहाँ चारों तरफ स्टील की मेज़ों पर ढेरों लाशें पड़ी थीं। लेकिन उस बड़े हॉल का एक सेक्शन बिल्कुल अलग किया हुआ था। वहाँ दूसरी तरफ एक कतार में कुछ खास लाशें रखी गई थीं, जो पूरी तरह सफेद कफ़न में लिपटी स्ट्रेचर्स पर पड़ी थीं। ये शहर में मिले वे खौफनाक कंकाल थे।

वहाँ पहुँचकर दिलेर ने गरमजोशी से डॉ. माथुर और उनके साथ विदेश से आए उस नामी विलायती डॉक्टर से हाथ मिलाया।

इन्स्पेक्टर दिलेर ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा, "डॉक्टर्स। कोई नई प्रोग्रेस?"

डॉ. माथुर का चेहरा खौफ से पीला पड़ रहा था। उन्होंने दिलेर की तरफ देखा और गंभीर आवाज़ में कहा, "दिलेर... हमें लैब टेस्टिंग में एक ऐसी बात पता चली है जो बेहद खौफज़दा और नामुमकिन करने वाली है।"

इसके बाद डॉ. माथुर और उस विलायती डॉक्टर ने फाइल्स खोलकर विस्तार से बताना शुरू किया, "दिलेर, हमारे पास जितनी भी इन महिलाओं की कंकाल भरी लाशें आई हैं, इन लाशों में से अधिकतर जो नई लाशें हैं... उन्हें मारने से पहले किसी ऐसी अज्ञात चीज़ से उनके मांस और मांसपेशियों को पूरी तरह सोखा गया है, जैसे कोई बेहद खतरनाक रसायन या कोई ज़हरीला जैविक पदार्थ उनके ज़िंदा जिस्मों पर लग गया हो और उसने पल भर में उनके पूरे मांस को खा लिया हो! और सबसे डरावनी बात देखो... कई तरफ से तो इन कंकालों की हड्डियाँ बिल्कुल बीच से चटकी हुई और टूटी हुई हैं, जैसे किसी जंगली जानवर ने नोच-नोच कर मांस को उनकी हड्डियों से पूरी तरह खींचा हो! उस चीज़ ने बदन की चमड़ी तक का एक कतरा नहीं छोड़ा है!"

दिलेर स्तब्ध खड़ा सुन रहा था। विलायती डॉक्टर ने आगे बढ़कर एक स्ट्रेचर से कफ़न हटाया। दिलेर आगे बढ़कर उन लाशों को देखने लगा। विलायती डॉक्टर ने उंगली से इशारा करते हुए कहा, "इनमें से यह जो कुछ लाशें आपने दिखाई हैं, खास तौर पर उस राह चलती BPO वाली नाइटशिफ्ट लड़की की... और उस वेश्या शीतल की... इनके शरीर के साथ एक और क्रूरता की गई है। मांस सोखे जाने के बाद, बाद में किसी बेहद शक्तिशाली एसिड (तेज़ाब) से इनके पूरे जिस्मों को ऊपर से जलाया गया है ताकि कोई सबूत न बचे।"

इन्स्पेक्टर दिलेर का दिमाग भन्ना गया, उसने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा, "माई गॉड... आख़िर... आख़िर यह सब हो क्या रहा है? जिस्म को खा जाने के बावजूद उसके बचे-कुचे अवशेषों पर हत्यारा तेज़ाब डाल रहा है, यह कैसा अमानवीय कृत्य है?"

जिस पर डॉ. माथुर ने दिलेर की आँखों में देखते हुए धीरे से कहा, "तेज़ाब तो नई लाशों पर नए हाल से डाला जाना हम मान सकते हैं, पर जिस्म का मांस सोख लेना...यह नतीजा किसी वायरस की तरफ इशारा करता है,वायरस...दिलेर...यह कोई वायरस है!"

दिलेर ने चौंककर कहा, "वायरस? आपका दिमाग तो ठीक है डॉक्टर?"

डॉ. माथुर ने अपनी थ्योरी समझाते हुए कहा, "हाँ दिलेर! विज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसे बेहद रेयर और खतरनाक वायरसेस (संक्रामक जीव) पाए गए हैं, जो अगर किसी इंसान के सीधे कांटेक्ट में आ जाएँ, तो म्यूटेशन के बाद वे उसके सेल्स को बदलकर उसके भीतर इंसानी मांस खाने की एक अदम्य भूख पैदा कर देते हैं। हो सकता है कि हमारे शहर में कोई ऐसा संक्रमित जीव या कोई ऐसा इंसान घूम रहा है जिस पर इस वायरस का जानलेवा असर हुआ है! और सुनो दिलेर... इन सभी महिलाओं के साथ कत्ल से ठीक पहले दुष्कर्म किया गया है। क्योंकि फॉरेंसिक जांच में इन अधिकतर महिलाओं की पेल्विक बोन (कमर की हड्डी) के अंदरूनी हिस्सों से हमें कुछ ऐसे शुक्राणु के पार्टिकल्स मिले हैं...जो किसी आम इंसान या सामान्य मर्द के तो कतई नहीं लगते!"

दिलेर एकदम अजीब, फटी नज़रों से डॉ. माथुर को देखने लगा, "मतलब?"

तभी विलायती डॉक्टर ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए अपनी बात जोड़ी, "यस इंस्पेक्टर। हो सकता है कि इन औरतों को पहले रज़ामंदी से या फिर इनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करके शारीरिक संबंध बनाया गया हो। उसके बाद, उस संक्रमित व्यक्ति ने...या उस हैवान जीव ने, जो कुछ भी वह था, उसने इनके ज़िंदा जिस्म को अपनी राक्षसी ताकत से नोच-नोच कर खाया हो। लेकिन जहाँ तक हमारी फॉरेंसिक थ्योरी कहती है, यह कोई जानवर नहीं बल्कि एक संक्रमित व्यक्ति ही हो सकता है। क्योंकि ये दोनों लड़कियां वेश्यावृत्ति से जुड़ी थीं। अगर कोई ऐसा अनजान शख्स उनके संपर्क में आया होगा, तो वे उसे पहली दफ़ा तो एक आम इंसान ही समझेंगी ना? वे किसी जानवर के साथ गाड़ी में क्यों बैठेंगी?"

दिलेर यह सुनकर अजीब ढंग से हँसने लगा। उसने अपना सिर हिलाया और कहा, "अगर ऐसा है सर, तो यह नामुमकिन है। आपके कहने का मतलब है कि कोई जीता-जागता इंसान किसी अज्ञात वायरस से संक्रमित होकर हैवान बन चुका है? तो फिर यह वायरस आया कहाँ से? और अगर यह इतना खतरनाक वायरस है, तो यह पूरे शहर में एक महामारी की तरह क्यों नहीं फैला? सिर्फ यही कुछ लोग क्यों मरे?"

विलायती डॉक्टर ने तुरंत जवाब दिया, "यह हवा से नहीं फैल सकता इंस्पेक्टर। क्योंकि अगर यह तेजी से हवा या पानी से फैला होता, तो अब तक आधा शहर इसकी चपेट में आ चुका होता। यह वायरस सिर्फ डायरेक्ट फ्लूइड कांटेक्ट (शारीरिक संबंध या भक्षण) से ही एक इंसान से दूसरे इंसान के शरीर तक पहुँच रहा है। हमें इन तीनों लड़कियों में और बाकी के कंकालों में जो रासायनिक एलिमेंट्स और अज्ञात सेल्स मिल रहे हैं, वे किसी बेहद एडवांस्ड और संक्रामक वायरस की तरह ही काम कर रहे हैं। ऐसा वायरस दुर्लभ होता है, कहीं भी आसानी से पाया नहीं जाता। ज़रूर इसे कहीं से न सिर्फ लाया गया है, बल्कि जानबूझकर किसी ऐसे व्यक्ति को लगाया गया है जो संक्रमित हुआ—जैसे कोई लैब ह्यूमन एक्सपेरिमेंट! कोई भी किसी इंसान किसी से बदला लेने के लिए ऐसा दुर्लभ वायरस आख़िर कहाँ दुनिया के कोने में ढूँढता फिरेगा? यह किसी बड़े ह्यूमन एक्सपेरिमेंट कॉन्स्पिरेसी का दुर्लभ मामला लग रहा है।"....डॉ. माथुर ने अपने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा। "लेकिन हम इतनी जांच-पड़ताल और वर्ल्ड-क्लास मशीनों के बावजूद सही से दावों के साथ बता नहीं पा रहे हैं कि आख़िर यह वायरस किस प्रजाति का है, इसके लक्षण क्या हैं...और यह आपके देश और आपके इस गुमनाम शहर में आख़िर आया कैसे?"

जिस पर दिलेर ने अपनी खोजी बुद्धि दौड़ाते हुए कहा, "हो सकता है सर कि किसी ने इनके ऊपर कोई अवैध वैज्ञानिक प्रयोग किया हो? पहले इन गरीब वेश्याओं को पैसों का भारी लालच दिया गया हो, या फिर इनमें से जो अच्छी-भली कामकाजी लड़कियाँ थीं, उन्हें चुपचाप अगवा  किया गया हो और किसी अंडरग्राउंड लैब में उनके साथ ऐसा खौफनाक टॉर्चर किया गया हो।"

डॉ. माथुर ने बीच में टोकते हुए कहा, "दिलेर, तुम जो बोल रहे हो वह आधा सच हो सकता है। लेकिन यह मत भूलो कि इन लाशों में दो लाशें इंसानी मर्दों की भी हैं! जो उस मोटल में मिले थे। हो सकता है कि वे दोनों उस संक्रमित जीव या उस हैवान के रास्ते में आ गए हों, और अपनी भूख मिटाने या रास्ता साफ़ करने के लिए उसने उन मर्दों पर भी वैसा ही हमला कर दिया हो।"

दिलेर ने गहरी सांस लेकर हामी भरी, "आप सही कह रहे हैं सर। मामला हमारी सोच से कहीं ज़्यादा परे है।"

वे तीनों फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स इसी गंभीर विषय पर बात करते हुए मॉर्ग रूम के उस बड़े दरवाजे से बाहर निकल गए। लेकिन... जाते-जाते उनकी नज़रों के पीछे, उन्हें इस बात का ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि उस अंधेरे मॉर्ग रूम की एक बड़ी स्टील की अलमारी की आड़ में कोई और शख्स पहले से वहाँ छिपकर मौजूद था और उनकी यह तमाम बेहद गोपनीय बातें अपने कानों से सुन चुका था!

जैसे ही दिलेर और डॉक्टरों के कदमों की आवाज़ बाहर गलियारे में दूर हुई, उस अंधेरे कोने से वह साया बाहर निकला।

वह कोई और नहीं, बल्कि प्रोफेसर रोड्रिगेज थे! वे एक बड़े सर्जिकल मास्क,और अपने सिर को एक सर्जिकल कैप से पूरी तरह छुपाए हुए वहाँ छिपे थे। उन्होंने ऊपर से एक बड़ी विलायती ओवरकोट जैकेट ओढ़ रखी थी और गले में एक सफ़ेद आला लटका रखा था ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। उनके बूढ़े चेहरे पर खौफ और घबराहट साफ़ दिख रही थी। वे जानते थे कि अगर फॉरेंसिक लैब ने इन कंकालों के भीतर मौजूद उस सीमेन और एक्टिव हरे वायरस के जीन्स को पूरी तरह डिकोड कर लिया, तो डॉ. दीपक मखिजा के साथ-साथ उनका अपना नाम भी पूरी दुनिया के सामने आ जाएगा और उनका ५६ साल पुराना साइबेरिया का खौफनाक राज खुल जाएगा।

प्रोफेसर तेज़ी से उन स्ट्रेचर्स की तरफ बढ़े जहाँ prostitute मोना, शीतल और BPO वाली लड़की के कंकाल पड़े थे। बिना एक पल का वक्त गंवाए, प्रोफेसर ने अपनी जैकेट के अंदरूनी पॉकेट से उसी शक्तिशाली एसिड की एक बड़ी बोतल निकाली। उन्होंने कांपते हाथों से वह तेज़ तेज़ाब उन सभी लाशों के पेल्विक बोन और बचे-कुचे अवशेषों पर सीधे उड़ेल दिया! उसने मेघना, बगल में रखी उसके पति की लाश और आख़िर में उस टैक्सी ड्राइवर के कंकाल नुमा लाश के कफ़न को हटाते हुए उनपर भी खौलता वो तेज़ाब डाल दिया; वो बार-बार खुले बाहर के दरवाज़े की तरफ भी देख रहे थे।

तेज़ाब गिरते ही उन लाशों की हड्डियों से 'छर्र-छर्र' की आवाज़ आने लगी और धू-धू करके गाढ़ा, सफ़ेद ज़हरीला धुआं कमरे में उठने लगा। कंकालों में छिपे वे सारे फॉरेंसिक सबूत, वे शुक्राणु और वायरस के अंश पल भर में जलकर पूरी तरह खाक होने लगे।

प्रोफेसर रोड्रिगेज ने बोतल वापस जेब में रखी और हाफंते हुए उस ज़हरीले धुएं के बीच से निकलकर मॉर्ग रूम के पिछले दरवाज़े की तरफ भागने ही वाले थे कि तभी... लैब के बाहर गलियारे में खड़े दिलेर और दोनों डॉक्टरों की नाक में जलती हुई हड्डियों और तेज़ाब की वह अजीब, तीखी गंध पहुँची।

"यह कैसी गंध है?" डॉ. माथुर चिल्लाए।

वे तीनों फौरन मुड़े और भागते हुए मॉर्ग रूम के भीतर दाखिल हुए। अंदर का नज़ारा देखकर डॉ. माथुर पूरी तरह हैरान रह गए। स्ट्रेचर्स पर पड़ी वे खास लाशें धुएं के गुबार के बीच तेज़ी से पिघल रही थीं। डॉ. माथुर अजीब, फटी नज़रों से देखते हुए हड़बड़ाकर चिल्लाए, "माय गॉड! माथुर... दिलेर... ये सब क्या हो रहा है? हमारी लाशें जल रही हैं! कोई अंदर है!"

इन्स्पेक्टर दिलेर की पुलिसिया फुर्ती जाग उठी। उसने देखा कि लैब के पिछले दरवाजे का पल्ला अभी-अभी हिला था। वह बिजली की गति से बाहर की तरफ निकला। जैसे ही वह गलियारे से बाहर मुख्य निकास की तरफ आया, उसने एक डॉक्टर के गेटअप में सर्जिकल मास्क पहने एक शख्स को पूरी ताकत से नीचे सीढ़ियों की तरफ दौड़ते हुए भागते देखा।

"ठहर जाओ! पुलिस!" दिलेर चिल्लाया।

वह पूरी फुर्ती और ताकत से उस भागते हुए साये के पीछे लपका। प्रोफेसर रोड्रिगेज अपने बूढ़े शरीर के बावजूद, पकड़े जाने के डर से पागलों की तरह दौड़ रहे थे। वे सीढ़ियों से नीचे उतरे, फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट का मुख्य गेट पार किया और सीधे नीचे मुख्य हाईवे की चौड़ी सड़क पर उतरकर आगे की तरफ भागने लगे। शाम का अंधेरा बढ़ चुका था और सड़क पर गाड़ियाँ तेज़ी से गुज़र रही थीं।
दिलेर उनके पीछे दौड़ रहा था। फासला कम हो रहा था, लेकिन प्रोफेसर सड़क की भीड़ का फायदा उठाकर गायब हो सकते थे। इससे पहले कि प्रोफेसर रोड्रिगेज उसकी पहुँच से दूर निकल पाते, दिलेर ने दौड़ते-दौड़ते ही अपनी कमर के होल्स्टर से अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और सीधा हवा में एक ज़ोरदार फायरिंग कर दी!

गोली की वह कान फोड़ देने वाली आवाज़ सड़क पर गूंज उठी। गोली की आवाज़ सुनते ही प्रोफेसर रोड्रिगेज के पैरों के प्राण जैसे सूख गए। वे वहीं ठिठक कर थम गए। खौफ और थकावट के मारे उनके घुटने जवाब दे गए और वे अपने दोनों हाथ हवा में खड़े करते हुए बुरी तरह से सड़क के किनारे गिर पड़े।

दिलेर ने तेज़ी से आगे बढ़कर पिस्तौल उनके सिर पर तान दी। तब तक गोली की आवाज़ सुनकर आसपास गश्त कर रही पुलिस की एक बड़ी पीसीआर वैन और भारी दल-बल भी वहाँ मौके पर पहुँच गया।

इन्स्पेक्टर दिलेर ने उस शख्स को अपनी हिरासत में ले लिया था। दिलेर ने घुटनों के बल पड़े उस कांपते हुए बूढ़े शख्स के चेहरे से जैसे ही वह सर्द सर्जिकल मास्क और कैप खींची, हेडलाइट्स की रोशनी में उसका चेहरा साफ़ दिखाई दिया।

दिलेर का मुँह अचरज से खुला का खुला रह गया। सामने कोई आम चोर या कातिल नहीं था, बल्कि उसी प्रतिष्ठित लैब रिसर्च इंस्टीट्यूट के सरकारी महकमे का एक बहुत ही प्रसिद्ध और सम्मानित प्रोफेसर रोड्रिगेज था! दिलेर उसे देखकर पूरी तरह हैरत में पड़ गया कि आख़िर इस नामचीन साइंटिस्ट का इन कंकाल बनी लाशों के सबूत मिटाने से क्या ताल्लुक था?

                                ----

रात एक बार फिर से पूरी तरह ढलने लगी थी।, पूरे शहर में मरघट सा सन्नाटा पसरा हुआ था। सड़कें सूनी थीं। लेकिन उस नामचीन नाइट क्लब की चकाचौंध रंगीन रोशनियाँ हमेशा की तरह चालू थीं, हालांकि आज वहाँ ग्राहकों की भीड़ ना के बराबर थी।

क्लब के एक कोने वाले सोफे पर मधु बिल्कुल गुमसुम और तन्हा बैठी थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे। मोना की भयानक मौत के सदमे ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था। आज रात उसका आखिरी फैसला था कि उसे क्या करना था। वह इस कशमकश में बुरी तरह खिंची हुई थी कि वह यह धंधा हमेशा के लिए छोड़ दे, लेकिन घर की माली हालत इतनी खराब थी कि वह चाहकर भी तुरंत कदम नहीं उठा पा रही थी। वह दिलेर की कही हर एक बात को याद कर रही थी।

वह इसी सोच में डूबी थी कि अचानक...क्लब की बुझती-जलती रंगीन रोशनियों के नीचे से गुज़रता एक रौबदार शख्स उसके पीछे साए की तरह आ खड़ा हुआ, मधु के बैकलेस ब्लाउज और खुली गोरी पीठ पे बंधी डोरियां देख, वो उसे पीछे से ललचाई नज़रों से घूरने लगा और उसने बड़े अधिकार से मधु के कंधे पर अपना हाथ रख दिया और मुस्कुराता हुआ उसके ठीक बगल में कुर्सी पर बैठ गया।

मधु एकदम से हड़बड़ा गई। उसने इस रसूखदार आदमी को पहले भी एक-दो दफ़ा क्लब में बार काउंटर के पास बैठते देखा था, लेकिन वह उसे निजी तौर पर नहीं पहचानती थी। उसे लगा कि यह कोई बेहद अमीर और रईसदार इंसान है जो उसकी तरफ उन्हीं नज़रों से देख रहा था...जैसी हवस भरी और गंदी नज़रों से अक्सर क्लब के कस्टमर्स और क्लाइंट्स उसे देखते थे।

मधु ने खुद को संभाला और अपने हाथ में थमा शराब का ग्लास मुँह से लगा लिया।

दीपक ने उसकी सुंदर गर्दन और उसकी कीमती साड़ी को देखते हुए बड़ी मखमली, कामुक आवाज़ में कहा, "उफ्फ! एक तो इतनी बेपनाह खूबसूरती... और ऊपर से शराब का  चस्का! क्या... क्या कहने मैडम? शराब और शबाब दोनों ही भरपूर कूट-कूट कर भरे हैं आप में।"

मधु ने अपनी आँखें तरेरकर उसकी तरफ देखा और ठंडे लहजे में पूछा, "आपकी तारीफ?"

दीपक हल्के से हँसा, "मेरा नाम डॉ. दीपक मखिजा है। मैं इस शहर का एक नामचीन डॉक्टर हूँ और यहाँ अक्सर आता रहता हूँ। मैं तुम्हें कई दिनों से दूर से देखता था... आज सौभाग्य से यह हसीन मौका मिल ही गया।"

मधु ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा, "अच्छा? तो डॉक्टर साहब, आख़िरकार जब आपका यहाँ की बाकी तमाम जवान औरतों से जी भर गया तो उसके बाद आप घूम-फिर कर मेरे पास आए हैं?"

दीपक यह तीखा जवाब सुनकर थोड़ा कसमसाया, उसका ईगो थोड़ा आहत हुआ, पर फिर वह मुस्कुराया। उसे मधु की यह बेबाक और तीखी अदा बेहद भा गई थी। उसके भीतर का हैवान उस ताज़ा मांस की खुशबू को भाँप चुका था।

दीपक ने उसके और करीब होते हुए दोबारा कहा, "शायद तुम्हें मालूम नहीं है, आजकल इस शहर की खूबसूरत औरतें रात के वक्त अचानक लापता हो रही हैं। हालात अच्छे नहीं हैं। तुम जैसी हसीन औरत को इतनी रात गए अकेले यहाँ ऐसे बार में बैठा रहना नहीं चाहिए... यह सुरक्षित नहीं है।"

मधु ने एक लंबी सांस ली और ग्लास रखते हुए कहा, "क्या करूँ डॉक्टर साहब? इंसान को उसकी मजबूरी ही ऐसे गंदे रास्तों पर खींच लाती है। खैर...मुझे अब यहाँ से चलना चाहिए।"

मधु जैसे ही सोफे से उठकर आगे बढ़ने लगी, दीपक ने बिजली की फुर्ती से आगे बढ़कर कसकर उसकी चूड़ियों से भरी कलाई को अपने हाथ में थाम लिया।

मधु एकदम से गहरी हैरत और खौफ से उसे देखने लगी, "यह क्या बदतमीज़ी है? हाथ छोड़ो मेरा!"

दीपक ने तुरंत अपनी पकड़ ढीली की और उसका हाथ छोड़ दिया। उसने अपनी आँखों में एक झूठा, मखमली प्यार लाते हुए बड़े एहतियात से कहा, "माफ़ करना, मेरा वो इरादा नहीं था। अगर आप बुरा न मानें...तो क्या आज रात आप कुछ वक्त मेरे साथ बिताना चाहेंगी?।"
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«Reply #11 on: November 01, 2026, 12:39:22 AM »
मधु बिल्कुल झिझक गई, उसके कदम वहीं ठहर गए। हालांकि, एक पेशेवर होस्टेस के तौर पर उसका काम यही था कि वह आए हुए रईस ग्राहक को रिझाए, अपनी अदाओं से उसे कायल करे और उसके साथ चली जाए... लेकिन ना जाने क्यों, आज उसके भीतर एक बहुत बड़ी जंग चल रही थी। एक तरफ उसकी पक्की सहेली मोना की मौत का गहरा सदमा था, और दूसरी तरफ इंस्पेक्टर दिलेर की वे पाकीज़ा बातें थीं जिन्होंने उसके दिल को भीतर तक पूरी तरह बदल डाला था। वह आज रात यहाँ सिर्फ अपनी माली हालत के उस आखिरी दबाव के चलते आई थी। वह सोच रही थी कि इतनी जल्दी वह दिलेर से किया हुआ वादा कैसे तोड़ दे?

उसने दीपक की तरफ देखा, वह अंदर से कांप रही थी, पर उसने चेहरे पर एक पेशेवर मुस्कान ला दी।

दीपक ने उसकी कलाई को दोबारा हल्के से छुआ और कहा, "चलिए पहले थोड़ा डांस कर लेते हैं।"

वह मधु को हाथ पकड़कर डांस फ्लोर की तरफ ले गया।
 
क्लब में मद्धम रोमांटिक धुन बज रही थी। दीपक ने मधु की कमर और उसके हाथों को अपने हाथों में थामा और वे हल्की धुन में एक-दूसरे के करीब नाचने लगे। दीपक नाचते हुए बड़ी गौर से, भूखी नज़रों से मधु के चेहरे और उसके होठों को देख रहा था। उसके शरीर के भीतर के कीड़े अब मधु के बदन को सोखने के लिए बेताब हो रहे थे।

लेकिन, मधु का दिल उस डांस में कतई नहीं लग रहा था। उसकी रूह कांप रही थी।

तभी दीपक ने उसके कान के पास अपना मुँह लाया और फुसफुसाते हुए पूछा, "तो फिर...माय प्लेस और योर प्लेस?"

मधु ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "जी?"

दीपक ने कहा, "यहाँ बहुत शोर-शराबा है मैडम। क्यों न हम कहीं शांत जगह चल के बात करें? तुम्हारी जो भी पसंद हो, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पैसे की तुम फिक्र मत करना।"

मधु अंदर से झिझकने लगी, वह कशमकश में थी और कुछ कह नहीं पा रही थी। लेकिन दीपक ने उसकी झिझक का फायदा उठाया। उसने बड़ी हिम्मत से उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खींचता हुआ क्लब के मुख्य दरवाज़े से बाहर ले आया, क्लब के भीतर बज रहा लाउड म्यूज़िक अब उनके कदमों की आहट के पीछे धीमा पड़ रहा था।

ना चाहते हुए भी मधु उसके साथ खिंचती हुई चली गई, वो उसे साफ़ मना कर देती लेकिन उस आदमी में कुछ ऐसा अजीब था जिस आकर्षण से वो मना नहीं कर पाई, ऊपर से वो मुँह मांगी रकम देने को तैयार था, वो कोई शराबी अय्याश से ज़्यादा शालीन और जेंटल उसके साथ बर्ताव कर रहा था, अक्सर उसे ऐसे मर्दों की तलाश होती थी आज जब एक मर्द खुद चलकर आया तो वो उसे इंकार कर रही थी, उसके मन ने माना अगर ये जो कुछ हो रहा था, आखिरी दफा था इसके बाद वो इन सब चीज़ों से हमेशा के लिए किनारा कर लेगी चाहे आगे कुछ भी हो।

बाहर रात काफी बीत चुकी थी और पूरे रास्ते में एक भयानक, मरघट सा सन्नाटा छाया हुआ था। ठंडी हवाएँ चल रही थीं।

मधु ने गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए थोड़ा फिक्रमंद होकर कहा, "वैसे...आजकल शहर में औरतें वाकई सुरक्षित नहीं हैं। रात का यह सन्नाटा डराता है।"

दीपक ने गाड़ी का लॉक खोलते हुए अजीब आवाज़ में पूछा, "क्या तुम मानती हो कि वाकई इस शहर में कोई ऐसा खतरनाक इंसान घूम रहा है जो औरतों को लापता कर रहा है?"

मधु ने कहा, "क्यों नहीं डॉक्टर साहब? बड़े-बड़े शहरों में अक्सर ऐसे लोगों के बड़े गैंग और रैकेट चलते हैं, जहाँ जवान औरतें या शादीशुदा महिलाएँ गायब कर दी जाती हैं। खैर...आप इतनी हसीन रात में ये सब डरावनी बातें करने लगे?"

दीपक ने गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए एक गहरी, शैतानी मुस्कान दी, "वाकई... मैं तो बस तुम्हारी फिक्र कर रहा था।" उसने मधु की आँखों में देखा, "तो ठीक है, क्यों न आज की यह रात हम दोनों साथ गुज़ारें?"

मधु ने उसकी रईसी और पैसों की मजबूरी के आगे घुटने टेक दिए। वह मुस्कुराई और दीपक के साथ उसकी महँगी गाड़ी में जाकर बैठ गई।

डॉ.दीपक मखिजा आख़िरकार अपने नए शिकार को जाल में फंसाने में पूरी तरह कामयाब रहा था। उसने एक विजेता की तरह घेरा काटकर गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया, खुद ड्राइविंग सीट पर आ बैठा, चाभी घुमाकर गाड़ी स्टार्ट की... और घने कोहरे व मुर्दानी सन्नाटे को चीरता हुआ, वह मधु को अपने साथ सीधे अपने उसी अंधेरे मैंशन की तरफ ले जाने लगा...जहाँ मौत उसका इंतज़ार कर रही थी!
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«Reply #12 on: November 01, 2026, 12:44:16 AM »
Chapter 9

काली चमचमाती गाड़ी शहर की सुनसान सड़कों को चीरती हुई तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। आसमान में काले-घने बादलों का पहरा गहरा चुका था और ठंडी हवाओं के थपेड़े खिड़कियों से टकरा रहे थे। ड्राइविंग सीट पर बैठा डॉ. दीपक मखिजा बड़ी बेताबी से एक्सीलेटर दबा रहा था, जबकि उसके बगल में बैठी मधु के दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं।

रास्ते के सन्नाटे के बीच, दीपक ने बड़ी सहजता से अपना हाथ मधु की जांघ पर रख दिया। उसकी ठंडी चमड़ी का स्पर्श होते ही मधु का पूरा शरीर कसमसा उठा और उसने असहज होकर अपनी साड़ी को थोड़ा आगे खींच लिया।
दीपक ने उसकी इस हिचकिचाहट को ताड़ लिया। उसने आहिस्ता से अपना हाथ हटाया, स्टीयरिंग व्हील को कसकर पकड़ा और एक गहरी, शातिर मुस्कान के साथ कहा, "उफ्फ! आप जैसी लज्जा पाने वाली औरतें मुझे बेहद पसंद हैं।"

मधु ने झेंपते हुए अपनी नज़रें खिड़की से बाहर टिका दीं और दबी आवाज़ में कहा, "नहीं... दरअसल, आई एम सॉरी।"

दीपक ने हल्के से हँसते हुए पूछा, "सॉरी? सॉरी फॉर व्हाट?"

"नहीं... कुछ नहीं," मधु ने बात टाल दी।

कुछ देर गाड़ी के भीतर भारी खामोशी पसरी रही। केवल टायर और गीली सड़क के रगड़ने की आवाज़ आ रही थी। दीपक ने सामने देखते हुए कहा, "वैसे कहना पड़ेगा... अगर आप किसी की भी बीवी होतीं, तो उस इंसान की किस्मत के क्या कहने!"

मधु के चेहरे पर एक उदास साया छा गया। उसने खामोशी को तोड़ते हुए कहा, "मेरे पति नहीं हैं। मेरे हस्बैंड को मरे कुछ साल हो चुके हैं।"

दीपक ने चेहरे पर बनावटी दुःख लाते हुए अफसोस जताया, "ओह, आई एम सो सॉरी..."

मधु ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया। इस वक्त उसके दिमाग और दिल के भीतर एक भयानक जंग चल रही थी। उसकी मजबूरी, घर के खर्चे और उसकी खराब माली हालत उसे बार-बार इस बदनाम धंधे की तरफ धकेल रही थी, लेकिन उसका दिल अंदर से चीख-चीख कर उससे कुछ और ही कह रहा था। उसके भीतर से आवाज़ आ रही थी कि वह इसी वक्त गाड़ी रुकवाए, नीचे उतरे और भागकर सीधे इंस्पेक्टर दिलेर के पास चली जाए। दिलेर... जिसने अपनी जिंदगी में पहले ही इतना दर्द झेला है, वह उसे और क्यों तड़पाना चाहती है? वह दिलेर के उस पाकीज़ा प्यार और वादे को इस तरह चंद रुपयों के लिए क्यों तोड़ रही है?

मधु इसी भयानक कश्मकश में घुट रही थी कि तभी दीपक ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर उसे बाहर देखने का इशारा किया।

सर्द कोहरे और बादलों की ओट से छनकर आती चाँद की रोशनी में मधु ने देखा कि आगे एक बहुत बड़ा, वीरान और आलीशान मैंशन खड़ा था। मधु के मुँह से अचरज में निकला, "यह...यह आपका इतना बड़ा घर है?"

"जी हाँ," दीपक ने गर्व से कहा।

मधु पूरी तरह अवाक थी, "आप अकेले रहते हैं इतने बड़े घर में?"

दीपक ने अपनी आवाज़ में एक जज्बाती, झूठा भारीपन लाते हुए कहा, "कभी मैं भी आपकी तरह किसी के साथ था... लेकिन अब वो मेरे साथ नहीं है। इसीलिए यूँ ही राह चलता, क्लब में अपना वक्त गुज़ारने और कभी-कभार ड्रिंक लेने आ जाता हूँ। अब आप जैसी खूबसूरत साथी मिल गई, तो और क्या चाहिए? आज मेरी किस्मत वाकई बहुत अच्छी है।"

मधु ने औपचारिकता में एक फीकी मुस्कान दी। दीपक ने गाड़ी को लंबी, सूनी राहदारी (पैसेज) के भीतर डाला। मैंशन के मुख्य दरवाज़े के आगे आकर गाड़ी एक झटके से रुक गई। दीपक फुर्ती से नीचे उतरा, मोड़ काटकर दूसरी तरफ आया और उसने खुद दरवाज़ा खोलकर मधु का स्वागत किया।

जैसे ही वे गाड़ी से बाहर निकले, दीपक ने कड़े हाथों से मधु की कमर में अपना हाथ डाला और उसे अपने साथ अंदर ले जाने लगा। दीपक के उस स्पर्श से आज मधु को अपने पूरे बदन में एक अजीब सी घिन और सिहरन महसूस हुई। आज तक इस धंधे में उसे कभी कुछ अच्छा नहीं लगा था, मजबूरी ने ही उसे न जाने आज तक कितने मर्दों के साथ सोने पर मजबूर किया था, लेकिन आज का यह अहसास कुछ अलग था। आज उसका पूरा वजूद चीख रहा था। वह दिल ही दिल में चाह रही थी कि काश दिलेर उसे इस तरह छुए...काश दिलेर ने कभी अपनी तरफ से पहल की होती! उस रात जीप के भीतर जो कुछ हुआ था, उसे याद करके मधु आज भी खुद पर काबू नहीं पा रही थी।

वे दोनों मैंशन के भीतर आए। चारों तरफ अंधेरा था, केवल दीपक ने बेडरूम की एक मद्धम बत्ती चालू की। दीपक आगे बढ़ा, उसने शेल्फ से शराब की बोतल निकाली और दो बड़े जाम बनाकर एक ग्लास मधु के आगे रख दिया। उन्होंने 'चीयर्स' कहकर अपने ग्लास टकराए। दीपक ने अपना पूरा जाम एक ही सांस में गटक लिया, जबकि मधु ने आधा ग्लास पीने के बाद उसे वहीं मेज़ पर छोड़ दिया और चुपचाप खामोश बैठ गई।

दीपक उसके बिल्कुल सटकर बिस्तर पर बैठ गया। वह वासना और भूख की आग में जल रहा था। उसने अपने होठों को मधु के करीब लाने के लिए अपने हाथों से उसकी ज़ुल्फ़ों को सहलाना शुरू किया। उसने मधु के चेहरे पर अपना हाथ रखा और अपना चेहरा उसके बेहद करीब ले आया। उसकी ठंडी, बेजान सांसें मधु के चेहरे से टकराने लगीं।

मधु का दम घुटने लगा। वह झटके से पीछे हटी, बिस्तर से खड़ी हो गई और कांपती आवाज़ में बोली, "मुझे... मुझे कुछ...मैं बाथरूम जाना चाहती हूँ।"

दीपक उसकी इस झिझक पर ज़ोर से हँसा और उँगली से बाथरूम का रास्ता दिखा दिया, "ज़रूर... गो अहेड।"

मधु तेज़ी से बाथरूम के भीतर घुसी और दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने बेसिन का नल खोला और ठंडे पानी से अपने चेहरे को धोने लगी ताकि वह अपनी घबराहट पर काबू पा सके। लेकिन जैसे ही उसने अपना चेहरा धोकर तौलिये की तरफ हाथ बढ़ाया, अचानक उसकी नज़र नीचे 'हिमाम' के अंदरूनी कोने पर पड़ी।

वहाँ अंधेरे में कुछ चमक रहा था। मधु ने नीचे झुककर देखा और उसे अपनी उंगलियों से ऊपर उठाया। वह एक सोने की इयररिंग (झुमका) थी।

उस इयररिंग को देखते ही मधु के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसका पूरा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। यह कोई आम इयररिंग नहीं थी—यह वही इयररिंग थी जो उसकी पक्की दोस्त मोना ने पहनी थी! और यह इसलिए बिल्कुल खास थी क्योंकि मोना को यह डिज़ाइन बहुत पसंद आया था, और पूरे शहर की ज्वेलरी शॉप में इसका सिर्फ एक ही पीस था, जिसे मधु ने खुद खरीदकर मोना को तोहफे के तौर पर दिया था।

मधु का दिमाग तेज़ी से घूमने लगा। इसका सीधा सा मतलब था कि मोना लापता होने से पहले यहाँ, इसी आलीशान मैंशन के भीतर आई थी! और उसके बाद ही... उसके बाद ही तो उसकी मौत की वह भयानक खबर अखबारों में छपी थी!

खौफ और शक से कांपती हुई मधु बाथरूम से बाहर निकली। उसकी निगाहें सीधे बिस्तर पर टिक गईं। दीपक तब तक अपने सारे कपड़े उतार चुका था और नग्न हालत में बिस्तर पर लेटा हुआ, मुस्कुराते हुए मधु को अपनी तरफ आने का इशारा कर रहा था।

मधु ने डर व शर्म के मारे अपनी नज़रें तुरंत नीचे झुका लीं। उसने हिम्मत जुटाई और कांपते होठों से पूछा, "आपसे... आपसे एक बात पूछूँ? क्या आप मोना नाम की किसी लड़की को जानते हैं?"

'मोना' का नाम सुनते ही बिस्तर पर लेटे दीपक का चेहरा अचानक पूरी तरह संजीदा और सख्त हो गया। वह झटके से उठकर बिस्तर पर बैठा और मधु की तरफ गौर से देखने लगा, "हूँ... हाँ, मोना! मैं उससे नरीम पॉइंट के उसी क्लब में मिला था... एक रात।"

मधु ने अपनी मुट्ठी खोली और वह सोने का झुमका दीपक के सामने कर दिया।

उस इयररिंग को देखते ही दीपक के चेहरे के भाव पूरी तरह कड़े हो गए। लेकिन अगले ही पल, उसने अपनी भावनाओं पर काबू पाया और मुस्कुराता हुआ बिस्तर से उठा। उसने मधु के हाथ से वह इयररिंग ली और दीवार पर लगे आईने की तरफ बढ़ गया, "हाँ...आई थी वो मेरे साथ यहाँ। बाद में मैंने सुना कि उसका बेरहमी से कत्ल हो गया... बेचारी, बहुत ही अच्छी और खूबसूरत लड़की थी।"

दीपक जैसे ही आईने में देख रहा था, उसकी यादों के पर्दे पर उस रात का पूरा भयानक वाकया गुज़रने लगा—मोना की वह गूंजती हुई होलनाक चीख, उसका नग्न खून से सना हुआ बदन, और कैसे उसने जानवरों की तरह उसकी मांसपेशियों को नोच-नोच कर सोखा था। यह याद आते ही दीपक की जीभ सूखी।

मधु ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, "क्या आप जानते हैं कि आखिरी बार आपने उसे कहाँ छोड़ा था?"

"मालूम नहीं," दीपक ने चिढ़ते हुए कड़े लहजे में कहा, "वह यहाँ से निकल गई थी... देर रात गए ही। उसके बाद फिर वह मुझे कभी नहीं दिखी। खैर, छोड़ो भी वह पुराना किस्सा! हमारी बातों का रुख कहीं और था।"

दीपक की आवाज़ की चिढ़ और उसकी आँखों का खालीपन दोबारा हवस की नीयत की तरफ बदलते देखकर मधु को पक्का यकीन हो गया कि कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ है। उसने कहा, "शायद आपको मालूम न हो डॉक्टर साहब...पर मोना मेरी सबसे पक्की दोस्त थी।"

"आई सी..." दीपक मन ही मन मुस्कुराता हुआ आईने में अपने चेहरे को देख रहा था, "लेकिन जो चला गया, उसके बारे में अब क्या खोजबीन करना? वैसे...मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि उसका कत्ल किसने किया। बल्कि मैं यह भी जानता हूँ कि उसे किसी ने पुरानी दुश्मनी या नफरत में आकर नहीं मारा...उसके पीछे की वजह कुछ और ही थी।"

मधु की आँखें डर और हैरत से फैल गईं, "आप जानते हैं? अगर आप जानते हैं तो आपने यह बात पुलिस को क्यों नहीं बताई?"

दीपक घुमा और मधु की तरफ बढ़ने लगा, "पुलिस तो वैसे ही उन मर्दों पर शक कर रही है जिन्हें मकतूलों के साथ आखिरी बार देखा गया था। मैं भला खामोखाह उनके शक के दायरे में क्यों घिरूँ? वैसे...हम यहाँ किसी और ही मोड़ पर थे मोना...सॉरी, मधु!"

उसने आगे बढ़कर धीरे से अपना हाथ मधु के चेहरे पर रखना ही चाहॉ था कि मधु ने झटके से उसका हाथ पीछे हटा दिया, "देखिए...रात बहुत हो चुकी है। मुझे अब अच्छा नहीं लग रहा, मुझे यहाँ से जाने की इजाज़त दीजिए।"

दीपक ने उसकी कमर पर अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश की, "अगर मैं तुम्हें उस कातिल का असली नाम बता दूँ...तो क्या तुम मेरे साथ यह रात गुज़ारोगी?"

"जी?" मधु पीछे हटने लगी।

लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, दीपक ने कसकर उसे उसकी कमर से अपने मजबूत हाथों में लपेट लिया और पूरी ताकत से अपनी तरफ खींच लिया। मधु का चेहरा दीपक के चेहरे के बिल्कुल करीब आ चुका था।

मधु बुरी तरह घबरा गई और खुद को उससे अलग करने के लिए हाथ-पाँव मारने लगी, लेकिन दीपक की पकड़ किसी फौलादी शिकंजे जैसी थी। वह पागलों की तरह हँसने लगा।

"देखिए! अब आप मुझे हर्ट कर रहे हैं... छोड़िए मुझे! प्लीज... छोड़िए!" मधु चिल्लाई।

"अगर तुम मान जाओगी...तो मैं तुम्हें सब सच बता दूंगा," दीपक की आवाज़ अब इंसानी नहीं लग रही थी, उसमें एक अजीब सी घुरघुराहट आ चुकी थी।

मधु ने अपने पूरे बदन की ताकत जुटाई और एक ज़ोरदार धक्का देकर दीपक को खुद से दूर धकेल दिया। वह हांफती हुई दरवाज़े की तरफ भागने लगी, पर दीपक बिजली की फुर्ती से उसके रास्ते में आकर खड़ा हो गया, "इतनी आसानी से नहीं मधु!"

"मेरा रास्ता छोड़िए, वरना ठीक नहीं होगा!" मधु ने चिल्लाकर चेतावनी दी।

"मैं भी तो देखना चाहता हूँ कि तुम किस हद तक जा सकती हो!" दीपक ने कहा।

मधु ने रास्ता बदला और दूसरी ओर फुर्ती से भागी, पर दीपक ने उसे पीछे से दबोच लिया और पूरी ताकत से बिस्तर पर पीठ के बल पटक दिया। मधु बिस्तर पर गिरी। दीपक किसी भूखे भेड़िये की तरह उस पर झपटा, पर मधु ने ऐन वक्त पर फुर्ती दिखाई और वह दूसरी तरफ हट गई।

दीपक जैसे ही बिस्तर से दोबारा उठने लगा, मधु के हाथ में पास रखी मेज़ पर पड़ा एक भारी पीतल का फूलदान आ गया। उसने बिना सोचे-समझे वह भारी पीतल का फूलदान पूरी ताकत से सीधे दीपक के सिर पर दे मारा!

'खनन!' की आवाज़ के साथ वह फूलदान दीपक के माथे पर लगा। दीपक अपना माथा थामकर वहीं बिस्तर के किनारे बैठ गया।

मधु का पूरा शरीर कांप रहा था। उसे लगा कि उसने गुस्से में गुनाह कर डाला था, वह एक पल के लिए दयनीय नज़रों से देखते हुए उससे माफ़ी मांगने ही वाली थी कि तभी उसकी नज़र दीपक के माथे के उस गहरे घाव पर पड़ी... और खौफ के मारे उसकी चीख गले में ही दफन हो गई।

दीपक के फटे हुए माथे से लाल इंसानी खून नहीं निकल रहा था... बल्कि वहाँ से काला, गाढ़ा और स्याही जैसा खौफनाक तरल पदार्थ रिस-रिसकर बह रहा था!

मधु खौफ और घृणा से चिल्लाती हुई कई कदम पीछे हट गई। दीपक धीरे-धीरे बिस्तर से उठा। उसने अपने हाथ की उंगलियों से उस माथे से बहते काले मवाद को छुआ, उसे देखा और एक भयानक, राक्षसी हँसी हँसा, "क्या बात है मधु? अरे...आप मुझसे इतना दूर-दूर क्यों भाग रही हैं? करीब आओ मेरे...मुझे...मुझे इस वक्त तुम्हारी बहुत ज़्यादा ज़रूरत है! मोना ने भी मेरी यह भूख और ज़रूरत पूरी की थी...और उसकी जैसी न जाने कितनी औरतों ने!"

मधु खौफ से रोती हुई, पागलों की तरह कमरे में भागने लगी। दीपक एक-एक कदम उसकी तरफ बढ़ा रहा था। अचानक वह शेरों की तरह झपटा और उसने पीछे से मधु की कीमती साड़ी का पल्ला पकड़कर पूरी ताकत से खींच लिया। मधु का संतुलन बिगड़ा, पर अपनी जान बचाने के लिए उसने मजबूरी में अपनी साड़ी के उस हिस्से को अपने पेटिकोट से अलग कर दिया और ब्लाउज और पेटीकोट पहनी हालत में ही आगे की तरफ भागी। उसने बेडरूम का दरवाज़ा खोला, बाहर निकली और दरवाज़े को पूरी ताकत से पीछे की तरफ बंद कर दिया।

वह बाहर हॉल में भाग रही थी। तभी पीछे बेडरूम के दरवाज़े के रंग-बिरंगे शीशों में से एक शीशा 'कड़ाक!' की आवाज़ के साथ टूटा। उस टूटे हुए शीशे के मुहाने से एक ज़ख्मी, काले खून से सना हाथ बाहर निकला और उसने हवा में मधु की गर्दन दबोचना चाहा।

मधु चिल्लाती हुई फर्श पर गिर पड़ी। उसका दम फूल रहा था, पर उसने अपने पैरों में बची-कुची पूरी ताकत जुटाई और घिसटती हुई उठी। वह बदहवास हालत में बाहर निकलने का मुख्य दरवाज़ा तलाशने लगी। वह हॉल पार कर ही रही थी कि तभी उसे अपने पीछे किसी जानवर की तरह दोहरी आवाज़ में भागता हुआ दीपक आता दिखाई दिया।

अब वह दीपक कहीं से भी नहीं था। उसका पूरा बदन बर्फ की तरह सफेद पड़ चुका था, आँखों की पुतलियाँ पूरी तरह गायब होकर सुर्ख सफेद हो चुकी थीं, और उसके पूरे शरीर की चमड़ी के नीचे काली-नीली नसें किसी ज़हरीले केंचुए की तरह भयानक रूप से कुलबुला रही थीं और रेंग रही थीं।

वह सीधे मधु पर झपटा। मधु ने ऐन वक्त पर कट मारा और वह चीखती हुई साइड में बनी रसोई की तरफ भागी। वहाँ शेल्फ के आगे एक बड़ी खिड़की थी। मधु ने बिना सोचे-समझे खिड़की के पल्ले को पूरी ताकत से खोला और ऊपर चढ़कर सीधे बाहर राहदारी की गीली घास पर कूद गई।

वह ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाती चिल्लाती हुई मैंशन के आंगन में भागने लगी। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र चारों तरफ गई, उसका दिल बैठ गया। मैंशन की चहारदीवारी बहुत ऊंची थी और उस पर कटीले तार लगे थे, जिन पर चढ़ना उसके बस की बात कतई नहीं थी। वह चारों तरफ से मौत के पिंजरे में कैद हो चुकी थी।

वह भागते-भागते किसी तरह मेन लोहे के फाटक की तरफ पहुँची। वह पागलों की तरह फाटक के भारी किवाड़ को ठेलकर बाहर सड़क की तरफ निकलना ही चाहती थी कि तभी...अचानक घने कोहरे को चीरता हुआ वही खौफनाक काला साया बिजली की फुर्ती से उसके ठीक आगे आकर खड़ा हो गया।

मधु का पूरा बदन खौफ से सुन्न पड़ गया और वह लोहे के फाटक से पूरी तरह सट गई।

सामने खड़ा हैवान दीपक उसकी लाचारी को देखकर एक भयानक, दोहरी हँसी हँस रहा था। वह साक्षात एक आदमखोर लग रहा था। मधु बुरी तरह डर चुकी थी। वह अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उस हैवान को देखती हुई, अपने दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी, मिन्नतें करने लगी कि वह उसके करीब न आए।

लेकिन उस हैवान पर इस वक्त सिर्फ खून और मांस का जुनून सवार था। वह अपनी पुतली-विहीन सुर्ख सफेद आँखों से केवल मधु के जिस्म को ताड़ रहा था। उसके मुँह से 'ग्रर्र... ग्रर्र...' की भयानक घुरघुराहट निकल रही थी और थक्केदार काला लार टपक रहा था। उसे देखकर मधु को इतनी घृणा हुई कि उसने रोते हुए अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लिया।

तभी अचानक मधु को राहदारी के दूसरी तरफ का सिरा खाली दिखा। वह अपनी पूरी ताकत से उस तरफ छूटी। दीपक ने जैसे ही उसे भागते देखा, वह एक पागल जानवर की तरह अपने दोनों हाथों और पैरों के पंजों के बल ज़मीन पर रेंगता हुआ खौफनाक रफ़्तार से उसके पीछे भागा।

मधु आगे-आगे भाग रही थी। रास्ते में रखे फूलों के भारी गमले दीपक के झटके से टकराकर टूटने लगे, चारों तरफ मिट्टी बिखर गई। गिरती-पड़ती, हांफती हुई मधु अपनी जान बचाने के लिए वापस भागकर मैंशन के मुख्य दरवाज़े के भीतर दाखिल हो गई।

मैंशन के भीतर पहुँचते ही, छत पर लटके उस विशाल काँच के झूमर (फ़ानूस) और चारों तरफ पसरे डरावने अंधेरे को देखकर मधु के दिल में रह-रहकर दहशत की लहरें उठ रही थीं। इससे पहले कि वह अंदर से कुंडी लगा पाती, हैवान दीपक दरवाजे को धक्का देकर भीतर दाखिल हो चुका था। उसने अपने पीछे मुख्य भारी दरवाज़े को लात मारकर बंद कर दिया।

अब वह उस विशाल बंद मैंशन के भीतर लाचार, अधनग्न बदन मधु के साथ पूरी तरह बंद था। बाहर निकलने का हर एक रास्ता खत्म हो चुका था। वह हैवान मुस्कुराता हुआ, अपनी जीब बाहर निकालता हुआ पहले किचन की तरफ गया, फिर डाइनिंग टेबल की तरफ झांकने लगा। वह उसे पागलों की तरह ढूँढ रहा था।

लेकिन मधु उसे कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

असल में, मधु हॉल के एक अंधेरे कोने में बनी एक बड़ी लकड़ी की शेल्फ (अलमारी) के निचले हिस्से के खाली जगह में पूरी तरह सिमटकर छिपी हुई थी। उसने खौफ के मारे अपने दोनों हाथों से अपने मुँह को कसकर दबा रखा था ताकि उसकी सिसकियों और सांसों की आवाज़ भी बाहर न जा सके। उसका पूरा शरीर थर-थर कांप रहा था।

हैवान दीपक आहिस्ता-आहिस्ता अपने भारी कदम फर्श पर रखता हुआ, एक डरावनी दोहरी आवाज़ में बार-बार उसका नाम पुकार रहा था, "मधु...कहाँ हो तुम? बाहर आओ..."

लेकिन उस आवाज़ का कोई जवाब न पाकर वह झल्लाया। तभी अचानक उसकी नज़र हॉल के बड़े शीशे के रिफ्लेक्शन पर पड़ी। शीशे के कोने से साफ़ दिख रहा था कि शेल्फ के नीचे डरी-सहमी, पसीने से लथपथ मधु छिपी हुई थी।

दीपक की सुर्ख सफेद आँखें चमक उठीं और वह चिल्लाता हुआ सीधे उस शेल्फ की तरफ भागा।

मधु जान गई कि वह पकड़ी जा चुकी है। वह चिल्लाती हुई शेल्फ के नीचे से बाहर निकली और भागने की कोशिश की, पर दीपक ने एक ही झटके में उसके लंबे बालों को पीछे से कसकर पकड़ लिया। मधु दर्द से चीख उठी और अपने हाथों को छुड़ाने के लिए पागलों की तरह छटपटाने लगी। हाथापाई में उसके हाथ आसपास की मेज़ों और शोपीस पर पड़ने लगे। चीजें धड़ाधड़ गिरकर फर्श पर बिखरने लगीं, कीमती कांच के बर्तन टूट गए।

तभी... छटपटाते हुए मधु का हाथ फर्श पर गिरे एक धारदार लोहे के छुरे पर पड़ा। उसने बिना एक पल गंवाए, अपनी पूरी ताकत से वह छुरा सीधा दीपक के हाथ की कलाई में घोंप दिया!

दीपक ने एक ठंडी कराह ली और अपना हाथ थामकर पीछे हटा। इस बार भी उसके हाथ के उस गहरे ज़ख्म से लाल खून की जगह गाढ़ा, काला स्याही जैसा मवाद बहने लगा। वह बिना किसी दर्द के, पूरी क्रूरता से बस चुपचाप मधु की तरफ देखने लगा। उसकी आँखों का अंधापन और गहरा हो गया।

वह दोबारा पूरी ताकत से मधु की तरफ दौड़ा।
भागते-भागते मधु का पैर एक बिखरे हुए काँच से टकराया और वह बीच रास्ते में ही फर्श पर औंधे मुँह जा गिरी।

हैवान दीपक अब अच्छी तरह जान चुका था कि यह शिकार अब और आगे भाग नहीं सकता था। वह उसकी तरफ हौले-हौले आगे बढ़ने लगा। फर्श पर पड़ी मधु अब उसे बिल्कुल गौर से देख रही थी। दीपक के पूरे नग्न शरीर पर नीली-काली नसें भयानक तरीके से उभर रही थीं, बैठ रही थीं। उसका पूरा बदन ऐसा लग रहा था मानो वह नसों का नहीं, बल्कि लाखों केंचुए जैसे जीवित कीड़ों का बना हो, जो उसके शरीर के अंदरूनी हिस्सों में इर्द-गिर्द घूम रहे थे।

वह अजीब-अजीब दोहरी आवाज़ें निकालता हुआ अपना जबड़ा फाड़ रहा था और अपनी लंबी जीभ बाहर निकाल रहा था। मधु के पसीने से लथपथ ब्लाउज, पेटीकोट और उसके कांपते हुए नंगे पेट को देखकर उस हैवान के भीतर मांस भक्षण की एक अजीब, विकृत और चरम अनुभूति जाग उठी थी। वह लार टपकाता हुआ उसके बिल्कुल करीब आने लगा।

मधु मौत को अपने सामने देखकर रोती हुई, अपने दोनों पैरों को फर्श पर घसीटती हुई, अपने कूल्हों के सहारे पीछे की तरफ होने लगी। वह दीवार से सट चुकी थी।

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«Reply #13 on: November 01, 2026, 12:46:21 AM »
तभी... वह हैवान बिल्कुल उसके ऊपर झुका और जैसे ही उसने मधु का गला दबोचने के लिए अपने खूनी हाथ आगे बढ़ाए ही थे कि तभी...पूरे बंद मैंशन के सन्नाटे को चीरती हुई एक कड़कती, मर्दाना आवाज़ गूंज उठी:

"वहीं ठहर जा!!!"

हैवान दीपक ने झटके से अपने ठीक पीछे मुड़कर देखा। हॉल के मुहाने पर, अपनी भारी कैलिबर की सर्विस रिवॉल्वर दोनों हाथों से थामे, आँखों में साक्षात गुस्सा और अविश्वसनीय हैरानी लिए इंस्पेक्टर दिलेर खड़ा था!

दीपक कुछ कर पाता या इससे पहले कि वह दिलेर पर झपटता...दिलेर ने बिना एक सेकंड गंवाए अपनी उँगली ट्रिगर पर दबाते हुए ट्रिगर एक के बाद एक खींच दी।

बंद कमरे में गोलियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। दिलेर ने अपनी पिस्तौल से पहले दीपक के सीने पर और फिर उसके चेहरे, माथे और भेजे पर बेतहाशा कई दफ़ा गोलियों की पूरी मैगज़ीन खाली कर डाली।

गोली लगते ही एक भयानक धमाका हुआ। दीपक का चेहरा बीच से दो टुकड़ों में पूरी तरह बंट गया। उसके भेजे के कई टुकड़े होकर फर्श पर जा गिरे। और जो भेजे नीचे गिरे थे, वे लाल नहीं... बल्कि बिल्कुल काले, सड़े हुए और बदबूदार मवाद के लोथड़े थे! वहीं उसके सीने पर गोलियां लगते ही, जैसे उसकी पीठ की चमड़ी फट गई और उसके भीतर से केंचुए की भांति लंबे-लंबे हरे-नीले कीड़े और वायरस छटपटाते हुए बाहर की तरफ निकलने लगे। दीपक का भारी, नग्न शरीर फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ा।

उस घिन भरे नज़ारे को देखकर खौफ में सिमटी मधु तुरंत फर्श से उठी। वह कांपते पैरों से दौड़ती हुई, उन बिखरे टुकड़ों से दूर-दूर से बचती हुई सीधा आकर दिलेर के सीने से लिपट गई और उसके गले लग गई।

वह खौफ से इस कदर कांप रही थी कि उसकी सांसें किसी धौंकनी की तरह तेज़ी से चल रही थीं। दिलेर ने अपनी बंदूक नीचे की और रोती हुई मधु को अपनी मज़बूत बाँहों में पूरी तरह कसकर थाम लिया। दिलेर ने मधु के सिर पर हाथ फेरा और फिर नीचे फर्श पर पड़ी दीपक की लाश की तरफ देखा।

दीपक के मृत जिस्म में अब कोई हरकत नहीं हो रही थी। दिलेर को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि यह शहर का नामचीन डॉ. दीपक नहीं, बल्कि कोई बेहद अजीब और खौफनाक आकृति थी। गोलियों के छेदों से और उसके कटे हुए भेजे से अब भी हल्का-हल्का रासायनिक धुआँ उठ रहा था। उसके कलेजे के कई टुकड़े हो चुके थे। वह दृश्य विज्ञान की समझ से बिल्कुल परे और डरावना था।

मधु ने दिलेर की छाती में अपना मुँह छुपाए हुए, कांपती आवाज़ में धीरे से पूछा, "क्या...क्या वह वाकई मर गया दिलेर?"

दिलेर ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपनी बांहों में मधु को थामे हुए ही लाश के थोड़े और करीब गया। लेकिन मधु ने डर के मारे कसकर उसकी बांह को पकड़ लिया, वह नहीं चाहती थी कि दिलेर उस शैतान के पास दोबारा जाए। लेकिन दीपक वापस उठ खड़ा नहीं हुआ। उसका तंत्र पूरी तरह नष्ट हो चुका था।

मधु ने लाश की तरफ घृणा और खौफ से देखते हुए रोकर कहा, "दिलेर... इसकी लाश को यहीं जला दो! प्लीज... मेरी बात मानो, इस अपवित्र लाश को ऐसे मत छोड़ना। इसके पूरे शरीर को अभी के अभी जला दो... प्लीज!"

दिलेर का दिमाग इस वक्त काम नहीं कर रहा था, लेकिन वह मधु के खौफ और फर्श पर कुलबुलाते उन नीले कीड़ों को देख चुका था। उसने मधु की तरफ एक बार देखा और फिर मैंशन के अंदरूनी स्टोर रूम की तरफ बढ़ा। खुशकिस्मती से वहाँ कोनों में मिट्टी के तेल के दो बड़े डिब्बे रखे मिल गए।

दिलेर वह मिट्टी का तेल उठाकर लाया और उसने सीधा दीपक के उस पूरे नग्न बदन पर तेल उड़ेलना शुरू कर दिया। वह अच्छी तरह जानता था कि बिना कानूनी कागजी कार्रवाई के किसी मर्डर केस की लाश को इस तरह जलाना पूरी तरह गैरकानूनी था, लेकिन वह इस वक्त प्रोफेसर रोड्रिगेज के बताएं राज को जान चुका था।

उसने वह मिट्टी का तेल उन रेंगते हुए केंचुए जैसे वायरसों पर भी भारी मात्रा में फेंका, जो दीपक के शरीर से निकलकर फर्श पर बाहर भागने की कोशिश कर रहे थे।

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«Reply #14 on: November 01, 2026, 12:51:14 AM »
Final Chapter

दिलेर ने फर्श पर बिखरे उसके सड़े हुए भेजे के टुकड़ों पर भी वह तेल छिड़का और अपनी जेब से अपना लाइटर निकाला।

उसने lighter से गीले तेल से सने फर्श पर बिखरे उन टुकड़ों पे आग की लौ लगाई, आग की लपट उठी और उसने वह लाइटर सीधा दीपक की तेल से सनी लाश पर फेंक दिया।

पूरी लाश धू-धू करके भयानक लपटों के साथ जलने लगी। आग इतनी तेज़ थी कि फर्श पर रेंगते हुए वे सारे नीले कीड़े और हरे वायरस जलकर चटखने लगे। पूरे मैंशन के भीतर एक अजीब सी, तीखी रासायनिक महक और मांस के जलने की गंध उठने लगी।

दिलेर ने मधु के नंगे बदन पर अपनी कीमती पुलिस जैकेट डाली, उसने रुमाल से अपने और मधु के नाक और चेहरे तक को उस जैकेट से ढक दिया। उसे अपनी बांहों में कसकर संभाला और उस जलते हुए नरक नुमा मैंशन से बाहर निकाल लाया।

जैसे ही वे मैंशन के मुख्य फाटक से बाहर आए, ऐसा महसूस हुआ मानो इतने लंबे समय से जो एक मनहूसियत का काला आतंक इस पूरे शहर पर पाँव पसारे हुए था, वह आज इस आग की लपटों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए छँट चुका था। आसमान के बादल अब साफ़ होने लगे थे।
कुछ दूरी पे खड़ी अपनी जीप के पास आते हुए दिलेर ने मधु को बड़े प्यार से अपनी सरकारी जीप की फ्रंट सीट पर बिठाया। तभी दूर से कई पुलिस सायरनों की आवाज़ें आने लगीं। थाने का भारी दल-बल और पीसीआर वैन्स मैंशन की तरफ ही आ रही थीं।

जीप में बैठते ही मधु ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और हांफते हुए दिलेर की तरफ देखा, "आख़िर... आख़िर तुम सही वक्त पर यहाँ पहुँचे कैसे दिलेर? तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ?"

दिलेर के गंभीर चेहरे पर एक बेहद पाकीज़ा और राहत भरी मुस्कान उभर आई। उसने अपनी जेब से मधु का फोन निकाला और उसे स्क्रीन दिखाई।

हड़बड़ाहट और जान बचने की उस आखिरी कशमकश में ही सही, जब मधु किचन की खिड़की से कूदी थी, उसने दिलेर के बताए उस गोपनीय ऐप के कांटेक्ट पर जाकर 'ग्रीन सिग्नल' (SOS Green Dot) को दबा दिया था। जैसे ही वह सिग्नल एक्टिव हुआ, दिलेर के फोन पर रेड अलर्ट की रिंग बज उठी और मधु की लाइव जीपीएस लोकेशन दिलेर के स्क्रीन पर आ गई।

दिलेर ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा, "मधु, मैं उस वक्त क्राइम ब्रांच मुख्यालय की फॉरेंसिक लैब के बाहर ही मौजूद था। हमने सबूत मिटाते वक्त प्रोफेसर रोड्रिगेज को रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। जब मैंने थाने के बंद कमरे में उस बूढ़े पर अपनी पुलिसिया कड़ाई की, तो वह खौफ के मारे टूट गया और सरेंडर करते हुए उसने अपना सारा जुर्म कुबूल कर लिया।"

दिलेर की आँखें दीपक के मैंशन की तरफ गईं जहाँ भीतर लाश पे लगी सुलगती आग का धुआँ अब भी बाहर खिड़की और तमाम वेंटिलेशन रास्तों से निकल उठ रहा था।,

"प्रोफेसर ने खुद अपने बयानों में कुबूल किया कि यह सब उसकी ५६ साल पुरानी साइबेरिया की एक अवैध वैज्ञानिक खोज का नतीजा था। वह चोरी-छिपे वायरस का सैंपल लेकर इस देश में गोपनीय तरीके से ले आया। उसने कई साल उसपर काम किया, एक्सपेरिमेंट्स किए, उसपे स्टडी की। पता चला बाद में नए दौर में आए केमिकल्स की मदद से उसने एक फॉर्मूला ईजाद किया और इस वायरस को अपने तरीके से परिवर्तित किया। कामयाबी उसके कदम तब चूमी जब एक मरे हुए चूहे को उसने ज़िंदा कर दिखाया। वह नाम कमाना चाहता था सरकार और दुनिया के आगे। मरे हुए इंसान को ज़िंदा करने की सनक थी, जिस प्रयोग के लिए उसे इंसान का शरीर चाहिए था।

वह उसी कामयाबी में अंधा होकर, उस रात किसी पुराने कब्रिस्तान पे कोई लावारिस लाश ढूँढने आया था तभी वहाँ उसकी नज़र मेघना और उसके पति के कुकर्मों पर पड़ी। मेघना और उसका पति दीपक के लाश को ठिकाने लगाके इसे देखकर फ़रार हो गए। दीपक की लाश इसने फ़ौरन पहचान ली। बस फिर क्या था? दीपक तो इसके सरकारी लैब जहाँ यह काम करता था उसका ट्रस्टी था। कत्ल की लाश थी तो इसलिए इसका काम और आसान हुआ और इस तरह उस लाश को खोदकर इसने उसे अपने लैब पे लाकर इस वायरस के साथ एक्सपेरिमेंट किया। दीपक पहले से ही मर चुका था, उसके दिमाग और कलेजे पर काबिज़ होकर वायरस उसे अपने इशारों पे नचा रहा था। धीरे-धीरे वायरस बेकाबू होने लगा और वह अपने विक्टिम में अपना रूहानी ज़हर छोड़ने लगा।

दीपक की ज़िंदा लाश को थामना प्रोफेसर के बस का नहीं था इसलिए उसने उसका पीछा किया। उसकी लापरवाही से वारदात को अंजाम देने के बाद प्रोफेसर ने पाया कि शिकार हुई लाशें वायरस संक्रमित हो रही थीं। उसने उन लाशों को एसिड से जला दिया। ताकि वायरस ना फैले इसलिए बाकी लाशों को जलाने जब वह फॉरेंसिक लैब आया तो रंगे हाथों पकड़ा गया। वह पुलिस के पास जाता तो उसकी असलियत खुलती पर उसे डर था कि कल को वायरस से जो भयावह महामारी फैलता वह धीरे-धीरे इंसानीयत के वजूद को खतरे में डाल देती। खुदा का शुक्र कि वक्त रहते ना सिर्फ वह थाम लिया गया बल्कि उसके ज़रिए दीपक का राज हमारे सामने आ गया।

डॉ. दीपक मखिजा ही वह संक्रमित व्यक्ति (Human Host) था जो उस करोड़ों साल पुराने साइबेरियाई वायरस की चपेट में आया था...और वह खौफनाक वायरस खुद प्रोफेसर ने ही उसके मृत जिस्म में दोबारा जिंदा करने के लिए दाखिल किया था। प्रोफेसर ने बताया कि यह वायरस होस्ट के दिमाग की यादों को सूंघकर अपने कातिलों (मेघना और उसके पति) तक पहुँचा था, और मांस न मिलने पर यह औरतों का शिकार कर रहा था।"

दिलेर ने मधु का हाथ थाम लिया, "जैसे ही मुझे प्रोफेसर से दीपक के इस हैवान रूप का पता चला, खुशकिस्मती से ठीक उसी सेकंड मेरे फोन पर तुम्हारा यह ग्रीन डॉट का सिग्नल चमका। लोकेशन देखते ही मैं घबरा उठा, रहा-सहा शक भी अब पुख्ता हो चुका था, लोकेशन डॉ. दीपक मखीजा का रेसिडेंस था। मैं समझ गया कि दीपक का अगला शिकार तुम बनने वाली हो...तो जब यहाँ आनन-फानन पहुँचा तो सारा मामला मेरी आँखों के सामने साफ़ था, भीतर mansion से तुम्हारी चीख-चिल्लाहट सुन मैंने देरी न करते हुए फाटक जैसे-तैसे चढ़कर फाँदकर अंदर पहुँचा, मैंशन का बंद दरवाज़ा पाकर फ़ौरन अंदर जाने का रास्ता ढूँढता किचन की खुली खिड़की के रास्ते को देखते ही मैं चुपके से अंदर दाखिल हो गया, और बाक़ी तो तुम्हारी नज़रों के सामने सब होके हटा है।"

मधु ने दिलेर के मजबूत हाथ को थाम लिया। उसकी नम आँखों में अब कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक गहरा सुकून था। वह जानती थी कि इस काली रात की सुबह अब राहत और सुकून भरी होने वाली थी।

जीप मुख्य हाईवे की तरफ बढ़ गई, पीछे मैंशन की आग उस आदमखोर शैतान के वजूद और उस जानलेवा वायरस के आखिरी अंश को हमेशा-हमेशा के लिए राख में बदल रही थी...शहर का आतंक जैसे अब खत्म हो चुका था।

Conclusion

पुलिस मौके पर जब तक पहुँची, तब तक मैंशन के दरवाज़े तोड़ते हुए उन्होंने अंदर वायरस संक्रमित दीपक की लाश को आग की राख में जलते देख लिया था, साथ में बायो सूट और हेलमेट पहने वैज्ञानिक के लोग भी थे। दिलेर मधु को लेके निकल चुका था उसका कहना था उसे मेडिकल अटेंशन की ज़रूरत थी, सौभाग्य से उसकी जान बच गयी थी और वो सही सलामत दीपक के चंगुल से बच निकली थी। वहाँ हर किसी ने अपनी आँखों से राख बनते संक्रमित मुर्दे लाश में अजीब तरीके का रिएक्शन पाया, तभी राख की आग में सरकता धीरे-धीरे एक केंचुआ सा कीड़ा आगे बढ़ रहा था तभी किसी ने उसे जार में फौरन थाम लिया। बारीक से बारीक पूरे घर की तलाशी ली गयी, सैनिटाइजिंग हुई, उस केंचुए को आर्डर के तहत प्रिजर्व नहीं किया गया बल्कि फौरन आग के हवाले कर दिया गया, वो भी जलकर राख हो गया। कोई यकीन नहीं करता अगर उन्होंने आँखों देखा सच ना पाया होता, वो इंसानी जिस्म नहीं जला बल्कि एक संक्रमित वायरस के कब्ज़े में एक ज़िंदा मुर्दा जला था जो अब तक उनके बीच रह रहा था। घर की छानबीन में आज तक जितनी औरतें आयीं उनके गहने और कपड़ों के अंश पुलिस और फॉरेंसिक टीम को मिले, एक स्टोर रूम में गार्ड की कंकाल लाश मिली जिसे देखते ही फौरन उसे ऑर्डर्स के तहत इन्फेक्टेड होने के डर से जला दिया गया गनीमत थी कि शायद उस वक़्त वायरस इतना बिगड़ा नहीं था कि दीपक ने उसमें अपनी रूहानी ज़हर भरी हो उसने उसका सिर्फ मास सोखा था।

यह केस पूरी तरह से कॉन्फिडेंशियल था, और अगर इसकी खबर देश से बाहर जाती तो शायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तहलका मच जाता। रूस का चुराया हुआ सैंपल लाकर जो इंडियन वैज्ञानिक ने अपने निजी फायदे के लिए जलील हरकत की थी, उससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ सकता था; वैसे भी रूस में उस वायरस की बात पहले ही दबा दी गई थी। इसलिए, उसके मद्देनजर तमाम ऑटोप्सी रिपोर्ट्स और ज़रूरी चश्मदीद सबूतों को सरकार के आगे पेश किया गया। कोर्ट ने दीपक की मौत की खबर को मीडिया में आने नहीं दिया। काफी लंबी छानबीन और मुकदमा चला। यह ज़रूर तफ़्तीश में पाया गया और आगे राज़ साफ़ हुआ कि कई कत्ल से पहले महिला मक़तूलों को क्लब के बाद दीपक के साथ उसकी गाड़ी में ही जाते देखा गया था। मेघना और उसके पति का कत्ल भी मरहूम दीपक पर आयद हुआ जो कि सच था, पर दीपक का कत्ल पहले होके हटा था, यह बात कोर्ट को कत्तई हज़म नहीं हुई; वे उसे संक्रमित ज़रूर माने पर पहले से मुर्दा मानने में असक्षम थे। पुलिस और फॉरेंसिक विभाग के लिए यह साबित करना नामुमकिन हो गया था कि जो इंसान कत्ल की वारदातों को अंजाम दे रहा था, वह हफ़्तों पहले खुद मर चुका था। कानून की नज़रों में दीपक ही इन सभी जघन्य अपराधों का मुख्य आरोपी था। इंस्पेक्टर दिलेर की नौकरी भी चली गई ताकि केस से जुड़े तमाम नाम रिकॉर्ड से हटा दिए जाएं, पर वो खुश था कि उसने मधु को बचाकर जैसे अपनी तन्हाई के इकलौते चिराग को बुझने से बचा लिया था। और एक आखिरी मासूम को उस हैवान से बचाने में कामयाब भी रहा। उसने मधु से बाइज्जत कुछ महीनों के अंदर तमाम रस्मों-रिवाज़ के साथ शादी कर ली।

दीपक के मैंशन को न सिर्फ सील किया गया बल्कि कई दिनों तक वहाँ छानबीन जारी रही। जब पुष्टि पूरी हुई तो उसका मकान ढहा दिया गया। प्रोफेसर रॉड्रिक्स के सरेंडर होने के बावजूद, जिसकी वजह से शहर में कत्लेआम मचा था और वायरस का संक्रमण फैलता, इन तमाम इल्ज़ाम के आयद होते ही उसपर कई धाराएं चलीं। उस पर देश में इतने बड़े अवैध गोपनीय वायरस लाने, जानलेवा एक्सपेरिमेंट करने और मुर्दे को चुराने का आरोप भी लगा। इल्ज़ाम पुख्ता हुए और इसके बाद उसपे कई धाराओं के तहत उसे जेल में डाल दिया गया। उसके लैब को सील कर दिया गया, और उस संक्रमित चूहे को आगे किसी किस्म के म्यूटेशन या कोई अनहोनी ना घटे इसलिए स्पेशल ऑब्जर्वेशन फॉरेंसिक टीम को भेज दिया गया। वह संक्रमित चूहा पिंजरे के एक कोने में दुबक कर बैठ गया। उसकी लाल चमकती आँखें अंधेरे में बिल्कुल शांत थीं। उसकी आँखें एकदम ठहरी हुई थीं, कोई नहीं कह सकता था कि वो मासूम जानवर कभी मरा हुआ भी था। वो खामोश पिंजरे में बैठा ट्रक की खिड़की से बाहर छूटती सड़क की तरफ देख रहा था। वो उन तमाम लैब के उपकरणों के साथ चलती ट्रक में था जो प्रोफेसर रॉड्रिक्स की प्रयोगशाला में इस्तेमाल होती चीज़ें थीं। वो अकेला इकलौता उस प्रयोग वायरस का एकमात्र वजूद था...जो अब तक ज़िंदा था।

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