Dil Ko Chu Gayi Yeh Baat ..... (Jasbir Singh .. NM)

by jasbirsingh on October 28, 2015, 03:29:24 PM
Pages: [1]
ReplyPrint
Author  (Read 917 times)
jasbirsingh
Guest
Reply with quote


कविता जो दिल को छू गई :
एक कमरा थाजिसमें मैं रहता था
माँ-बाप के संग घर बड़ा था
इसलिए इस कमी को पूरा करने के लिए मेहमान बुला लेते थे हम.
फिर विकास का फैलाव आया
विकास उस कमरे में नहीं समा पाया
जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी
उस चादर से बड़े हो गए हमारे हर एक के पाँव
लोग झूठ कहते हैं कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं
हक़ीक़त यही कि जब दरारें पड़ती हैं
तब दीवारें बनती हैं .
पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे
अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं
यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
फिर हमने बना लिया एक मकान
एक कमरा अपने लिए एक-एक कमरा बच्चों के लिए
एक वो छोटा-सा ड्राइंग रूम उन लोगों के लिए
जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे
एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंग रूम
उन लोगों के लिएजिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ
पहले मैं फुसफुसाता था तो
घर के लोग जाग जाते थे
मैं करवट भी बदलता था
तो घर के लोग सो नहीं पाते थे
और अब,जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं
उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।
अब मैं चीख़ता हूँ तो साथ वाले कमरे से ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है
और मैं सोच नहीं पाता हूँ कि मेरी चीख़ की वजह से वहाँ ठहाके लग रहे हैं
या उन ठहाकों की वजह से मैं चीख रहा हूँ !
आदमी पहुँच गया है चांद तक, पहुँचना चाहता है मंगल तक
पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक
अब हमारा पता तो एक रहता है
पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता
और आज मैं सोचता हूँ
जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ
उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ
अब मुझे अपने बाप की बेटी से अपनी बेटी अच्छी लगती है
अब मुझे अपने बाप के बेटे सेअपना बेटा अच्छा लगता है
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
अब मेरा बेटा भी कमा रहा है
कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा
और हक़ीक़त यही है की तमाचा मैंने मारा है
तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा..
अगर समझ आ गई ,ये कविता
तो आज ही तोड़ डालो उन दिवारो को
जो आ गई रिस्तो के बीच ।
नही तो इनही दिवारो के बीच दम तोड़ना पड़ेगा ।



Not Mine



Logged
adil bechain
Umda Shayar
*

Rau: 161
Offline Offline

Gender: Male
Waqt Bitaya:
31 days, 16 hours and 29 minutes.

Posts: 6549
Member Since: Mar 2009


View Profile
«Reply #1 on: October 29, 2015, 09:23:43 AM »
Reply with quote


कविता जो दिल को छू गई :
एक कमरा थाजिसमें मैं रहता था
माँ-बाप के संग घर बड़ा था
इसलिए इस कमी को पूरा करने के लिए मेहमान बुला लेते थे हम.
फिर विकास का फैलाव आया
विकास उस कमरे में नहीं समा पाया
जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी
उस चादर से बड़े हो गए हमारे हर एक के पाँव
लोग झूठ कहते हैं कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं
हक़ीक़त यही कि जब दरारें पड़ती हैं
तब दीवारें बनती हैं .
पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे
अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं
यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
फिर हमने बना लिया एक मकान
एक कमरा अपने लिए एक-एक कमरा बच्चों के लिए
एक वो छोटा-सा ड्राइंग रूम उन लोगों के लिए
जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे
एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंग रूम
उन लोगों के लिएजिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ
पहले मैं फुसफुसाता था तो
घर के लोग जाग जाते थे
मैं करवट भी बदलता था
तो घर के लोग सो नहीं पाते थे
और अब,जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं
उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।
अब मैं चीख़ता हूँ तो साथ वाले कमरे से ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है
और मैं सोच नहीं पाता हूँ कि मेरी चीख़ की वजह से वहाँ ठहाके लग रहे हैं
या उन ठहाकों की वजह से मैं चीख रहा हूँ !
आदमी पहुँच गया है चांद तक, पहुँचना चाहता है मंगल तक
पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक
अब हमारा पता तो एक रहता है
पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता
और आज मैं सोचता हूँ
जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ
उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ
अब मुझे अपने बाप की बेटी से अपनी बेटी अच्छी लगती है
अब मुझे अपने बाप के बेटे सेअपना बेटा अच्छा लगता है
पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
अब मेरा बेटा भी कमा रहा है
कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा
और हक़ीक़त यही है की तमाचा मैंने मारा है
तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा..
अगर समझ आ गई ,ये कविता
तो आज ही तोड़ डालो उन दिवारो को
जो आ गई रिस्तो के बीच ।
नही तो इनही दिवारो के बीच दम तोड़ना पड़ेगा ।



Not Mine






waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah bahot achchchi sharing janaab yehi haal hai aaj rishto kaa  Applause Applause Applause Applause
Logged
jasbirsingh
Guest
«Reply #2 on: October 29, 2015, 11:19:52 PM »
Reply with quote

waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah bahot achchchi sharing janaab yehi haal hai aaj rishto kaa  Applause Applause Applause Applause

Very true sir
Logged
sksaini4
Ustaad ae Shayari
*****

Rau: 853
Offline Offline

Gender: Male
Waqt Bitaya:
112 days, 8 hours and 51 minutes.
Posts: 36414
Member Since: Apr 2011


View Profile
«Reply #3 on: November 18, 2015, 06:30:23 AM »
Reply with quote
waah
Logged
Abhishek ChandraVanshaj
Guest
«Reply #4 on: January 20, 2018, 02:18:03 PM »
Reply with quote
This poem is my intellectual work, published on 16 December 2014. (Source: trippleaa.blogspot.in/2014/12/a-common-man-poem-sure-to-touch-ones.html).
I want it to be either removed from this page or be published under my name.
With regards,
Abhishek Verma
Logged
Pages: [1]
ReplyPrint
Jump to:  

+ Quick Reply
With a Quick-Reply you can use bulletin board code and smileys as you would in a normal post, but much more conveniently.


Get Yoindia Updates in Email.

Enter your email address:

Ask any question to expert on eTI community..
Welcome, Guest. Please login or register.
Did you miss your activation email?
June 25, 2021, 07:22:43 AM

Login with username, password and session length
Recent Replies
[June 25, 2021, 04:29:59 AM]

[June 24, 2021, 11:10:52 PM]

[June 24, 2021, 04:03:00 PM]

[June 24, 2021, 01:43:03 PM]

[June 24, 2021, 01:37:10 PM]

[June 24, 2021, 01:34:26 PM]

[June 24, 2021, 01:32:55 PM]

[June 24, 2021, 01:32:16 PM]

[June 24, 2021, 01:31:33 PM]

[June 24, 2021, 01:30:22 PM]
Yoindia Shayariadab Copyright © MGCyber Group All Rights Reserved
Terms of Use| Privacy Policy Powered by PHP MySQL SMF© Simple Machines LLC
Page created in 0.241 seconds with 26 queries.
[x] Join now community of 8432 Real Poets and poetry admirer